आर्य भाषा परिवार

तिब्बत बर्मी परिवार

बाहरी पहाड़ी

भीतरी पहाड़ी

किन्नौर

लाहौल स्पिती

बाहरी पहाड़ी

हमीरपुर,ऊना, कांगड़ा

बिलासपुर

चम्बा

मण्डी

कांगड़ी

कहलूरी

चम्बयाली,गादी, चुराही,पंगवाली

मण्डयाली, सराजी, सुकेती

भीतरी पहाड़ी

सिरमौरी(सिरमौरी)

सोलन

शिमला (महासुई)

कुल्लू

गिरीवार/धारठी गिरीपारी/बिशाऊ

बघाटी, बघलाणी, हण्डूरी

क्योंथली, बराड़ी, सौराचोली, कीरनी, कोची

कुलुई, भीतरी सराजी, बाहरी सराजी

किन्नौर

किन्नौरी

लाहौल स्पिती

तिनन या तिननी

बुनन या गारी

लाहुली

पट्टनी या मनचाटी

चनाली

संकलन डाॅ. श्यामा वर्मा

हिमाचल प्रदेश की प्राचीन लिपियाँ

ब्राहमी लिपि

ब्राहमी लिपि का उद्भव एवं विकास समाट् अशोक (272-232, ई.प) के समय में काम गिरनार, कर्णाटक आदि भारतीय क्षेत्रों और श्रीलंका तथा मध्य एशिया तक ब्राहमी लिपि का प्रसार शंग, क्षाण, गप्त काल में भी ब्राह्मी लिपि प्रचलन में रही। हिमाचल प्रदेश के भरमौर में मेरु वर्मन के में भी ब्राहमी लिपि के आलेख मिलते हैं। आधुनिक भारतीय लिपियां ब्राह्मी से ही विकसित हुई हैं।

शारदा लिपि

शारदा लिपि का उद्भव शारददेव देश अर्थात् कश्मीर में हुआ। शारदा लिपि का सबसे पराना शिलालेख सराहां (चम्बा) में मिलता है। चम्बा में 10 वीं शती में शारदा के लेख मिलते हैं। 11-17 वीं सदी में कुछ कश्मीरी पंडित सिरमौर के चौपाल, ठियोग आदि क्षेत्रों में आकर बसे जो शारदा के पास भी अपने साथ लाए।

खरोष्ठी

खरोष्ठी लिपि का उद्भव पश्चिमोत्तर भारत के गांधार क्षेत्र में ईसा पूर्व पांचवीं सदी में हुआ। खरोष्ठी दाईं से बाईं ओर लिखी जाती है। खरोष्ठी में प्राचीनतम लेख अशोक कालीन (272-232 ई.पु.) मानसेहरा में मिलता है। औदुम्बर तथा कुणिंद सिक्कों पर खरोष्ठी के लेख अंकित हैं। 668 ई.पु. तक मध्य एशिया में खरोष्ठी का प्रचलन रहा है।

चंदवाणी

11 वीं शताब्दी में कश्मीर की रानी के साथ सिरमौर आए परिवार शारदा में लिखित ग्रन्थ अपने साथ लाए और सिरमौर के चौपाल, ठियोग, चूंड आदि क्षेत्रों में बस गए। इन्हीं पण्डितों द्वारा कालांतर में चंदवाणी, पंडवाणी, भटाक्षरी तथा पावुची आदि लिपियों का उद्भव एवं विकास हुआ। चंदवाणी लिपि ज्योतिष, कर्मकांड, तंत्र मंत्र, आयुर्वेद आदि विषयों पर ग्रन्थ रचे, जिन्हें सांचा कहा जाता है। चौपाल के भटेवड़ी तथा थरोच गांव में भाट चंद्र ज्योतिष के आधार पर चंदवाण' हैं और इनकी लिपि चंदवाणी कहलाती है।

पावुची

सिरमौर जनपद में खडकांह, जवलोग और भगनोल गांवों के पंडितों की लिपि पाबुची है तथा इनके पास पावुच लिपि में प्राचीन सांचा उपलब्ध हैं।

