मुहावरे और लोकोक्तियां

            मुहावरे और लोकोक्तियां भाषा की समृद्धि के प्रतीक हैं। ये भाषा के सौंदर्य एवं गरिमा को बढ़ाते हैं।मुहावरा वह वाक्यांश या कथन है जो अपने सामान्य या साधारण अर्थ को छोड़कर उसके स्थान पर किसी विशेष अर्थ या लक्ष्यार्थ का बोध कराए। लोकोक्ति वह विशेष कथन या उक्ति है जिसका प्रयोग जनसाधारण द्वारा अपनी बात की पुष्टि या समर्थन के लिए किया जाता है। यह अनुभव पर आधारित होती है, जिसका सम्बंध किसी सच्चाई से होता है। यह अपने कथन के अर्थ को स्पष्ट करती है।

खौटिया माटी, थाटिया बेटी

कमा कर मिट्टी, सजाकर बेटी

खेती काम करने से और बेटी सजाकर ही अच्छी लगती है

म-मो-च़िग-गी-चिङ-तङ-न, खल-पा-ग्यई-लम-छद्।

एक भेड़ के पेशाब करने से सैंकड़ों भेड़ों का रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। 

एक भेड़ पेशाब करने को रुक जाए तो पहाड़ की संकरी पगडंडी में भेड़ों की सारी चलती पंक्ति रुक जाती है। यह कहावत आज के सड़क यातायात पर भी लागू होती है।

मी-छेन ल मी दङ, दङ दो-छेन मन दो छुङ

बड़े आदमी के लिए छोटे लोग भवन की दीवार में पत्थर। 

बड़े भवनों की दीवार में चिनाई करने के लिए जैसे छोटे पत्थरों का योग होता है उसी प्रकार बड़े लोगों की समृद्धि में छोटों का योगदान रहता है।

बुरिङु बोल ज़ोगम, बिचारु बोल डेन

रिश्वत लेनेवाले सिर नीचा और सच्चे व्यक्ति का सिर ऊँचा ही रहता है।

बरे काम से बेइज़्ज़त होते हैं और अच्छे कर्म से मान बढ़ता है।

गोम्पा ख्या-ख्या युनमिग

कदम देख-देख कर आगे बढ़ाना चाहिए

बिना विचारे कोई काम नहीं करना चाहिए

खाकङो का, मोनङो शङो

मुख में अखरोट, मन में खोट

मुँह में राम-राम, बगल में छुरी

स्याणे रा गलाइरा, आम्बले़ रा स्वाद। पिच्छे ते आँवहा याद, जेबे हुई जाँहा स्याणेया रे सराध

बड़ों का कहा हुआ, आँवले का स्वाद, बाद में आता है याद। जब हो जाता है बड़े बुजुर्ग का श्राद्ध

बड़ों की नसीहत और आँवले का स्वाद बाद में ही याद आते हैं

हमालियां हिंयू, निम्बल त्यूं।

हिमालय में हिमपात ज्यों, आकाश निर्मल त्यों।

यह लोक मान्यता से सम्बंधित है।

मच्छी रे बच्चे पहले ते ही तारू हुंआहे।

मछली के बच्चे पहले से ही तैराक होते हैं।

जन्मजात गुणी होना।

बिल्ली ताँ काठा री बणाँऊ, पर म्याऊँ किहाँ करी कराँऊ

बिल्ली तो काठ की बनाऊँ, लेकिन म्याऊँ कैसे करवाऊँ।

अयोग्य व्यक्ति से कैसे कोई कार्य करवाया जाए।

गोहा क्या ज्ञान, बंदरा क्या दान।

गोह (छिपकली) को क्या ज्ञान, बंदर को क्या दान ?

मूर्ख को उपदेश देना व्यर्थ है।

छोलेयाँ ताँ छोहरूआँ कने मुँह नी लाणा।

चने और बच्चों को मुँह नहीं लगाना।

व्यर्थ में अधिक बात नहीं करनी चाहिए।

खरा खाधी रा, माड़ा बोली रा नी भुल़दा।

अच्छा खाया, बुरा बोला नहीं भूलता।

किया गया विशेष व्यवहार सदा याद रहता है।

कुत्ते हल़ बाह्ंदै, तां बैल केस रखणे थे?

कुत्ते हल चलाते तो बैल कौन रखता?

