संज्ञा

संज्ञा उस विकारी शब्द को कहते हैं, जो किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, भाव, अवस्था, गुण या कार्य का नाम हो। पहाड़ी में हिन्दी की भांति संज्ञा शब्द पांच वर्गों में विभाजित किये जा सकते हैं, यथा –

  1. व्यक्तिवाचक : जो शब्द किसी विशेष व्यक्ति, स्थान या वस्तु का ज्ञान कराता है, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं, जैसे- बशाखु, ब्रिकमू, भाद्र, शिमला, रामायण, धर्मों, महाभारत, मंगलू आदि।
  2. जातिवाचक : जिस शब्द से सम्पूर्ण जाति का बोध होता है, जैसेबाह्मण, खश, डूमण, कुकर, बरेल, बाघ, माण्डू, सुंगर ‘सूअर’, डंग ‘कुत्ता’, गाओ ‘गाए’, बांदर ‘बंदर’, महेश ‘भैंस’, बौल्द ‘बैल’, बच्छू ‘बछड़ा’, काचों ‘आटा’ आदि।
  3. समूहवाचक : जो शब्द समुदाय या समूह को प्रकट करें, जैसे- छंड ‘झुंड’, डार ‘पक्षियों का समूह’, राश ढेर’, फौउज़ ‘फौज’, जौक ‘अधिक’, शाल ‘भेड़-बकरियों का समूह’, हेड़ ‘पशुओं का समूह’, बालर ‘चिड़ियों का समूह’, खंधा ‘भेड़ बकरियों का समूह’ (ए खंधा मेरा है)।
  4. द्रव्यवाचक : जिससे किसी द्रव्य का ज्ञान हो, जैसे- कांसा, सुन्ना ‘सोना’, माटा ‘मिट्टी’, घिऊ, तांबा, दुध, तेल, मौ/मौखर ‘शहद’ आदि।
  5. भाववाचक : जो शब्द किसी गुण, दोष, स्वभाव, दशा, कार्य, भाव, विचार आदि का बोध कराए जैसे- पयाशा ‘प्रकाश’, न्हेरा ‘अंधेरा’, बेदण ‘वेदना’, बसाह ‘विश्वास’, शोख ‘प्यास’, रीश ‘ई’, चीश ‘प्यास’, रोह ‘क्रोध’, मीश ‘गुस्सा’, हिरख ‘ई’, हॉल ‘ई’ आदि। उदाहरणतः मिंजो दिखी के उस जो हॉल पई गिया (को०) ‘मुझे देखकर उसे ईष्र्या हो गई’। कोई सुंगें हिरख-मिश नी केरनी (कु०) ‘किसी से ईर्ष्या क्रोध न करो |

संज्ञा शब्द स्रोत

पहाड़ी में संज्ञा शब्द अनेक स्रोतों से उपजे हैं, यथा

तत्सम शब्द : तत्सम शब्दों से अभिप्राय उन शब्दों से है जो संस्कृत में ठीक उसी रूप में वर्तमान भाषाओं या बोलियों में प्रयुक्त होते हैं, जैसे- अंग, अंश अंत, अकाल, अति, अवतार, आदर, इष्ट, ऋण, ऋषि, एक, कण्ठ, कथा, कण कलंक, काया, कुण्ड, कुशा, खर, खील, गणना, गुरु, गदा, ग्रह, गुण, ग्रहण, घुण, चूर्ण, चिह्न, चन्दन, छर्द, छिन्न, जंघा, जटा, ज्ञान, जय, झुण्ड, ढाल, तुलसी, तपस्या, तुष, दया, देश, द्वार, दश, दाह, दान, देवी, दोष, धूप, ध्यान, नट, नाग, नाश, नरक, पाप, पशु, पिष, फल, बलि, बीज, भज, भोग, भाग, भंडार, म्लेच्छ, मुनि, मिश, मेला, मोह, मांस, महात्मा, मेल, रंग, रथ, रस, रोग, राहु, रोष, रुच. रुष, राजा, लेख, लोक, लीला, लेप, सूतक, हल, हवन।

