क्योंथली

                           शिमला और शिमला के आसपास के क्षेत्र की बोली को डॉ० ग्रियर्सन ने क्योंथली नाम दिया था। क्योंथल उन दिनों इस क्षेत्र की सबसे बड़ी रियासत थी। यह बोली अब प्राय: महासुई के नाम से प्रसिद्ध है। महासुई नाम भूतपूर्व महासु ज़िले के नाम से सम्बंधित न होकर यहां के सब से बड़े देवता महासु के नाम से सम्बंधित समझना चाहिए क्योंकि महासु ज़िले के पुनर्गठन पर यद्यपि इस नाम से जिला नहीं रहा है, फिर भी आकाशवाणी, भाषा विभाग, हिमाचल प्रदेश और प्रदेश के विभिन्न लेखक महासुई नाम ही लेते और लिखते हैं। डॉ० ग्रियर्सन ने क्योंथली के अन्तर्गत हण्डूरी, शिमला सराजी, बराड़ी, सौराचोली, कीरनी और कोची छह अन्य उप बोलियां गिनाई हैं, परन्तु इनमें स्थान भेद के कारण सामान्य परिवर्तन के अतिरिक्त कोई विशिष्ट अन्तर नहीं। हंडूरी को अब लोग कहलूरी मानने लगे हैं। महासुई बोली की अन्य बोलियों से मुख्य पहचान ओॅ कारान्त शब्दों की बहुलता है, जैसे हिन्दी शब्द घेरा, घोड़ा, तमाचा, करना, पीसना, क्रमशः घेरोॅ, घोड़ाॅ, तमाचोॅ, कौरनोॅ, पीशणोॅ आदि बन जाते हैं। यहां ओॅ की ध्वनि भी विशेषहै। यह ओ और औ की बीच की ध्वनि है। इसी तरह व्यंजनान्त पुंल्लिंग का विकारी रूप भी, जो अन्य पड़ोसी बोलियों में आकारान्त होता है, महासुईओॅ कारान्त हो जाता है, जैसे सोॅ रंगोॅ और गोॅरभोॅ रा पता नी लगदा (स्वर्ग का पता नहीं लगता), हिमाचलोॅ रे मन्दर (हिमाचल के मन्दिर) आदि। क्रिया का तिडन्त रूप भी महासुई में विशेष ध्यान आकर्षित करता है, जैसे छोह्टू दूध पियोॅ (लड़का दूध पीता है), छोह्टी दूध पियोॅ (लड़की दूध पीती है)। यहां और ‘पीती हैं’ के लिए एक ही रूप ‘पियों’ है। यह संस्कृत के समान है। में भी क्रिया का तिङन्त रूप लिंग के आधार पर नहीं बदलता। डॉ० ग्रियर्सन ने सतलुज नदी के निकट की भाषा को क्योंथली (महा। से अलग करके सतलुज समूह नाम दिया है और उसके साथ सतलुज पार तो सिराज की बोली को भी मिला दिया है। वास्तव में सतलुज से इस ओर शिमल ज़िला की बोली को अलग करने के सम्भवतः डॉ० ग्रियर्सन के यह विचार रहे हैं। कि वे क्योंधली और कुलुई के बीच एक कड़ी ढूंढना चाहते थे और इस उद्देश्य से उन्होंने सतलुज समूह की स्थापना की। केवल दो बातें हैं जो मूल महासुई से भेद, दर्शाती हैं। एक यह कि सतलुज के निकट पहुंचते-पहुंचते ओंकारान्त शब्दों की प्रवृत्ति कम हो गई है। दूसरे यह कि कर्म तथा सम्प्रदान कारक का प्रत्यय यहां लेॅ हो गया है, जैसे महासुई मूंखेॅ सतलुज के निकट मूलेॅ (मुझे) बन जाता है। अन्यथा इस क्षेत्र की बोली को महासुई से अलग नहीं किया जा सक |

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