चम्बयाली

              चम्बा ज़िला में उत्तर-पूर्व के चम्बा-लाहुल क्षेत्र की भाषा को छोड़ कर जो तिब्बती-बर्मी परिवार से है, शेष क्षेत्र की बोली चम्बयाली के नाम से प्रसिद्ध है। भौगोलिक दृष्टि से विभिन्न वादियों में विभक्त होने के कारण समस्त ज़िले की बोली के स्थानीय भेद के आधार पर चम्बयाली, भरमौरी या गादी, चुराही और पंगवाली स्थानीय उपभेद हैं। इन सब में सामान्य उच्चारणादि भेद के अतिरिक्त पूर्ण समानता है और समूचे रूप में चम्बयाली के नाम से ही जानी जाती है। उच्चारण की दृष्टि सेचम्बयाली बाहरी पहाड़ी के अधिक निकट है। कारक में भी मैं और प्रद प्रत्यय ‘जो’ है । चम्बयाली-विशेष में बाहरी पहाड़ी की तरह संज्ञा के वारी एकवचन और बहुवचन में अलग-अलग हैं। चुराही में यह रूप भीतरी ही अनुसार दोनों वचनों के लिए समान रहता है। सभी उप बलिया में कर्म , सम्प्रदान को छोड़ शेष कारक-चिह्न भीतरी पहाड़ी के अधिक निकट हैं। इसी , भविष्यत् काल में भी गा-गे-गी की बजाए ला-ले-ली का प्रयोग होता है। चम्बयाली भरमौरी, चुराही में बाहरी पहाड़ी की सामान्य सहायक क्रिया है, हा, हिन, आ या हैं परन्तु पंगवाली में भीतरी पहाड़ी रूप औसो, असू, असी प्रचलित हैं। चम्बयाली में भीतरी पहाड़ी के रूप थिया, थिए और थी साम सहायक क्रिया के भूतकालिक रूप प्रचलित हैं। इसी तरह चम्बयाली में भी पहाड़ी के पुराघटित रूप प्रचलित हैं, यथा- मारोरा ८ मारा है, दितोरा ५ दिया है। हेरोरा र देखा है आदि । गादी उप वोली का रूप कुलुई के अधिक निकट है। उसमें कर्म-सम्प्रदान का प्रत्यय भी अन्य उपबोलियों का ‘जो’ न हो कर ‘वो’ है जो कुल ‘वे’ के समरूप है। चम्बयाली के विभिन्न रूपों में भीतरी पहाड़ी की मुख्य विशेषता श्रुति का बड़ा महत्त्व है। यहां भी -और वर्ण श्रुत हो जाते हैं- जैसे पंगवाली हेना, माना, कना, हाना में र के लोप से प्रकट है। ये शब्द क्रमशः हेरना (देखना), मारना, करना, हारना हैं। 

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