तद्भव : तद्भव वे शब्द हैं जो संस्कृत शब्दों के ठीक समान नहीं हैं, अपितु कुछ विकृत रूप में प्रयोग में आते हैं, यथा-‘अंजल < सं० अञ्जलि, आग २ सं० अग्नि, अथरू < सं० अश्रु, आध अर्ध, औरा < अवरः, आरशु < आदर्शिका, आंज < आंत्र, ओकती < ओषधि, आखर < अक्षर, अस्सी < अशीति, हिरख < ईर्ष्या, उपाड़ना < उत्पाटन, एंडा < एतादृश्, एड्डा < एतावत्, ओठ < ओष्ठ, औधा < अर्ध, वैथ < कपित्थ, कपा < कर्पास, कुख < कुक्षि, कोढ़ी < कुष्ठी, कलार र कल्याहार, कोसा < कोष्ण, खुर < क्षुर, खाज < खर्जु, गधा < गर्दभ, गाब्भण< गर्भिणी, गड < गिन्दुक, गोंठा < ग्रन्थि, ग्रां < ग्राम, गोदला < गोधूलि, गाची < गत्रिका, घिसणा < घर्षण, घोड़ा < घोटकः, चुट < त्रुट, छेत्त < क्षेत्र, जूं < युगल, चितरा < चित्र, चुलु « चुलु, चेटू < चेटक, छिंडा < छिद्र, छेलू < छग, जोंक < जलौका, जोंघ र जङ्घ, जों < जम « यम, जौश « यश, ज़िण < जन, ज़ीण < जीवन, झोट < झुण्ड, टांग < टङ्गा, ठाकर < ठक्कुरः, डण्डा र दण्ड, डोला < हिन्दोलः, तौछ < तक्ष, तरखाण < तक्षन्, तौखे < तत्र, दछणा < दक्षिणा, दाड़ < दाड़िम, दाची < दात्रिका, दोंद < दन्त, धणिया < धान्या, ध्वज़ र ध्वज, नाती < नतृ, नूआं < नव, नाटी र नाट्यम्, पंछी < पक्षी, पनाह र पुनः, प्राधि र अपराधिन्, पूनू < पूर्णिमा, फलुंगु < फल्गु, फाका < फक्क, बनासत < वनस्पति, बरेलु < विडाल, भौर < भृ, मंढारी < भण्डारिन्, मौल < मल, मींजू र मस्तिष्क, मेहीं < महिषी, मूशा < मूषक, रजणा < रंजनम्, रुंड < रुण्ड, रूखा र रूक्ष, रिता < रिक्त, लछमी < लक्ष्मी, लेंगड़ा < लङ्ग, लाज र लज्जा। | वैदिक शब्द : वर्तमान हिमाचल प्रदेश वैदिक सप्तसिन्धु का प्रमुख भाग है। आज भी वैदिक नदियों में से यमुना, सरस्वती, शुतुद्रि (सतलुज), अर्जीकी

(व्यास), परुष्णी (रावी) और असिक्नी (चिनाब) इस क्षेत्र से बह रही हैं। इसलिए अनेक वैदिक शब्द आज भी पहाड़ी भाषा में प्रचलित हैं, उदाहरणतः

अज > अजमाला : वेदों में ‘अज’ शब्द बकरी के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। (10.16.4 में)। भले ही यह शब्द पहाड़ी की किसी बोली में ठीक इसी रूप और इसी स्वतंत्र अर्थ में नहीं मिलता, परन्तु पहाड़ी में एक शब्द अजमाला का प्रायः प्रयोग मिलता है, जो बकरी या बकरे की ठोड़ी के नीचे लटकते हुए थन के आकार के अवयव के लिए प्रयुक्त होता है।

