संविधानो री मंजूरी

हिमाचली भाषा होर संविधानो री मंजूरी

अमर देव आंगिरस / हिम भारती अंक 151

किसी बी देशो होर प्रान्तों री पछयाण तेतरीया भाषा होर बोलिया दे मिलो। आपणिया बोलिया दे ही आपणे समाजो रे रीति रिवाज, विश्वास होर मानता नवीं पीढ़िया दे समझयाणे री तैंई आसानिया दे कामे आओ। मां बोली जेतखे मातृभाषा बोलो तेत दे ही प्ररखेया रा ग्यान हो, तेबे ही एत री जरूरत पढ़ने-पढ़ाने होर आपू बीचे बोलणे खे जरूरी समझया जाओ। जे आपणी बोलिया खे बढ़ावा नी देया जाओ तो आपणे अच्छे रीति-रिवाज होर लोक साहित्य राची जाओ। दुनिया रे सब देश आपणी आपणी बोलियां रे कारण ही वणी रे- ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, रूस, अरब देश, अफ्रीका रे देश, एतरे सबूत हाए। आसा रे भारते रे 22 प्रान्त भी भाषा रे आधारो पांदे बणाया गए थे।

आजादिया रे बने 14 भाषा पांदे प्रान्त बणाया गए थे। इनां 14 भाषा खे देशो रे संविधानो री मंजूरी मिली थी। एतरी मंजूरी संविधानों री धारा 8 वीं अनुसूचीया दे दर्ज हुई। प्रान्ता रा आधार बोली भाषा होर इलाके या री बनावट थी। हिमाचल पहाड़ी प्रदेश था ओर एतरी 9 खास बोलियाथिया। प्रान्ता रे बणाणे रे बने एतरी कोई भी बोली संविधानों री मंजूरिया खे शायद ठीक नहीं समझेया गई। इयां भी तेस बख्ने भारतो दे 600 बोलिया बोलो थे, एकदम इना रा कट्ठा करना आसान नहीं था।

15 अप्रैल, 1948 खे शिमला हिल्ल स्टेटसो’ रीया 30 रियासती कट्ठिया करी की हिमाचल प्रदेश पहाड़ी प्रदेश बनाया गया। एतदे चम्बां, मण्डी, सिरमौर होर महासू मलाए गए। पर कुछ पहाड़ी इलाके जिन्ना री बोली पहाड़ी थी सेयो पुराणे इन्तजामो रे कारण पंजाबों दे ई रैई गे थे। यो पहाड़ी इलाके थेकण्डाघाट, सपाटू, कसौली, चैल, नालागढ़, कुल्लू, कांगडा। इना इलाके या री बोलिया भी पहाड़ी ही मान्या जाओ थिया। यो भी हिमाचलों री दूजी बोलिया री तरहा एक ही मूल भाषा शौरसेनी अपभ्रंशो ते निकलियां थिया। इना रा एक ही मूल था। 1963-64 दे पंजाबी सूवा री मांगा रे कारण भाषा रे आधारों पांदे पंजाबो रे यो पहाड़ी प्रदेश एक नवम्बर , 1966 रवे हिमाचलो दे मिलाया गए।

एबे एत्ती री बघाटी, सिरमौरी, क्योंथली, सतलुज सराजी, मण्डयाली, चम्बयाली बोलिया साथे कांगड़ी, कुल्लवी, हिण्डरी बगैरा भी मिली गियां। एबे यो 9 मुख्य बोलिया कट्ठिया हुई गियां, जो मूलो दे एक समान थियां। पहाड़ी प्रदेशों री पछयाणी तईं एत्तरी मुख्य बोलियों रा रूप या नाओं राखणा जरूरी था। पर कुण पहाड़ी नौ बोलियां बोल्या जाओ थिया। ये एक यक्ष सवाल था। असल गल्ल ए थी भई इन्ना बोलियां रा लिखित लोक साहित्य सामणे नई आया था। एत्त कनारे बौत बड़े भागीरथ कोशिशा री जरुरत थी।

