जौनसारी

                           प्रशासनिक दृष्टि से जौनसारी बोली का क्षेत्र वर्तमान उत्तरांचल में पड़ता है। जौनसार-बावर का क्षेत्र मूलतः देहरादून की हिन्दी, गढ़वाल की गढ़वाली तथा पहाड़ी की सिरमौरी बोली से घिरा है और स्वाभाविकतः यह बोली इन सबका मिश्रण है, परन्तु इसका सर्वाधिक झुकाव सिरमौरी की ओर है। अ स्वर को ओं में बदलने की पहाड़ी भाषा की प्रवृत्ति यहीं से आरम्भ होती है। यहां ओं का उच्चारण वास्तव में ह्रस्व ओ अर्थात् ओं की भांति है। इसी तरह पहाड़ी की ए तथा ऐ के बीच ऍ को ध्वनि भी जौनसारी में प्रचलित है। जौनसारी में कर्ता कारक का विकारी रूप ऍ में बदलता है। कर्म और सम्प्रदान के लिए खें, करण के लिए लई, अपादान के लिए ते, ती या ई और अधिकरण के लिए मुझे, पांदे परसर्ग प्रयोग में आते हैं जो सिरमौरी में भी प्रचलित हैं। सर्वनाम के क्षेत्र में जौनसारी में हामों, तुमों रूप प्रचलित हैं जो सिरमौरी के साथ मेल खाते हैं, परन्तु पहाड़ी की कुछ अन्य बोलियों में ये रूप आसें, तुसें प्रचलित हैं। क्रिया के सामान्य रूप की स्थिति में जौनसारी बोली सिरमौरी की अपेक्षा महासुई (क्योंथली) के अधिक निकट है, क्योंकि इसके रूप खाणों, पीणों, उठणों, बणनों हैं, न कि खाणा, पीणा, उठणा (खाना, पीना, उठना)। एक दूसरी बात, जिसमें जौनसारी अपनी निकट पड़ोसी बोलियों से भिन्न है, कर्मवाच्य के सम्बंध में है। हिन्दी औरसिरमौरी में कर्मवाच्य रूप जाना सहायक क्रिया के संयोग से बनता है, परन जौनसारी में कुलुई की तरह कर्मवाच्य का प्रत्यय ई है- देणा (देना) से देडगो (दिया जाना), हारचणी (गुम करना) से हारचिणी (गुम किया जाना)। 

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