पंडवाणी

शिमला जिला के ठियोग तहसील के बलग और चौपाल के मनेवर्टी व छतरौली गावा में पांडो की लिपि पंडवाणी कहलाती है। इनके सांचे पंडवाणी में हस्तलिखित हैं।

भट्टाक्षरी

चौपाल के हरिपुरधार, कुणा, वेओग, घटोल और सिद्धयोटी आदि गांवों के भाटा का ला भट्टाक्षरी कहलाती है।

लञ्चा लिपि

नेपाल के नेवार खानदान द्वारा ईजाद की गई संस्कृत मूलक लञ्चा लिपि तिब्बत और हिमाचल प्रदेश के लाहुल स्पिति, किन्नौर, पांगी आदि बौद्ध क्षेत्रों में प्रचलित है। बौद्ध विहारों में लिखित मंत्र प्रायः लञ्चा लिपि में ही है।

सौज्नय : श्री छवीन्द्र शर्मा

पहाड़ी भाषा, 15 अप्रैल 1970

         पहाड़ी, जिसे अब तक बोली समझा जाता था, दरअसल 30 लाख हिमाचलवासियों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है और मुझे आशा है कि इसे यथा समय संवैधानिक दर्जा दे दिया जायेगा। हिमाचल में रहने वाले लोग इसके विकास की पूरी कोशिश कर रहे हैं और हमारा प्रयास इस भाषा को एक ऐसे स्तर तक पहुंचा देने का है कि यह स्वयमेव सरकारी भाषा के रूप में अपना ली जाये। मुझे यह भी आशा है कि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की तरह लाखों पहाड़ी लोगों की यह मातृभाषा भी उचित मान्यता प्राप्त कर हिन्दी की पूरक बन जायेगी। हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है और इसका गौरवपूण स्थान कायम रखा जायेगा।

हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी

         डॉ. परमार ने पहाड़ी भाषा, संस्कृति एवं साहित्य के प्रोत्साहन के लिए 1971 में हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी की स्थापना की और अकादमी के प्रथम अध्यक्ष पद को भी सुशोभित किया। इसके बाद भाषा संस्कृति विभाग, राज्य संग्रहालय की स्थापना हुई। उनके कार्यकाल में प्रदेश में कला-संस्कृति भाषा एवं साहित्य को भरपूर प्रोत्साहन मिला जो कि वर्तमान में भी प्रगति पथ पर निरंतर अग्रसर है। वर्तमान में हिमाचल अकादमी द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रदेश के लेखकों, कलाकारों के सम्मान तथा प्रोत्साहन के लिए कार्य किया जा रहा है। हिमाचल अकादमी द्वारा डॉ. यशवंत सिंह परमार, पहाड़ी गांधी बाबा कांशी राम, लाल चंद प्रार्थी, मनोहर सिंह, आचार्य दिवाकर दत्त शर्मा, ठाकुर राम सिंह राज्य स्तरीय जयंती समारोह। इन समारोहों के अवसर पर साहित्यिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 2 अक्तूबर हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी स्थापना दिवस 

डॉ. परमार लोगों से अक्सर कहा करते थे लोग हमें मुंडू कहते हैं लेकिन हम मुंडू इस वास्ते हैं क्योंकि ईमानदारी से काम करते हैं,मैं सबसे बड़ा मुंडू हूं।

15 फरवरी ठाकुर राम सिंह राज्य स्तरीय जयंती समारोह

4 अप्रेल लाल चंद प्रार्थी राज्यस्तरीय जयंती समारोह

12 अप्रेल रंगकर्मी मनोहर लालराज्य स्तरीय जयंती समारोह

11 जुलाई पहाडी गांधी बाबा कांशी राम राज्य स्तरीय जयंती समारोह

4 अगस्त डा यशवंत सिंह परमारराज्य स्तरीय जंयती समारोह

28 सितंबर आर्चाय दिवाकर दत शर्मा राज्य स्तरीय जंयती समारोह

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