कांगड़ी जो सबनी ते बड़ी बोली थी से हिमाचली भाषा बणी सको थी। पर तेत बख्तो रे नेतेया री भूल बोलो चाहे खुदगर्जी तिन्ने कांगड़ी बोली पंजाबी बोलिया री उपबोली मानी ली; जेबे कि ये गलत था। 1896 ई. रे सर्वेक्षणों दे अंग्रेज अफसर ग्रियर्सने होर बादले विद्वान सबूत देई कि बताया कि कांगड़ी पाहड़ी बोली आए। खास करी कि डॉ. किशोरीदास बाजपेयी होर डॉ. सिद्धेश्वर वर्मा एत्तरे हमायती थें कांगड़ी बोलिया रा सभी ते बड़ा नुकसान तेबे हुआ जेबे 1971 री जनगणना दे कांगड़ी बोलिया री जगहा दे डोगरी लिखाया गई। एत्तरीया बजा ते ही भाषा रे शशोपंजोदे कांगड़े रे कवि लेख डोगरी भाषा रे नांओ पादे आपणीया कविता होर लोक साहित्य रचदे रहे। असल गल्ल ए थी भई कवि लेखका खे एबुओं तक कोई मंच या हिमाचलो दे आकाशवाणी होर अखवार वगैरा नई थे।

आज पूर्ण राज्य बणने ते बाद हिमाचल साहित्य काफी फलीफूलीगा दा। सरकारे 29 मार्च, 1968 खे ‘राज्य भाषा संस्थान’ बणाणे ते बाद भाषा संस्कृति विभाग बणाया। 1955 दे आकाशवाणी शिमले ते पहाड़ी लोक साहित्य प्रसारित हूणे लगे। लोक-सम्पर्क विभागों री पत्रिका हिमप्रस्थ भी छपणे लगी। बाद भाषा संस्कृति विभागों री पत्रिका हिमभारती सोमसी पहाड़ी लेखका रा मंच वणीगा। 40-50 साला दे भारी मात्रा दे लोक साहित्य होर हिन्दी साहित्य सामणे आईगा दा। आज राष्ट्रीय तुलना दे हिमाचलो रे लेखक बढ़िया लिखणे लग्गीरे। आज ‘विपाशा’, ‘गिरिराज’, ‘सोमसी’ ही नई प्रदेशों रे दैनिक अखबार, दूरदर्शन, होरनिजी पत्र-पत्रिका भी साहित्यो खे बढ़ावा देणे लगीरे।

इना सबनी पत्र पत्रिका दे पहाड़ी भाषा री बर्तनी होर अक्षरलिखणे दे वरावरी आईगी दी।

संविधान मंजूरिया खे जरुरी नियम

किसी बी बोली या भाषा खे संविधानों री 8वीं अनुसूची दे मंजूयिा खे कुछ शर्ता ए- कोई बी बोली तेबे ही भाषा मान्या जाणी जेबे तेत्तरी आपणी ‘लिपि’ हो।,आज हिमाचली भाषा देवनागरी लिपिया दे लिख्या जाओ ए।अजादिया ते पैहले ये ‘टाकरी’ लिपिया दे लिख्या जाओ थी। दूजी शर्त । बोलिया बोलणे वाले लोग जादा मात्रा दे हो। तेत्ता बोलिया दे बडीया मन दे साहित्य हो। तेत्ता भाषा रा मानकीकरण’ हो, मतलब शब्दा रा रूप एक समान हो। भाषा रा आपणा ‘शब्दकोष’ हणा चाहियो। होर तेत्ता मुख्य भाषा होरी बोलिया रे लोग भी समझी सको। आज इनां शर्ता हिमाचली भाषा परीया करोए। हिमाचली भाषा आज देशो री दूजिया कई भाषा री तरहा देवनागरी लिपिया दे लिख्या जाओ।

सबनी बोलिया रा इतना प्रचार हाए भई सारे प्रदेशो रे लोग इना आसानि दे समझी सको ए। 50 साला दे लिखणे-बोलणे ते एतरा मानकीकरण हुईगा दा, मामूली फरकए। एड़ा तो देशो री सबनी भाषा दे लहजे, होर मामूली व्याकरणों रा फरक मिलो ए। बोलो भी ए, मई कोस-कोस में बदले पाणी चार कोस में बाणी।

कला-भाषा संस्कृति अकादमी हिमाचली भाषा रा शब्दकोश भी त्यार करीता दा। लोक साहित्य कविता कहाणी, लोकगीत, देवगाथा लोक नाटक, बगैरा आज काफी मात्रा दे छपी चुकेया दा। ये गल्ल नी ए भई पहाड़ी रचना आजादिया दे बाद ही सामणे आईरीयां बल्कि,14-15 बीं शतीया ते आसा रा साहित्य बड़ी शिरोमणी था। डॉ. मनोहर लाल जी रा मत ए भई चरपटनाथ पहाड़ी बोलिया रेपहले कवि थे। गुलेर दरवाजों में 18वीं शती ई दे राजा बलदेव सिंह जी री गीतिया मिलो ए। हिमाचली भाषा साहित्यकारा बीचे ब्रजभाषा दे कांशीराम जी री रामगीता होर 1743 दे रुद्रदत्तो रे छन्द मिलो ए।

