पहाड़ी की उप-शाखाएं

           वास्तव में पहाड़ी की स्पष्टतः दो शाखाएं हैं। हिमाचल प्रदेश के मानचित्र पर ज़रा ध्यान दिया जाए तो इसकी स्थलाकृति के मुख्यतः दो भाग हैं- एक भाग मध्य हिमालय में पड़ता है जिसमें पूर्व-दक्षिण से उत्तर-पश्चिम की ओर क्रमशः किन्नौर ज़िला, लाहुल-स्पिति ज़िला के पूर्ण क्षेत्र और चम्बा ज़िला का चम्बालाहुल इलाका शामिल है। भाषा शास्त्रियों ने इस क्षेत्र की भाषा को तिब्बती-बर्मी नाम दिया है और यह भारतीय आर्यभाषा परिवार में नहीं आती। इस क्षेत्र से आगे बाह्य हिमालय पड़ता है। बाह्य हिमालय क्षेत्र के भी ठीक इसी दिशा में अर्थात् पर्वदक्षिण से उत्तर-पश्चिम की ओर दो भू भाग हैं- भीतरी भाग और बाहरी भाग। भीतरी भाग में हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, सोलन, शिमला, कुल्लू ज़िले, कांगडा का उत्तरी पर्वतीय गादी-भाषी क्षेत्र तथा चम्बा का चुराही और पंगवाली क्षेत्र पड़ते हैं। शेष सारा क्षेत्र बाहरी भाग में पड़ता है। भीतरी भाग पहाड़ी भाषा की भीतरी शाखा का क्षेत्र है जिसमें भाषायी दृष्टि से देहरादून का जौनसार बाबर और जम्मूकश्मीर का भद्रवाही क्षेत्र भी पड़ता है। बाहरी शाखा में मुख्यतः बिलासपुर, मण्डी, हमीरपुर, ऊना, कांगड़ा और चम्बा ज़िले पड़ते हैं। मूलरूप से दोनों शाखाओं में वे सभी गुण विद्यमान हैं जो पहाड़ी की मुख्य विशेषताएं हैं तथा जिनके आधार पर पहाड़ी भाषा भाषावैज्ञानिक दृष्टि से पड़ोसी भाषाओं से भिन्न और स्वतंत्र है, फिर भी स्थान-भेद के कारण उच्चारण-शब्दावली और व्याकरण की सामान्य भिन्नता के आधार पर पहाड़ी की पूर्व कथित बोलियां मानी जाती हैं।