अद्रि> ओड़ी : वेदों में ‘अद्रि’ शब्द तीखी नोक वाले पत्थर के लिए प्रयुक्त हुआ है (ऋ० 1.51.3)। अद्रि से पहाड़ी का शब्द ‘ओड़ी’ बना है। तीखी नोक का सीधा पत्थर ओड़ी कहलाता है। अनेक स्थानों पर प्राकृतिक रूप से स्थित ऐसी ओड़ी को फसल या खेतों की देवी के रूप में पूजा जाता है। ऐसा तेज धार वाला नोकदार पत्थर जब दो खेतों के बीच सीमा-निर्धारण के लिए खड़ा किया जाता है तो उसे ओड़ा कहते हैं।

अर्गल > आगल : वेदों और बाद के साहित्य में ‘अर्गल’ शब्द दरवाज़े पर लगी लकड़ी की खूटी है। पहाड़ी में यह शब्द आगल बना है। यह लकड़ी का बना एक मज़बूत छड़ या गोल डंडा है जिसे दरवाज़ा बन्द करने के लिए दरवाज़े के साथ अन्दर की ओर दीवार में छेद करके गुज़ारा जाता है।

आरा ) आरा : वेदों में आरा शब्द ‘छेद करने के लिए बर्मा’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है (ऋ 6.53.8) । पहाड़ी में यह शब्द इसी रूप में प्रचलित है। परन्तु अर्थ भिन्न हो गया। यह लकड़ी छेदने का बर्मा नहीं वरन् लकड़ी काटने का आरा है।

ईल > ईड : ईल शब्द इल् धातु से व्युत्पन्न हुआ है। इसका अर्थ आलिंगन करना या प्रेम करना है। ऋग्वेद 1.1.1 में इसका अर्थ उपासना करना है। मूल में उपासना शब्द में भी आलिंगन यानी चिपके रहने या प्रेम की भावना है। पहाड़ी में ईल शब्द ईड में बदल गया है। चम्बयाली में ईड का अर्थ चमगादड़ है क्योंकि यह लकड़ी आदि के साथ चिपका रहता है।

उग्र > उगू : वेदों में उग्र शब्द प्रचण्ड का अर्थ देता है (1.19.4)। कुलुईपहाड़ी का शब्द उगू इसी का तद्भव रूप है। उगु का अर्थ ‘सामाजिक बहिष्कार है। यह दण्ड का कठोरतम या उग्रतम नियम है। यदि कोई व्यक्ति समाज के नियमों को तोड़ता है, समाज-विरोधी काम करता है तो उसको उगू किया जाता है। तब उसके साथ हुक्का-पानी बंद होता है। लेन-देन, खान-पान, मिलना-बैठना सब बन्द करके उसे बिरादरी से बाहर किया जाता है। यही उग्र रूप उगू है।

उरा , उला : वर धातु का अर्थ ‘ढक लेना’ है। ‘वर’ से ही ‘उर’ शन निकला है। क्योंकि भेड़ का शरीर ऊन से ढका रहता है, इसलिए ‘उरा’ का अर्थ ‘भेड़’ है (ऋ 8.34.3)। ‘र’ अक्षर ‘ल’ में प्रायः बदल जाता है। अतः शिमला पहाड़ी में उरा से व्युत्पन्न उला का अर्थ है ‘प्रजनन का मेढ़ा’।

उलुक > उलू : ऋ० 10.165.4 में ‘उलुक’ उल्लू अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसकी चीख को दुर्भाग्य का संदेश समझा जाता था। इससे पहाड़ी का शब्द उलू बना है। आज भी पहाड़ों में उल्लू की चीख को अच्छा नहीं समझा जाता।

उलूखल > उक्खल : वेदों में उलूखल शब्द ओखली के अर्थ में अनेक बार आया है। इसका समास रूप में ‘मूसल’ के साथ भी प्रयोग मिलता है, यथाउलूखल-मूसल। पहाड़ी में मूसल शब्द तो इसी रूप में विद्यमान है, परन्तु उलूखल शब्द ‘उक्खल’ में बदल गया है।

__ऊर्दर दरूण : ऋ 2.14.11 के अनुसार अन्न को एक पात्र से मापा जाता था जिसे ऊर्दर कहते थे। ऐसे ही पात्र को पहाड़ी में दरुण या दोण कहते हैं। दरुण धान मापने का मटका होता है।

