कुलुई

              कुलुई कुल्लू ज़िले की बोली है। डॉ० ग्रियर्सन कुलुई को दो तरह से विशिष्ट स्थान देते हैं। अपनी पुस्तक भारतीय भाषा सर्वेक्षण खण्ड १, भाग-4 के पृष्ठ 375 पर वे लिखते हैं कि ‘कुलुई और क्योंथली-बघाटी पश्चिमी पहाड़ी की विशिष्ट बोलियां हैं और पश्चिमी पहाड़ी की जो प्रमुख विशेषताएं उल्लिखित है । इन दोनों पर आधारित हैं। वे आगे चलकर इसी खण्ड के इसी पृष्ठ पर लिखते हैं कि ‘मण्डियाली बोली दक्षिणी कुलुई का एक रूप है जो आगे चल कर कागड़ पंजाबी में विलीन हो जाता है, तथा चम्बयाली बोली कलई का वह रूप है जिस बाद में जम्मू की डोगरी और भद्रवाही के साथ विलयन हो जाता है।’ चवगी वृवर्गीय ध्वनियों की अलग सत्ता, वत्यै ल से पृथक् मूर्धन्य ल की स्वतन्त्र न, म, ण, र, ल, ल के महाप्राण न्ह, ण्ह, र््ह, ल्ह, ल्ह़ रूप, सर्वनाम पुरुष के लिए स्त्रीलिंग और पुंल्लिंग के अलग-अलग रूप, तिङन्त क्रि संयुक्त क्रियाओं के स्थान पर मूल क्रियाओं की अधिकता जो सभी पहाड़ा ” मुख्य विशेषताएं हैं, कुलुई में विशेष रूप से उभर आई हैं। कुलुई अपनी पड़ोसी बोलियों से कारक की स्थिति में भिन्न हो जाती है। सिरमौरी. बघाटी और महासुई में कर्म तथा सम्प्रदान का प्रत्यय खेॅ है और कलाई का बेॅ है। इसी तरह अन्य बोलियों में अपादान का प्रत्यय दोॅ या दू है तथा कुलुई का प्रत्यय है। 

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