         मण्डी और बिलासपुर ज़िले जिस तरह भौगोलिक रूप में प्रदेश के मध्य भाग में स्थित हैं, उसी तरह यहां की बोलियां भी दोनों शाखाओं का समन्वय करती हैं। मण्डी-बिलासपुरी में भीतरी उप-शाखा के और ओॅ स्वर न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि इसके माध्यम से ये दोनों स्वर बाहरी शाखा में भी स्वतंत्र और विशिष्ट स्थान रखे हुए हैं, परन्तु भीतरी शाखा में जो अ स्वर को ओं में बदलने की सर्वमान्य प्रवृत्ति है वह कम हो गई है और बाहरी शाखा की तरह ऐसा परिवर्तन प्रचलित नहीं है। ल और ल स्वतंत्र ध्वनियां यहां भी हैं। चवर्गीय ध्वनियां विद्यमान हैं परन्तु भीतरी शाखा की तरह ये स्वतंत्र न होकर चवर्गीय की संध्वनियां रह गई हैं। अन्य पुरुष वाचक सर्वनाम के पुंल्लिंग और स्त्रीलिंग अलग-अलग रूपों की सत्ता भी प्रतिष्ठित है। उत्तम-पुरुष पुरुषवाचक में भीतरी शाखा का हऊं शब्द भी है आर बाहरी शाखा का मैं भी। तीनों पुरुषवाचकों के एकवचन में पहले विकार आता है और इसी रूप में विशेषण में भी परिवर्तन आता है, जैसे पंजाबी वाक्य ‘इह चंगी” कुड़ी दा कम नी है’ बिलासपुरी तथा कांगड़ी में ‘ए चंगीया कुडीया रा कम नी हा बनता है। यहां कुड़ी’ शब्द ने जो ‘कुड़ीया’ का रूप धारण किया है वही रूप विशेषण ‘चंगी’ में भी आ गया है। ऐसा परिवर्तन पंजाबी में नहीं आता। इसी तरह पहाडी की बाहरी उपशाखा में ‘कालीयो घोड़ीया जो’ (काली घोड़ी को) का रूप पंजाबी में ‘काली घोड़ी नू’ होता है। परन्तु कांगड़ी में चम्बयाली, बिलासपुरी, मण्डियाली की तरह भीतरी पहाड़ी से कुछ भिन्न लक्षण भी हैं। भीतरी शाखा में का ओॅ में बदलना बाहरी शाखा में नहीं पाया जाता जैसे सं० सप्त > भी० सोॅ त >बा० सत, सं० अष्ट } भी० आठ या ओंठ ) बा० अठ, सं० कर्ण ) ‘भी० कान या कोॅ न > बा० कन्न आदि। भीतरी शाखा में श व्यंजन सुरक्षित है, बाहरी में श पूर्णतः में बदलता है- शरबत > सरबत, शाप > साप, शुभ > सुभ, नाश > नास, कष्ट > कस्ट आदि। रूप-तत्त्व में भीतरी शाखा का विकारी रूप एकवचन और बहुवचन में समान रहना प्रायः अखरता है। इस दिशा में बाहरी शाखा दोनों वचनों में भेद दर्शाती है।

            क्रियापद में कांगड़ी आदि बाहरी शाखा में सामान्य सहायक क्रिया संस्कृत भू धातु से विकसित हुई है- सं० भव > भोअ > हो > हो। हा स्थान भेद के कारण ए में भी प्रयुक्त होता है। भीतरी पहाड़ी में सामान्य सहायक क्रिया संस्कृत अस्ति से व्युत्पन्न हुई है- सं० अस्ति > अस्सि > औसो > औसा > सा आदि। भीतरी शाखा के भूतकालिक रूप थिया, थिये, थी बाहरी शाखा में हिन्दी की तरह था, थे, थी में प्रयुक्त होते हैं। इसी तरह भीतरी शाखा में भविष्यत् काल का प्रत्यय ला है और बाहरी शाखा में गा। भीतरी शाखा में चूंकि अस्ति के रूप प्रचलित हैं इसलिये नकारात्मक के लिए सं० + अस्ति से नाथी (नी आथि या नी ओॅ थी) अर्थात् ‘नहीं है’ बहुत प्रचलित शब्द है, जिसका बाहरी शाखा में प्रयोग नहीं मिलता। मण्डियाली-बिलासपुरी में पुरुषवाचक सर्वनाम के एक वचन में रूप भीतरी शाखा के अनुरूप हैं, परन्तु बहुवचन रूप बाहरी शाखा के हैं। भीतरी शाखा के हामे, तुम्मे के स्थान पर बाहरी शाखा के असां, तुसां का रूप मण्डी, बिलासपुर में प्रचलित है, कुलुई में आसारा और म्हारा दोनों रूप समान प्रयोग से प्रचलित हैं। बाहरी शाखा में भूतकाल के सभी रूप भूतकालिक कृदन्त के प्रयोग से बनते हैं। भीतरी शाखा में पुराघटित कृदन्त का प्रचलन है। कुलुई, मण्डियाली, बिलासपुरी में यद्यपि दोनों कृदन्तों का प्रयोग है, परन्तु अधिक प्रचलन भीतरी शाखा के पुराघटित कृदन्त का है- बसीरा, घलीरा, लिखीरे, उट्ठीरा था, पढ़ीरा हुंगा आदि।

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