कोश – कोशा : ऋ 9.75.3 के अनुसार कोश एक बड़ा पात्र है जिसमें सोम पीस कर और छान कर रखा जाता था। ऋ 1.130.2 में यह एक बाल्टी है जिसमें रस्सी लगा कर कुएं से पानी निकाला जाता था। पहाड़ी में यह काष्ठ का बना हुआ बड़ा कटोरा या थाल है जिसमें लोग पहले खाना खाते थे या भोजन बनाकर रखते थे। इसे कोशा कहते हैं।

कृति : कटारी : ऋ. 1.168.3 के अनुसार कृति एक शस्त्र है जिसे युद्ध के समय काम में लाया जाता था। इसे पहाड़ी में कटार या कटारी कहते हैं। ‘देऊखेल’ के समय देवता का गूर इसके प्रयोग का प्रदर्शन करता है।

कुष्ठ कुठ : कुष्ठ एक पौधा है जिसकी वेदों में अनेकत्र चर्चा हुई है। यह हिमालय की ऊँची चोटियों पर सोमलता के साथ उगता था। अथर्ववेद 5:39.8 में इसे विश्वभेषज कहा गया है। इसे पहाड़ी में कुठ या कुंठ कहते हैं। यह लाहुल

और कुल्लू के ऊँचे क्षेत्रों में पैदा होता है और दवाइयों के लिए विदेशों में भी नियति होता है। यह कीमती जड़ी-बूटी है।

घास घाह : अथर्ववेद 4.38.7 में घास शब्द चारा या भूसा के लिए प्रयुक्त होता है। पहाड़ी शब्द घाह इसी का तद्भव रूप है, परन्तु इसमें चारा या भूसा के अतिरिक्त साधारण हरा घास भी सम्मिलित है।

खदिर , खैर : ऋ 3.53.19-20 में खदिर एक वृक्ष है। आज कल इस वृक्ष को खैर वृक्ष कहते हैं।

चरु , चरुआ : ऋ 1.7.6 और 6.104.2 के अनुसार चरु एक लोहे या

तांबे का पात्र या देगची है। इसमें एक ढक्कन और कुंडी लगी होती थी। ऐसा पात्र आज भी इसी चरुआ नाम से हिमाचल में बहुत मिलता है। यह नीचे से गोलाकार और लम्बे गले का पात्र है।

खल > खल > खौल : ऋ 10.48.7 के अनुसार खलु शब्द खलियान के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसे पहाड़ी में खलु या खौल कहते हैं।

| खारी > खारी > खार : ऋ 4.32.17 के अनुसार यह सोम को मापने का एक अनुमाप है। इससे यह पता लगाया जाता था कि सोम की मात्रा कितनी है। हिमाचल में आज भी यह अनाज की मात्रा जानने का एक माप है, परन्तु भिन्न स्थानों पर इसका भार भिन्न है। सोलन क्षेत्र में तीस द्रोण का खार होता है। कुल्लू क्षेत्र में 30 भार का एक खार अनाज होता है। शिमला-रामपुर में 20 जून का एक खार अन्न होता है। खार का बहुवचन खारी है।

| चमू > चंमू : वैदिक काल में चमू एक पात्र होता था जिसमें सोम को निचोड़ कर उड़ेला जाता था। मण्डियाली में ‘चंमू’ पूजा का एक गिलास है। यह वैदिक चमू का तत्सम रूप ही है। सम्भव है कि कुलुई का चाम्बड़ शब्द भी इसी से निकला हो। चाम्बड़ छोटे पतीले को कहते हैं।

खिल्य या खिला > खील : ऋ 10.142.3 में यह ऐसी बंजर भूमि है जो दो काश्त किए खेतों के बीच खाली पड़ी हो। ऋ. 6.28.2 के अनुसार यह भूमि का बड़ा क्षेत्र है जिसमें खेती बाड़ी नहीं की जाती, वरन् पशु चराए जाते हैं। हिमाचल के भिन्न क्षेत्रों में इसे खिल्ल, खिला, खील कहते हैं। इसमें ऐसा खेत भी शामिल है। जो कभी काश्त किया गया था परन्तु अब खाली पड़ा है।