जो जिसका काम है, वह उसी को सजता है।

दुधा री गाय, कनें पुत्ते री माऊ। सबना जो प्यारी लगदी।

दूध देने वाली गाय और बेटे की माँ सबको अच्छी लगती

जिससे लाभ मिलता हो वह अच्छा ही लगता है।

दुसटा रा साथ कन्ने धारां रिया धुप्पां बड़ी देर नी रैंहदियां।

दुष्ट व्यक्ति का साथ और पहाड़ की चोटियों की धूप बड़ी

जैसे पहाड़ों की चोटियों की धूप बड़ी देर नहीं रहती, वैसे ही दुष्ट का साथ भी।

जेसरा जे लूण पाणी खाणा, तेसरा ई गुण गाणा।

जिसका नमक-पानी खाना, उसी का गुणगान करना।

जिसने आपका अच्छा किया हो उसके प्रति वफदार रहना चाहिए।

कारु रेटांग जांग थोरकेला तब थोर केला इच्चे। 

गधे के कान में सोना डालें या राख, सब बराबर

यह कहावत धूर्त लोगों पर चरितार्थ होती है क्योंकि उन्हें चाहे कितना भी सम्मान या प्यार क्यों न दो वह कुटिलता ही करेंगे।

ती-म्-तंग-दा बप्चा लेहच़ी

जल के आने की सम्भावना से ही बप्चा अर्थात् ऊनी जूता पहन लेना

यहाँ जल से अभिप्राय बर्फ़ से है, अत्यधिक ठण्ड के डर से गर्म ऊनी जूता पहन ले अर्थात् किसी भी भय की आशंका में उससे बचने की अग्रिम तैयारी करने का भाव है।

कौडूओ कोडूओ थू-थू, मीठौ-मीठौ हड़प

कड़वा-कड़वा थू-थू, मीठा, मुँह में

आसान काम के लिए आगे आना और कठिन कार्य से दूर भागना

खाई पीया खशकदे

खा-पी कर भागे

स्वार्थी होना अर्थात् मतलब निकलने के बाद पहचान खत्म

गरमी पसीने गाही तेभी पाछो जे पीयो पाणी, घरा आडले बोलो गाओ बाजो डाओ आणी

गर्मी-पसीने पर जो पिए पानी, घर के बुजुर्ग कहते बजंत्री लेने बुला

इसका तात्पर्य है कि गर्मी पसीना आने के तत्काल बाद पानी पीना मौत को निमंत्रण देना है

बाहे आलू, कर्जा शालू

आलू की पैदावार से कर्जा खत्म करना

आलू की नकदी फसल उगाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना

ऊणा घड़ा छलकन्दा

आधी भरी गगरी छलकती जाती

जो व्यक्ति आधा ज्ञान लिए होता है वह विद्वता का अधिक दिखावा करता है

जिसा पतली खाणा, तिसा जो ई छींडा करना

जिस थाली खाणा उसी में छिद्र करना

विश्वासघात करना

झोटे जो चिण्डू देणा, अपणा नैंह भन्नणा

भैंसे को चूंटी देना, अपना नाखून तोड़ना

बलवान से टक्कर लेना, अपनी ही हानि करना है

डुग्घे पाणी वी नी जाणा, बड्डी मच्छी बी मेरी

गहरे पानी भी नहीं उतरना, बड़ी मछली भी मेरी

बिना परिश्रम के ही अधिक प्राप्ति की आशा रखना

जागदे री कट्टी, सुतोरे रा कट्टू

जागे हुए के कट्टी; सोये हुए का कट्टू

जो जागता है अथवा अपने काम के प्रति जागरूक रहता है, उसे ही लाभ होता है। आलसी और कर्महीन व्यक्ति को हानि ही उठानी पड़ती है।

जितणी खाखा, उतणी भाखा

जितने मुँह, उतनी बातें

समाज में विभिन्न लोगों द्वारा तरह-तरह की अटकलें लगाना

नदी कनारे झोंपड़ा, इक दिन होये नास्सा

नदी किनारे आवास, एक दिन होगा नाश

नदी किनारे घर बनाने से हर समय उसके नष्ट होने का भय रहता है

सौ दवा, इक हवा

सौ दवा, एक हवा

शुद्ध वायु के सेवन से अनेक बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। शुद्ध हवा को सौ दवाईयों के बराबर बताया गया है

