भद्रवाही

          प्रशासनिक दृष्टि से भद्रवाह का क्षेत्र जम्मू-कश्मीर राज्य में पड़ता है, परन्तु भाषायी दृष्टि से यह पहाड़ी भाषी क्षेत्र है। इसके अन्तर्गत तीन उपबोलियां पड़ती हैं- भद्रवाही, भलेसी और पाडरी। पहाड़ी की मुख्य ध्वनियों में चवर्गीय और च़वर्गीय का अन्तर भद्रवाही में स्पष्ट लक्षित होता है। यहां चवर्गीय ध्वनि वत्यै हैं यद्यपि पहाड़ी की कुछ अन्य बोलियों में ये दन्त्य हैं। पहाड़ी भाषा को ध्वनि की दूसरी विशेषता श्रुति का समागम भी भद्रवाही का गुण है जैसे, छेड़ ‘बकरा’, परन्तु छेई ‘बकरी’। वर्णसन्निवेश के कारण शब्दों के रूप में भारी परिवर्तन आता है। यह भद्रवाही की पहचान है, जैसे बैण (बहिन) से अन्य पहाड़ी बोलियों में बहुवचन बहणी, भैणी, बहिनें बनता है, परन्तु भद्रवाहा । बाद में आ रहे ई स्वर के प्रभाव से भीण शब्द बना है। 

                भद्रवाही बोलियों में एक अन्य विशेषता है जो पहाडी की दूसरी बात में दिखाई नहीं देती। क्या यह विशेषता लाहुल-स्पिति की भाषा का प्रभाव है। सीधे तिब्बती का? यह बात अध्ययन की अपेक्षा रखती है, परन्तु इतना स्पष्ट है। तिती भाषा के गुण भद्रवाही में विद्यमान हैं। तिब्बती वर्ण-माला में टबर्ग व  स्वरूप और उद्भव नहीं हैं, परन्तु इस का अर्थ यह नहीं कि तिब्बती में टवर्ग ध्वनियां नहीं हैं। टवग्र ध्वनियों का अस्तित्व है और बहुत है, परन्तु ये ध्वनियां अक्षर संयोग से व्यक्त होती हैं, जैसे वहां कुर के संयोग का उच्चारण क्र न होकर ट या किंचित् ट्र होता है और इसी क्रम से ख+र=ख्र न होकर ठ या किंचित् ठ्र, ग+र = ग्र न होकर ड या ड्र उच्चारण होता है। यह ध्वनि पवर्ग के अक्षरों के साथ भी पाई जाती है, यथा—प्+र् = ट् (ट्र), फ+र =ठ्(ठ्र), ब+र = ड या (ड्र) । ठीक यही प्रवृत्ति भद्रवाही की उप-बोलियों में द्रष्टव्य है। उदाहरणतया, हिन्दी भूख पंगवाली में भ्रूख होता है। और भद्रवाही में ढुलुखो। इसी तरह हिं० भ्राता > कांगड़ी भ्रा > भद्रवाही ढला; हिन्दी भालू-भ्रालू > ढलवू ; संस्कृत व्याघ्र > कुलुई ब्राघ > भद्रवाही ढलाग; हिन्दी भेड़ > चुराही भ्रड़ > भद्रवाही ढलेड; सं० त्रि > कुलुई त्राई > भद्रवाही टलाई आदि। 

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