घासी > घासणी : ऋ 1.162.14 में घासी शब्द ऐसे चारे के लिए प्रयुक्त हुआ है जो अश्वमेध यज्ञ में बलि चढ़ाए जाने वाले घोड़े को निर्धारित होता था। इसी से सम्बंधित पहाड़ी में घासणी ऐसे खाली खुले स्थान हैं जिन पर चारा उगता है।

सुरा > सूर : वैदिक आर्यों के प्रायः दो पेय-पदार्थ थे सोम और सुरा। सोम देवताओं का पेय था और सुरा साधारण लोगों का। ऋ 7.86.6 के अनुसार यह अन्न

और पौधों के मिश्रण से तैयार किया जाता था। यह बड़ा नशीला पेय होता था। इसकी भर्त्सना की गई है क्योंकि इसके पीने से लोग अपराध करते थे। यह पेय आज भी इसी रूप में परन्तु सूर नाम से पहाड़ों में बहुत प्रयोग में लाया जाता है। इसमें शराब से कम मादकंता होती है।

डण्ड > डंडा : वेदों में डण्ड शब्द लाठी के रूप में प्रयुक्त हुआ है। ऋ 7.33.6 में यह पशु हांकने के काम आता है। अथर्ववेद 5.5.4 में यह हथियार के रूप में भी प्रयोग में लाया गया है। इसे भूत-प्रेत को भगाने के लिए प्रयुक्त किया जाता था। पहाडी में इसे डंडा कहते हैं और इस तरह के अनेक काम इस द्वारा किये जाते हैं।

दात्र • दाच : ऋ. 8.78.10 के अनुसार यह एक हंसिया या दराट के लकडी और घास काटने के काम आता है। परन्तु यह सीधा उपकरण हो ” हंसिया की तरह धनुषाकार नहीं होता। इसे पहाड़ी में दाच या दराट कहते है। के विपरीत दाची ‘दांती’ धनुषाकार होती है।

पुर पुर : वैदिक काल में दास-दस्यु ‘पुर’ में रहते थे। ये पत्थर के हो होते थे। पहाड़ी में इसके आजकल अनेक अर्थ हो गए हैं, यथा – बस्ती, घनी । या नगर, शंकु की आकृति का ढेर, सूच्यकार, अन्नादि का ढेर, आग का ” आदि। वैदिक दास दस्यु के पुर कैसे थे? यह कहीं वर्णन नहीं मिलता, परन्त पर के वर्तमान अर्थों में एक साम्यता दृष्टिगत होती है अर्थात् पुर का गुंबदाकार हो भूमि पर गोल परिधि का खुलाकार जो ऊपर चढ़ते-चढ़ते संकीर्ण होता जाता। चाहे वह आग का अंबार है, अन्न का ढेर है या शंकु की आकृति है। इससे संकेत मिलता है कि दास-दस्युओं के पुर इस आकार के होते थे।

लुन > लुण : वेदों में फसल काटने के अर्थ में ‘लुन’ धातु का प्रयोग हम है। इससे पहाड़ी शब्द ‘लुण’ बना है और ‘लुणना’ क्रिया फसल काटने और घास काटने दोनों के लिए प्रयुक्त होती है।

फाल , फाल : ऋ. 4.57.8, 10.117.7 आदि संदर्भो में फाल शब्द हल की धार या फाल के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह हल का नोकदार और तीखा अगला सिरा है जिससे ज़मीन पटती जाती है। यह शब्द ठीक इसी अर्थ में पहाड़ी में प्रचलित है।

भूर्ज – भुज : भूर्ज आर्यों का संयुक्त परिवार का सांझा शब्द है। वेदों में इस वृक्ष का अनेक बार नाम आया है। पहाड़ी में यह भुज या भूज नाम से जानापहचाना वृक्ष है। इसके छिलकों पर पहले हस्तलेख लिखे जाते थे और प्राचीन हस्तलेख आज भी संग्रहालयों और लोगों के पास सुरक्षित हैं।