आजादिया री लड़ाइया दे पहाड़ी गांधी बाबा कांशी राम कवि क्रान्तिकारी हूणे साथ शिरोमाणी कवि भी थे। पहाड़ीया रे शोध करने वाले डॉ. पीयूष गुलेरी लिखोए भई जैन मुनि स्वयंभू पहाड़िया रे पहले कवि थे इयां इना खे हिन्दी भाषा रा पैहला कवि भी मान्या जाओ। एत्तरा उदाहरण एकी लफ्जो दे देखी सको-

‘भला हुआ जो मारेया, बहिणी म्हारा कंतु।’ इयां राजस्थानी बोलिया जयपुरी, हाड़ौती, मेवाती बगैरा बोलिया रा असर सबनी पहाड़ी बोलिया दे एत बजहा ते भी मिलो भई एत्ती री 30 रियासती दे इन्ना इलाकेया ते राणे रजवाड़े ठाकुर मुगला रे बख्ने एत्ती आए थे। कुछ शब्द मिलोए- ‘म्हारा, तेरो, मेरो, जाणा-खाणा, पीणा-न्हाणा, होई-गोई, जावो-खावो, जिवडा, हिवड़ा आदि। यो चौहान सेन, चन्देल, परिहार, तनवार, देव, परमार बगैरा मध्यदेश राजस्थानों रे योद्धा राजकुंवर थे।

पहाड़ी बोलिया रा इतिहास हिमाचली बोलिया रा साहित्य 15-16 वा शती ई. दे टाकरी लिपि दे मिलणा शुरुओ। कांगड़ा, कुल्लू, चम्बा राजेया रे दरबारा दे कुछकाव्य कताबा टाकरी लिपिया दे मिलिया थिया। पूर्ण राज्य बणने ते पैहले कुल्लुवी दे डॉ. पद्म चन्द कश्यप जी रा शोध ग्रंथ कुलुवी लोक साहित्य , होर डॉ. बंशीराम शर्मा जी रा शोध किन्नर लोक साहित्य छपी की आया था। तेत ते बाद जिला वार कई शोध कताबा सामणे आईया। डॉ. परमार, लालचन्द प्रार्थी, नारायण चंद पराशर बगैरा विद्वाने पहाड़ी साहित्य आगे बढ़ाया।

हिमाचली भाषा खे बढ़ावा देणे वाले अणगिनत कवि-लेखक हए जिन्ने अलग-अलग बोलिया रा साहित्य रच्या होर ऊच्च स्थान दित्या। कुछ बड़े नाओं डॉ. मौलूराम ठाकुर डॉ. पीयूष गुलेरी, प्रत्यूष गुलेरी, डॉ. गौत्तम व्यथित, संसारचन्द प्रभाकर, डॉ. कांशीराम आत्रेय, डॉ. ओम प्रकाश सारस्वत, डॉ सुशील कुमार फुल्ल, भीमदत्त काले, नरेन्द्र अरुण, ईश्वरदत्त शर्मा, जयदेव किरण बगैरा कई साहित्यकार ए जिन्ने शोधकार्य होर आपणी कविता साथे पहाड़ी साहित्य बुलन्दिया तक पहुंचाया। आज तो हजारो नये-पुराणे साहित्यकार हिमाचली भाषा दे रचना करने लगी रे।

हिमाचली भाषा किसी भाषा ते कम नई –

“अगर हिमाचली भाषा री तुलना एसा री बहण बोली डोगरी भाषा साथे करनी हो तो किया भी डोगरीया ते कम सुधरी नी है। डोगरी भाषा दे एबुओ तक 500 ते कुछ ज्यादा लोकगीत इकट्ठे करी की छपी रे। एकी शोध लेखो रे अनुसार एक दर्जण कहाणी संग्रह 5-6 उपन्यास, 6-7 नाटक, 5-6 निबन्ध संग्रह होर लोक कथा संग्रह छपी चुके दे।

“एतरी तुलना दी हिमाचल भाषा दे दुगणी रचनांवा छपी चुकीदिया। डोगरी भाषा री लिपि टाकरी थी, पर एबे ये देवानागरी लिपिया दे लिख्या जाओ।