पत्थरा तू गोल किहयाँ हुआ, ए रूल़की रूल़की करी

पत्थर तू गोल कैसे हुआ? लुढ़क-लुढ़क कर

कष्ट सहन करने के बाद ही मनुष्य परिपक्व बनता है

अणु खेचो रो करगाणू बासा

अणु में खेत तो करगाणू में घर

खेत कहीं तो घर कहीं दूर

एक थिया राम, रेका थिया रांवटा, एके आणी हार, रेके फूका तेसरा गांवटा

एक था राम दूसरा था रावण। रावण ने राम की स्त्री का हरण कर लिया तो राम ने उसका गाँव जला दिया

यह रामायण का सार ‘बुरे काम का बुरा फल’ के लिए है

गुड़ने आले़ बौरशदे नांई 

जो गरजते हैं वह बरसते नहीं

ज़्यादा शोर मचानेवाले कुछ नहीं करते

शेड़े कै चेंई, दू आखी

अंधे को चाहिए, दो आँखें

आदमी के पास जिस वस्तु की कमी होती है, वह उसी की कामना करता है।

गंगा गए हाड्डू नी हटदे

गंगा गई हड्डियाँ वापिस नहीं आतीं

बिगड़ी हुई बात फिर से नहीं बन पाती

चिड़िया रा दुध नी, बाकी सबकुछ

चिड़िया का दूध नहीं, बाकी सबकुछ है

सभी प्रकार से सम्पन्न होना

बौरशिओ काल नहीं

अधिक वर्षा से अकाल नहीं पड़ते

वर्षा होने पर अकाल नहीं पड़ता अर्थात् दान देने से धन की कमी नहीं होती

मंत्रिये बीश मोरेन्दे

चतुर बीसों को मार देता है

चतुर व्यक्ति के सामने बड़े-बड़े बाजी हार जाते हैं

पगड़ी मुंडौ दी लागौ, जानू दी नाई

पगड़ी सिर में बाँधी जाती है, घुटनों में नहीं

प्रत्येक वस्तु यथास्थान ही शोभा देती है, वर्ना हँसाई होती है

फील सिक्की रो, ठाडा पटिक्की रो, पहुँचो एक्की ठैंह

फील सरक के और टिट्डा उटक कर, पहुँचते एक ही जगह

उछल कर दिखावा करनेवाला व्यक्ति और धीरज और सलीके से चलनेवाला आखिर दोनों एक ही जगह पहुँचते हैं

जे आल़ो न नोइया ले, ता ठालो आ नोइया

अगर बचपन में नहीं नहाएगा तो बुढ़ापे में क्या नहाएगा

यदि बचपन से काम नहीं सीखेगा तो बुढ़ापे में क्या सीखेगा। यानी बचपन से काम करना सीखना चाहिए ताकि आगे चलकर मुश्किल न हो

जो सुथण सियो, सेह नाड़े री जगह पहले राखो

जो सलवार सिलवाता है, वह नाड़े के लिए पहले से जगह रखता है

जिस व्यक्ति को ठीक से काम करना आता है, वह अपने काम के लिए पहले ही सारे ज़रूरी प्रावधान रखता है

आपी खरे तौ जग खरा

स्वयं ठीक तो संसार भी ठीक

आप अच्छे हैं तो संसार के अन्य लोग भी अच्छे ही लगेंगे या आपके साथ अच्छा व्यवहार करेंगे

औक्खा सौक्खा बौक्त काटणा

बुरा-अच्छा वक्त गुज़ारना

जैसे-तैसे मुश्किल समय के दिन धैर्य, साहस से निकालना

आईया मूंछाँ केस खे पूछाँ, आई दाढ़ी गल्ल बगाड़ी

आई मूंछे किसको पूछे, आई दाढ़ी बात बिगाड़ी

किशोरावस्था प्राप्त होने पर मौज-मस्ती रहती है, लेकिन युवा होने पर जिम्मेदारियाँ और मुश्किलें भी बढ़ जाती हैं