____ दामन > दावा दाउंआ : रस्सी या मेखला। ऋ 2.28.7 के अनुसार ऐसी रस्सी जिसके साथ यज्ञ के घोड़े या बछड़े को बांधा जाता था। इसे पहाड़ी में दाओं, दावां, दाउंआ कहते हैं। परन्तु यह साधारण छोटी रस्सी है जिससे गाय, बैल या बछड़े को बांधा जाता है।

सक्तु , सत्तू : सौतू : ऋ 10.86.15 में सक्तु शब्द जौ के भूने हुए दलिय के रूप में आया है। ऋ. 10.71.2 तथा 10.9.2 में इसे तितऊ (चलनी या छाननी) से चालने या छानने का प्रसंग है। पहाड़ी में इसे सत्तू या सौतू कहते हैं। प्रायः जो का नई फसल आने पर इस के दानों को भूना जाता है और फिर बारीक पीसा जाता है। इसे पानी में घोलकर नमक या चीनी मिलाकर खाया जाता है। यह गेहूं या नंगा जा ‘एलु’ के भी बनते हैं।

शुक, शगा । सुआ : वेदों में शुक शब्द तोता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। (1.50.12)। अश्वमेध में जो जीव बलिवेदी पर चढ़ाए जाते थे उनमें शुक भी होता था। इसे पहाड़ी में शुगा, सुग्गा, सुआ आदि कहा जाता है।

| शिम्बल > सिंबल : ऋ 3.53.19-22 में खदिर और शिम्बल वृक्षों का लेख है जो तत्सुओं के क्षेत्र के प्रसिद्ध वृक्ष बताए गए हैं। तृत्सु जनपद त्रिगर्त क्षेत्र में रहते थे। हिमाचल में खदिर को ‘खैर’ और शिम्बल को ‘सिम्बल’ कहते हैं।

तुष> तुश : वेदों में तुष शब्द अन्न के ऊपर के छिलके के लिए प्रयुक्त हुआ है। अन्न को छिलकों से अलग करने की क्रिया को तुषैर कहते थे। पहाड़ी में तुष शब्द तुश या तूश में बदल गया है और इसका अर्थ भी सीमित हो गया है। तुश केवल धान के छिलकों को ही कहते हैं जो धान कूटने के बाद अलग हो जाते हैं।

द्यौ । दअ> दौ : वेदों में अनेकत्र द्यौ शब्द आया है, जिसका अर्थ आकाश या स्वर्ग है। इससे शिमला, सिरमौर क्षेत्र में शब्द दौ निकला है, जिसे स्थानीय लेखक दअ या दौ रूप में लिखते हैं, परन्तु इसका अर्थादेश हो चुका है। यहां इसका प्रमुखत: अर्थ ‘धूप’ है परन्तु सूर्य भी अर्थ निकलता है।

धान > धान : धान शब्द ऋग्वेद में नहीं मिलता, परन्तु बाद के वेदों में इसका अनेक बार उल्लेख आया है। अथर्ववेद, 18.4.32 में कहा गया है कि ‘धान ही धेनु है और तिल उसके बछड़े हैं।’ अथ. 18.4.34 में उल्लेख है : ‘एनीर्धाना हरिणी: श्येनीरस्या कृष्णा धाना रोहिणीर्धेनवस्तु । तिलवत्सा ऊर्जमस्मै’ अर्थात् ‘हरिणी, श्येनी, कृष्णा और रोहिणी आदि धान धेनु हैं। इनके तिलरूपी बछड़े हमें बल दें।’ यहां धान के अतिरिक्त हिमाचल के अन्य धानों का भी नाम है, जैसे ‘श्येनी’ पहाड़ी चीणी है, ‘कृष्णा’ यहां की काउणी है। इसे कंगणी या कांगणी भी कहते हैं।