2003 दे मंजूरी मिली की डोगरी संविधानों री 8 वीं अनुसूवियां दे शामिल हुइगी होर एसा भाषा खे भारत सरकारा रा पूरा अनुदान तो मिलोए ही, साहित्यकारा खे भी पुरस्कार होर सम्मान मिलोए। डोगरी 40 लाख लोका री भाषा है जेबे कि हिमाचली 75 लाख लोका री भाषा ए।

मैथिली भाषा भी एकी इलाके री बोली थी जिसा खे संविधानों री मान्यता मिली। विद्यापती कवियों री पदावली बड़ी मशहूर हुई तेबे कई दूजे कविये भी मैथिली भाषा दे काव्य रचना कित्ती। एतरे बोलणे वाले तो काफी ए, पर एतरिया भी हिमाचली भाषा री तरहा कई उपबोलिया ए- सोती पुरा, पूर्वी कुर्था, देहाती जोलाहा, किसान, दक्षिणी नेपाली होर ठेढिया। ‘तिरहुता’ लिपि हून्दे भी ये देवनागरी लिपिया दे लिख्या जाओ।

संथाली जो 60 लाख जनजाति लोका री बोली थी, एतरा कोई खास साहित्य नहीं मिलदा। 20वीं शताब्दीया ते पैहले एत्ता बोलिया दे ईसाई मिशन ये आपणे धरमो रे प्रचारों तई संथाली अपनाई। पर डोमन साहू समीर साहित्यकारे संथाली भाषा रा लोकसाहित्य इकट्ठा कित्या। 2003 इदे ये भी संविधानों री मंजूर सूचीया दे मिलाया।

बोडो भाषा खे भी एत तरीके दे संविधानों री मंजूरी मिली, भई एत भाषा दे बोडो जनजातिया रा हजारा वरशा रा इतिहास ए। बोडो भाषा तिब्ब्ती-वर्मी भाषा ए। एतरे बोलणे वाले 33 लाख लोग है ये असम राज्यो री सरकारी भाषा बणीगी दी। एसा भाषा दे 1915 दे गंगाचरण कछारी साहित्यकारे बोरोनी फिसा ओ ओयेम होर ‘बोडो भाषा और सम्बन्धित कानून कताबा लिखी की एतरा ऊच्चा स्थान बणाईता। एत्तरा सारा लोक साहित्य 1920 ते 1940 बीचे विवर नाओं पत्रिका करी सामणे आया। 2003 दे एत भाषा खे भी मैथिली, संथाली बोलिया साथे संविधानों री मंजूरी मिलीगी।

एत नजरिए ते दूजीया भाषा साथे सन्याणे ते हिमाचली भाषा संविधनों री मान्यता खे पूरा हक राखो। किसी एक बोली भाषा खे मुख्य मानी की होरी बोलिया रा साहित्य कट्ठाकरी की हिमाचली भाषा रा एक रूप बणाई जाया सको। ये बोलिया क्योंथली मण्डयाली, कहलूरी, बघाटी बाघली या कांगड़ी भी हुई सको। लोका रे बर्ताओ री एड़ी बोलीया रा चुनाव हूणा चाहिओ जेदे हिन्दी शब्दा री अधिकताओ होर वर्तनी हिन्दी भाषा ते ज्यादा मिलो, पुराणे हिमाचलो री बोलिया दे हिन्दी भाषा ज्यादा असर मिलो ए। यो बोलियों पुराणे जमाने ते 500 वरशा ते आपू बीचे, वर्ताओं होर साक-सलबन्धा रे कारण आसान भी लगो। कांगड़ी कुल्लुवी बगैरा पंजाबी बोलिया रे प्रभावो दे ज्यादा रहिया। किसी एकी बोलिया मुख्य बणाणे ते बादोते आहिस्ता-आहिस्ता सबी बोलिया रे शब्द एदे आऊदै रैहणे होर एक रुप साहित्य बणी जाणा। खड़ी बोलीया दे भीपैहले कई उपबोलिया थिया।

‘एबू सिर्फ संविधानों री मंजूरी जरुरी ए। मंजूरी मिलणे तो हिमाचलों री संस्कृति तो बचणी ही, साहित्यकारा खे देशो दे सम्मान हौर पुरस्कार भी मिलणे। बढ़ावा देणे तईं सम्मान तो जरुरी ए। पुराणे जमाने दे राजे महाराजे कवि लेखका खे सम्मान आदर देओ थे तेबे ही तिन्ने अच्छे-अच्छे काव्य ग्रंथ रचे।

अगर हिमाचली भाषा खे मान्यता नी मिली तो हिमाचल हिन्दी भाषा प्रदेश मान्या जाणा होर एतरी लोक-संस्कृति राची जाणी।

 

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