बघाटी

                   यह भूतपूर्व बघाट रियासत या वर्तमान सोलन जिले की बोली है। कुछ लोग इसे निचली महासुई भी कहते हैं। आज कल इसे सोलनी भी कहने लगे हैं। अशणी नदी इसे महासुई (क्योंथली) से और काल नदी सिरमौरी से अलग करती पहाड़ी भाषा – स्वरूप और उद्भव है। दक्षिण की ओर इसका प्रभाव पिंजौर (हरियाणा) और नालागढ़ तक व्यापक है। कनिहार में इस बोली का रूप बघलाणी कहलाता है। पड़ोस की महासुई और सिरमौरी बोलियों में से सिरमौरी की ओर इसका अधिक झुकाव है। भीतरी पहाड़ी की एक विशेषता यह है कि संज्ञाओं का विकारी रूप एकवचन और बहुवचन में समान रहता है। बघाटी में यह बात अधिक स्पष्टता से उभर आई है, जैसे छोटा’ लड़का’, छोटे रा – ‘लड़के का’, छोटे – ‘लड़के (ब०व०)’, छोटे-रा ‘लड़कों का’। इसी तरह घोड़े-रा का अर्थ है ‘घोड़े का’ भी और ‘घोड़ों का’ भी। इसी तरह पहाड़ी भाषा की एक अन्य विशिष्टता अर्थात् पुरुषवाचक अन्य पुरुष में पुंल्लिंग और स्त्रीलिंग के अलग-अलग रूप होना, बघाटी में स्पष्ट है- तेस-खे ‘उस (पुरुष) के लिए’ परन्तु तिओं-खे ‘उस (स्त्री) के लिए’ आदि। बघाटी बोली अपनी पड़ोसी बोलियों से केवल सर्वनाम के क्षेत्र में पहचानी जाती है। जिसे सिरमौरी में मी-खे ‘मुझे’, तेई-खे ‘तुझे’, तेसी-खे ‘उसे’ तथा महासुई में क्रमश: मुंखे, तांखे, तेस-वे कहते हैं। इन्हीं को बघाटी में माखे, ताखे तथा तेस-खे कहा जाता है। सिरमौरी, महासुई और बघाटी तीनों बोलियों में ‘है’ के लिए औसा या औसोॅ , ‘था’ के लिए थिया, ‘थे’ के लिए थिए और ‘थी’ के लिए थी रूप प्रचलित हैं। सम्भाव्य भविष्य के लिए ‘गा’ का प्रयोग न होकर ला या लोॅ का प्रयोग होता है- पिला या पीलोॅ (पीएगा), पीलेॅ (पीएंगे), पीली (पीएगी) आदि। 

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