कांगड़ी और कहलूरी (बिलासपुरी)

                 इस प्रकार जौनसार बाबर से लेकर भद्रवाह तक के पहाड़ी भाषा क्षेत्र में डॉ० ग्रियर्सन ने प्रमुखत: नौ बोलियों का समावेश किया है, परन्तु इन्हीं बोलियों से घिरी हुई दो बोलियों अर्थात् कांगड़ी और कहलूरी को डॉ० ग्रियर्सन ने पहाड़ी भाषा की बोलियां नहीं माना है। कांगड़ी बोली मूलतः भूतपूर्व कांगड़ा ज़िला तथा उसके आसपास के पड़ोसी क्षेत्रों में बोली जाती है, जिसमें अब हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, हमीरपुर और ऊना ज़िले शामिल हैं। कहलूरी भूतपूर्व कहलूर और मांगल रियासतों की बोली है। इस क्षेत्र का प्रमुख भाग अब बिलासपुर ज़िला में पड़ता है और यह बोली अब बिलासपुरी के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। डॉ० ग्रियर्सन ने कांगड़ी को जम्मू-कश्मीर की डोगरी के माध्यम से पंजाबी की एक बोली माना है, अर्थात् वे डोगरी को मूलत: पंजाबी भाषा की बोली मानते हैं तथा कांगड़ी को डोगरी का एक रूप मानते हैं। कहलूरी को ग्रियर्सन ने होशियारपुर में बोली जाने वाली पंजाबी काएक अंग माना है। इस तरह वे कांगड़ी और कहलूरी को पंजाबी भाषा की बोलियां मानते हैं।

                 यह ध्यातव्य है कि डॉ० ग्रियर्सन ने जहां एक ओर जौनसारी, सिरमौरी, बघाटी, क्योंथली, कुलुई, मण्डियाली और भद्रवाही को एक श्रेणी में रखकर (पश्चिमी) पहाड़ी का नाम देकर दरद-पैशाची से प्रसूत बताया है, वहीं दूसरी ओर इन्हीं बोलियों से घिरी कांगड़ी और कहलूरी को पंजाबी भाषा की बोलियां बताया है। डॉ० ग्रियर्सन की यह धारणा न वस्तुस्थिति के अनुकूल थी न वास्तविक ठोस आधारों पर स्थापित है। डॉ० ग्रियर्सन ने अपनी ‘भारतीय भाषा-सर्वेक्षण’ पुस्तक में उल्लिखित भाषाओं में से बहुत सी भाषाओं और बोलियों को न स्वयं सुना था और नवे उन्हें जानते थे। उनका अध्ययन प्रमुखतः उनकी अंग्रेजी सामग्री पर अनुवाद पर आधारित था और अनुवाद के सम्बंध में अनेक कठिनाइयां और सीम हैं, यथा- मूल वक्ता की सही खोज, उस द्वारा अंग्रेजी सामग्री को तथा सही अनुवाद, उस अनुवाद का सही प्रतिपादन, वक्ता, अनुवादक की मूल बोली की ध्वनि से साम्य, उस ध्वनि को ठीक-ठीक समझना , जटिलता को ठीक-ठीक अभिव्यक्त करना, अंग्रेजी लिपि की भारतीय ध्वनि सही रूप में दर्शाने में असमर्थता, अनुवादक की अपनी सूझ-बूझ से दर्शायी | को शोधकर्ता द्वारा ठीक-ठीक समझना, अक्षर-वर्तनी की कठिनाइयां आदि ।

                इन सब कठिनाइयों के होते हुए भी डॉ० ग्रियर्सन ने जो कार्य कि वह सराहनीय तो है ही, उनके निर्णयों को आसानी से ठुकराया भी नहीं सकता। फिर भी उनकी सीमाएं थीं और इन सीमाओं के बारे में डॉ० प्रिय स्वयं भी परिचित और सचेत थे क्योंकि स्थान-स्थान पर उन्होंने इस बात संकेत किया है। जहां सन्देह हो वहां पूछताछ की है और निर्णय के प्रति ईमानदारी बरती है। कांगड़ी के बारे में उनकी ये कठिनाइयां और भी प्रबल हुई हैं क्योंकि वे जानते थे कि पहाड़ी बोलियों से तीन ओर घिरी कांगड़ी का पंजाबी भाषा होना संदेहयुक्त है। इसलिए वे अपनी पुस्तक ‘ भारतीय भाषा सर्वेक्षण, खण्ड नौ, भाग एक’ के पृष्ठ 776 पर लिखते हैं कि भाषा के जिस नमूने के आधार पर वे कांगड़ी का अध्ययन कर रहे हैं और वैयाकरणिक निर्णय दे रहे हैं। वह आलेख कांगड़ा के किसी निवासी ने नहीं लिखा है।’