गोहा जो मिली गोह् , जदेयी ओह्, तदेयी ओह्

गोह को मिली गोह, जैसी वह वैसी वह

एक जैसे व्यक्ति का साथ होना। दोनों का आदत में एक समान होना

हक्क ध्याड़ा सस्सा रा, इक्क बहुआ रा

एक दिन सास का, एक बहू का

कभी न कभी सभी के दिन अच्छे आते हैं

कुआँरा चलेया कुड़माईया, अपणिया करें कि पराईया

कुँवारा चला सगाई करवाने, अपनी करे या दूसरे की

जो अपना काम न करवा सके, वह दूसरों का क्या करेगा

कुसी दा सराद पढ़ी देणा

किसी का श्राद्ध पढ़ देना 

किसी के विषय में बुरा कहना, निन्दा करना

खाणे जो जुड़दा नी, कने नां क्या जे भत्तखाऊ

खाने को मिलता नहीं और नाम भत्तखाऊ

गुणों के विपरीत नाम होना अर्थात् आँख का अंधा नाम नैनसुख

घरे नी गाँ बच्छी, नींद औए अच्छी

घर में नहीं गाय-बछड़ी, नींद आए अच्छी

जिस के पास कुछ नहीं है, वह आराम से सोता है

चूहे जो मिली सुण्डी री गट्ठी, सै बण बैठ्या पणसारी

चूहे को मिली सौंठ की गाँठ, वह बन बैठा पन्सारी

छोटे व्यक्ति को यदि कुछ अधिक मिल जाए तो वह छिछोरा बन जाता है 

छाली दित्ते नी दरिया लघंदे

छलाँग लगाने से नहीं दरिया पार होते

केवल जल्दी मचाने से बड़े कार्य नहीं होते

जित्थी जे धरम, उत्थी कै भरम

जहाँ धर्म, वहाँ क्या भ्रम

सामाजिक व्यवहार में जुबान से निकले हुए शब्दों पर विश्वास किया जाता है, पर शक की कोई भी गुंजाइश नहीं रहती

बड्डे पकड़ी बाँह, ताँ क्या देणी नाँह

बड़े ने पकड़ी बाजू तो क्या करना इनकार

जब अपने से बड़ा आदमी किसी कार्य को करने को कहे तो इनकार नहीं किया जाता

कपाही रा जीजू, नंगे रा नंगा

कपास का कीड़ा नंगे का नंगा

भाग्यहीन व्यक्ति यदि सम्पन्न घर में भी जन्म ले तब भी वह विपन्न ही रहेगा। कपास का कीड़ा, कपास में रहने पर भी नंगा ही रहता है

जित्थू कुक्कड़ नी हुन्दे, क्या तित्थु भ्याग नी हुन्दी

जहाँ मुर्गे नहीं होते, क्या वहाँ सुबह नहीं होती

किसी के न करने से कार्य नहीं रुकते

 धेल्ला हत्थे औंदा पर बेल्ला हत्थे नी औंदा

पैसा हाथ में आता है पर समय हाथ नहीं आता

समय की गति को कोई नहीं रोक सकता। पैसा तो हाथ आ जाता है लेकिन निकला हुआ समय दोबारा हाथ नहीं आता

खोटा पुत कने ढऊआ बग्ते पर कम औन्दा

निकम्मा पुत्र और पैसा समय पर काम आता है

किसी को निकम्मा और बेकार समझ कर नहीं ठुकराना चाहिए। क्या पता किस वक्त किसकी ज़रूरत पड़ जाए

इक तां नचणा नी जे नचणा ताँ खोले पाणे

एक तो नाचना नहीं, अगर नाचे तो गड्ढे डालना

एक तो काम नहीं करना यदि किया तो बिगाड़ कर रख देना

समा कुसी जो नी न्याहलदा

समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता

समय निरंतर चलता रहता है, किसी काइंतज़ार नहीं करना 

एक जिह्वा घोड़ा भी दिंदी कने जोड़ा भी दिंदी

यह जिह्वा घोड़ा भी देती और जूते भी देती

वाणी की मधुरता सिंहासन पर भी बैठा सकती है और कटुता जूतों की मार भी दिल सकती है

कल ढोलक मढ़वाई, अज गुवईया बणीया

कल ढोलक बनवाई, आज गायक बन बैठा

अधूरा ज्ञान पाकर ही अपने को उस कला का माहिर समझ लेना

दुध कढ़दा खरा, मुंडू पढ़दा खरा

दूध कढ़ा हुआ अच्छा, लड़का पढ़ा हुआ अच्छा

दूध काढ़ने से स्वादिष्ट बनता है, उसी तरह लड़का पढ़-लिख कर अच्छा बनता है

कामा रा कीड़ा

मेहनती व्यक्ति

घियू खिचड़ी हूणा

बहुत मेलजोल होना

तुड़का लाणा

चालाकी करना

काण्डेया रे मुँह पैनें

होनहार व्यक्ति होना

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