शण > सण : वेदों में ‘शण’ भांग की किस्म का एक पौधा है। अथर्ववेद के सन्दर्भ के अनुसार यह विष्कन्ध के उपचार के लिए काम में लाया जाता था और यह जंगलों में उगता था। इसे पहाड़ी में सण या सणकोकड़ा कहते हैं, इसके रेशे से रस्सियां बनती हैं।

| शमी > शमी : अथर्ववेद के अनुसार यह एक विशेष प्रकार का वृक्ष है जो मादकता और मदहोशी पैदा करता है। इसके चौड़े पत्ते बताए गए हैं जो बालों के लिए हानिकारक हैं। इसे पहाड़ी में आज भी शमी ही कहते हैं। इसकी लकड़ी नर्म होती है।

परशु > फरसा : ऋ 1.127.3, 7.104.21 के अनुसार परशु एक प्रकार का कुल्हाड़ा है जो लकड़ी काटने के काम आता है। कई बार यह युद्ध में भी शस्त्र के रूप में प्रयुक्त होता था (ऋ. 10.28.8)। इस अर्थ में पहाड़ी शब्द फरसा है। यह लकड़ी काटने के काम तो आता ही है, महास और सिरमौर क्षेत्र में ‘ठोडा’ युद्ध-नाट्य में इसे लेकर नाचते भी हैं।

श्येन , शीण : यह तीव्र गति से उड़ने वाला बलवान पक्षी है (1.39, 1.33.2)। यह बड़ा शक्तिशाली और हिंस्र पक्षी है जो पशुओं पर भी , करता है (4.38.5) । इसे पहाड़ी में शीण कहते हैं। यह बाज़ नहीं है जिसे पर में इसी नाम से जाना जाता है। न ही गरुड़ है जो आजकल प्रायः देखने के आता। न ही यह गिद्ध है जिसे ईल या इलकण कहते हैं और जिसे मृत पशुओं शवों को नोचते हुए प्रायः देखा जाता है। शीण प्रायः इन सबसे भिन्न है। इसे प.. की चोटियों पर ही देखा जा सकता है। यह शिखरों या वृक्षों की चोटियों से स धरती के ऊपर अन्य पक्षियों या पशुओं के बच्चों पर झपटती है। तब इसके दोनों शरीर से सटे रहते हैं। जब शिकार लेकर ऊपर उड़ती है तो दोनों पंखों का खेल प्रयोग करती है।

तर्पण > तौर्पण : तर्पण शब्द तृप्त करने की क्रिया से सम्बंधित है। देवताओं ऋषियों और पितरों को तिल या तण्डुल मिश्रित जल देते हुए प्रायः कहा जाता है। ‘वसिष्ठं तर्पयामि, भारद्वाजं. तर्पयामि।’ यह शब्द इसी रूप में या ध्वनि विकार से तौर्पण रूप में बहुत प्रयुक्त होता है, परन्तु इसका अर्थापकर्ष हो चुका है। यह केवल गाली के लिए प्रयोग में लाया जाता है और वह भी केवल गाय के लिए। यदि गाय दूध दुहते हुए लात मारे या कभी फसल उजाड़े, दौड़-भाग करे तो उसे डंडा मारते हुए कहते हैं ‘तौर्पण-बे’ अर्थात् ‘तू तर्पण के लिए ही नियत हो’। लगता है कि कभी इस समाज में देवताओं और ऋषियों को गाय अर्पित की जाती थी और वह क्रिया अब गाली तक सीमित रह गई है। गौ-दान तो यहां आज भी किया जाता है। इसी से सम्बंधित एक और शब्द है – त्रापणा । पूजा करते हुए जब देवता की मूर्ति पर घी, जल या सूर आदि छिड़काया जाता है तो कहते हैं ‘मूर्ति-बेत्रापा’ अर्थात् देवता को तृप्त करो।

शित > शेता : साधारणतः कुलुई ‘शेता’ का सम्बंध सं०श्वेत से जोड़ा जाता है परन्तु मूलत: इसका आधार वैदिक शब्द ‘शित’ है जिसका अर्थ सफेद है। इसका विपरीतार्थक शब्द अशित है। कुलुई शेता विशेषण है, इसका पुंल्लिंग बहुवचन रूप ‘शेते’ और स्त्रीलिंग ‘शेती’ बनता है। वेदों में शिति-कक्षी का अर्थ ‘श्वेत छाती और शिति-पृष्ठ का ‘श्वेत पीठ’ है।