                 स्पष्ट है कि यह आलेख कांगड़ा ज़िला के मुख्यालय धर्मशाला में बैठे किसी सदर-कानूनगो, हैड वर्नेकुलर क्लर्क, राजस्व अधिकारी या किसी अन्य कर्मचारी ने तैयार किया था जो उन दिनों बहुधा पंजाब के अधिकारी हुआ करते थे। इसलिए कांगड़ा क्षेत्र से बाहर के अनुवादक द्वारा तैयार किया आलेख कांगड़ी बोली का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। इसलिए निस्संदेह ही कांगड़ी के बारे में डॉ० ग्रियर्सन का आधार ही दोषपूर्ण था और अनुवादक के मुख्यालय में बैठे और लिख हस्तलेख की भाषा थी। ग्रियर्सन इस त्रुटि को जानते थे। इसलिए इसके प्रति सजग रहते हुए और निर्णय में ईमानदारी निभाते हुए पूर्वोक्त पुस्तक के पृष्ठ 637 पर पुन: लिखा कि ‘कांगड़ी बोली कांगड़ा ज़िला के तहसील मुख्यालयों में बोली जात अर्थात् जिस कांगड़ी बोली को उन्होंने पंजाबी भाषा की बोली कहा है वह, उन अनुसार, केवल ज़िला तथा तहसील मुख्यालयों की बोली कही गई है। सार । के गांवों की भाषा को पंजाबी की बोली नहीं कहा है। ज़िला और तहसील मुख्यालयों की भाषा कचहरी-भाषा होती है जो तथाकथित पढ़े-लिखे कर्मचारियोंऔर कार्यालयों में काम के लिए आए लोगों की काम-चलाऊ भाषा होता है निवासियों की गांवों की भाषा का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं करती।

                यही स्थिति कहलूरी बोली की रही है। भारतीय भाषा सर्वेक्षण के खण्ड 9, भाग एक के पृ० 677 में लिखा गया है कि ‘कहलूरी को आज तक (पश्चिमी) पहाड़ी का एक रूप माना जाता रहा है और स्थानीय लोग इसे पहाड़ी ही कहते हैं, परन्तु (बोली के) नमूने के निरीक्षण से लगता है कि ऐसी स्थिति नहीं है।’ यहां लोगों के कहने तथा वास्तविक स्थिति के बावजूद ग्रियर्सन ने किसी लेखक की भाषा के नमूने के आधार पर कहलूरी को पंजाबी का रूप माना है जो उचित नहीं था।

                डॉ० ग्रियर्सन का कांगड़ी को पंजाबी की बोली घोषित करने का मूल, परन्तु दूषित निर्णय भूतपूर्व संयुक्त पंजाब के राजनैतिक क्षेत्र में बहुत चर्चित रहा है। पंजाबी के समर्थकों ने डॉ० ग्रियर्सन के भाषा-सर्वेक्षण का समीक्षात्मक अध्ययन किए बिना ही इस आधार पर कांगड़ा क्षेत्र को पंजाब में मिलाने की पुरज़ोर वकालत की थी। यह कहा गया था कि ‘यद्यपि शिमला, कुल्लू, लाहुल और स्पिति पहाड़ी क्षेत्र हैं, परन्तु कांगड़ा ज़िला न तो पहाड़ी क्षेत्र है और न ही इसकी हिमाचल प्रदेश के लोगों के साथ भाषायी समानता है। यह दावा पहले सरदार हुकम सिंह की अध्यक्षता में गठित संसदीय समिति और बाद में पंजाब सीमा आयोग के सामने पेश हुआ। प्रतिवाद में जब इन दोनों के सामने वस्तुस्थिति प्रस्तुत हुई और अनेक भाषाविदों के हाल ही के इस क्षेत्र के भाषा-वैज्ञानिक अध्ययनों का निर्णय पेश हुआ तो संसदीय समिति और पंजाब सीमा आयोग ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांगड़ा क्षेत्र न केवल भौगोलिक दृष्टि से पहाड़ी और . हिमाचल का अंग है, वरन् यह भाषात्मक तथा सांस्कृतिक आधार पर भी हिमाचल से पूर्ण साम्यता रखता है। भूतपूर्व पंजाब का पुनर्गठन पूर्णतया भाषायीऔर सांस्कृतिक आधार पर हुआ था और उसके पुनर्गठन पर कांगड़ा के हिमाचल में समागम और कांगड़ी के पहाड़ी भाषा की बोली होने का निश्चयन हो चुका है। पंजाब सीमा आयोग ने संसदीय समिति की इस सिफारिश को मान लिया है। कि पंजाब के हिन्दी-क्षेत्र में सम्मिलित पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों को, जो हिमाचल प्रदेश के साथ लगते हैं और जिनका उस टेरेटरी के साथ भाषात्मक और सांस्कृतिक साम्य है, हिमाचल प्रदेश के साथ मिला दिया जाए।’

                  इसमें संदेह नहीं कि पहाड़ी भाषा की बोलियों में स्थान-स्थान पर उच्चारण, शब्दावली और रूप तत्त्व में भेद विद्यमान है। ऐसे भेद यहां की विकट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण स्वाभाविक हैं। पुराने समय में जब यातायात केसाधन नहीं थे और संचार माध्यमों का अभाव था, क्षेत्रीय बोलियां स्वतः विकसित हुई थीं। उनपर बाहरी प्रभाव कम था। इसके विपरीत कांगड़ी और कहलूरी आदिबोलियां पड़ोस की पंजाबी भाषा से प्रभावित होती रहीं। इन सब के होते हुए भीपहाड़ी भाषा की मौलिक विशिष्टताएं सभी बोलियों में स्थापित रहीं।

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