मण्डियाली

                   मण्डियाली वर्तमान भण्डी ज़िला की बोली है। इसके दक्षिण में सतलुज नदी इसे महासुई से अलग करती है। इसके उत्तर में बंधाल का क्षेत्र है जिसके पूर्वी भाग के कुछ हिस्से में कुलुई बोली का कोहड़-सुआड़ इलाका पड़ता है और पश्चिमी भाग के बड़े हिस्से में काँगड़ी बोली का क्षेत्र है। दक्षिण-पश्चिम की ओर कुलुई की भीतरी सिराजी का क्षेत्र पड़ता है और उत्तर-पश्चिम में कुलुई विशेष । डॉ० ग्रियर्सन ने इसकी तीन उप-बोलियाँ मानी हैं- (1) मण्डियाली, (2) मण्डियाली पहाड़ी, (3) सुकेती। ध्वनि के किंचित् अन्तर के सिवाय वे इन तीनों में कोई भेद नहीं समझते, बल्कि उन्हें समान रूप बताते हैं। व्याकरण भी केवल मण्डियाली का प्रस्तुत किया गया है। वे स्वयं लिखते हैं कि तीनों में शायद ही कोई भेद हो। मण्डियाली बोली में उपर्युक्त शेष पहाड़ी बोलियों की ‘अ’ को ‘औ’ में बदलने की प्रवृत्ति कम हो गई है, जैसे मण्डी में ‘घर’ शब्द ‘घौर’ न होकर ‘घर’ रहता है, परन्तु साधारण बोल चाल में प्रायः ‘औ’ की ओर झुकाव फिर भी रहता है, जैसे ठौंड ( ठण्ड। इसी तरह तालव्य च-वर्गीय ध्वनियों को च वर्गीय ध्वनियों में बदलने की प्रवृत्ति भी कम हो गई है। परन्तु ल और ल़ स्वतंत्र ध्वनियाँ सुरक्षित हैं। शेष पहाड़ी बोलियों में भविष्यत् का प्रत्यय ‘ला’ अथवा ‘लौ’ है, परन्तु मण्डियाली में यह हिन्दी ‘गा’ के समान है। कर्म और सम्प्रदान कारक का प्रत्यय मण्डियाली में ‘जो’ है। इन भेदों को छोड़कर शेष पहाड़ी भाषा के सभी गुण मण्डियाली में विद्यमान हैं। 

Translate »
error: coming soon