भाषा की पहचान होता है व्याकरण

पहाड़ी भाषा के बारे में एक बात और कही जाती है कि इसकी कोई स्वतंत्र लिपि न होने के कारण यह भाषा कैसे हो सकती है? वास्तव में पहाड़ी भाषा के सम्बंध में अनेक तार्किक मतभेद हैं, परन्तु इसमें लिपि का तर्क सार्थक नहीं है। प्रत्येक भाषा के लिए अलग से एक स्वतंत्र लिपि का होना आवश्यक नहीं है। संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं के लिये एक ही देवनागरी लिपि का प्रयोग होता है। इसी तरह देवनागरी ही पहाड़ी भाषा की लिपि है। भारत की कुछ अन्य भाषाएं भी देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं। हालांकि राजाओं के शासनकाल में यहां टांकरी लिपि का प्रयोग रहा है। टांकरी की वर्णमाला में अलग-अलग रियासतों में परस्पर कुछ भिन्नताएं पाई जाती हैं। अतः पहाड़ी भाषा के लिये देवनागरी का प्रयोग ही सहज, सुबोध और उपयुक्त है।

Translate »
error: coming soon