सिरमौरी

                सिरमौर जिले में बोली जाने वाली पहाड़ी भाषा के रूप को सिरमौरी कहते हैं। यह दक्षिण, दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम में कलसिया, देहरादून और अम्बाला की हिन्दी, पश्चिमोत्तर में बघाटी, पूर्वोत्तर में महासुई और पूर्व में जौनसारी से घिरी है। गिरी नदी सिरमौर जिला को उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर लगभग दो बराबर भागों में बांटती है। इसी के प्राकृतिक विभाजन के आधार पर सिरमौरी बोली के दो स्थानीय रूप माने जाते हैं- गिरिपारी और गिरीअवारी । गिरीअवार क्षेत्र में प्रसिद्ध पर्वत-शृंखला धारठी पड़ती है और इसी के नाम पर गिरीअवारी का अधिक प्रचलित नाम सिरमौरी-धारठी है। डॉ० ग्रियर्सन इन दोनों के अतिरिक्त जुब्बल विशेष की विश्शऊ बोली को भी सिरमौरी का एक रूप मानते हैं, परन्तु स्थानीय लोग तथा विद्वान गिरीपारी और विश्शऊ में कोई अन्तर नहीं समझते बल्कि, उनके अनुसार गिरीपारी का वास्तविक नाम विशाऊ है। भाषायी दृष्टि से गिरीपारी, धारठी और विशाऊ में कोई विशेष अन्तर नहीं, सिवाय इसके कि धारठी पर हिन्दी का प्रभाव अधिक है। सिरमौरी में पहाड़ी के सभी गुण हैं अर्थात् अ को ओॅ में बदलने की प्रवृत्ति, ए और ऐ के बीच ऍ की ध्वनि, ह का कोमल रूप या ह्रास जैसे भी के लिए बी, घर के लिए ग्होॅर आदि, कठोर व्यंजनों के कोमल में बदलने की प्रवृत्ति, संज्ञा का विकारी रूप में एँ में बदलना आदि। इसके अतिरिक्त यहीं से ही पहाड़ी की चवर्गीय ध्वनियों का भी आरंभ होता है। च को च़, छ को छ़, ज को ज़ और झ को झ़ में बदलने की पहाड़ी भाषा की मुख्य विशेषताओं में से एक प्रवृत्ति है। यही नहीं कुलुई और सिरमौरी जैसी कुछ बोलियों में च़वर्गीय और चवर्गीय अलगअलग स्वतंत्र ध्वनियां हैं। सिरमौरी बोली कारक के क्षेत्र में दूसरी बोलियों से भिन्न पहचानी जाती है। इसमें अपादान के लिए दा प्रत्यय है जो कभी दो में भी बदलता है- मीं दा (मुझ से), छोटे दो (लड़के से)। 

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