अपः > अपा : ऋ 1.32.11 के अनुसार अप: दास-पत्नियों को कहा गया है, परन्तु ऋ 10.43.8 के अनुसार वे आर्य पत्नियां भी थीं – योऽर्यपत्नीः अकृणोत् इमा अपः। इस तरह अपः शब्द पत्नी के लिए प्रयुक्त हुआ है। सिरमौरी पहाड़ी में अपा का अर्थ ससुर है। इस तरह इस शब्द में अर्थादेश हो गया है। पत्नी से यह शब्द ससुर के लिए प्रयुक्त होने लगा है।

अशनी > आशणी : ऋ 6.6.5 में अशनी ‘तेज धार वाला पत्थर’ है। पहाड़ी में अशनी शब्द से आशण शब्द बना है जिसका बहुवचन आशणी है।

कृश > करिश : ऋ 6.4.14 में कहा है ‘यूयं गावो मेदयया कृशं चित अर्थात हे गायो! तुम कृश यानी दुबले और कमजोर शरीर को मेदयुक्त करती ” शब्द कलुई में तत्सम रूप में प्रयुक्त होता है, परन्तु कई बार उसे करिश हो। ३ नखा गया है, जिसका अर्थ बारीक, दुबला, पतला है।

मुंज, मुंज : यह प्रचुर मात्रा में उगने वाला एक लम्बा घास है। ऋ1.191.3 के अनुसार इस घने घास में विषैले जीव-जन्तु पलते और छिपते हैं। ऋ 1.161.8 में इसे शुध्द और निर्मल प्रकृति का पवित्र घास कहा गया है तथा इसे सोमरस को साफ ने के लिए प्रयोग में लाया जाता था। इसे हिमाचल में आज भी मुंज ही कहा जाता है। जब तक यहां छाननी का प्रयोग कम था तो इसके बनाए गुच्छों को दूध छानने के लिए काम में लाते थे। ‘भूण्डा’ महा-यज्ञ के अवसर पर इस घास को विशेष मुहूर्त निकाल कर काटा जाता है। उससे ‘बेडा’ एक लम्बा रस्सा बनाता है। जिस पर वह समय आने पर सरकता है। मुंज घास के अन्यथा भी लम्बे-लम्बे रस्से . बनाए जाते हैं।

देशज : पहाड़ी भाषा में देशज शब्दों का विशेष महत्त्व है। देशज शब्द से अभिप्राय ऐसे शब्दों से है जिनका सम्बंध न संस्कृत शब्दों से जुड़ता है और न ही वे विदेशी शब्द होते हैं। विद्वानों का मानना है कि ये शब्द यहां के आदिवासी लोगों की । भाषा के शब्द हैं। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार देसी शब्द वे हैं जो तत्सम, तद्भव और विदेशी तीनों में से किसी में न हों और जो क्षेत्र विशेष की अपनी उपज हो। पहाड़ी भाषा की सभी बोलियों में देसी शब्दों का जहां महत्त्व अधिक है वहीं विभिन्न बोलियों में इनका अनुपात भी भिन्न है और इस दृष्टि से सिरमौरी, महासुई और कुलुई में सर्वाधिक देशी शब्द पाए जाते हैं, जैसे – अणी (सि०) ‘मोरचा’, उआका (कां०) ‘अफ़वाह’, उचला (महा०) ‘छाला’, ढस्सर (चं०) ‘जादूटोना’, उडा (सि०) ‘टोकरा’, थरौटणा (महा०) ‘व्यवस्थित करना’, ओखर (महा०) ‘बर्तन’, टिशकणा (महा०) ‘खिसकना’, भंगरेल (मं०) ‘उलझन’, ढबे (मं०) ‘पैसे’, टुशणा ‘साफ करना’, खारचा ‘बकरे के बाल से बना बिछौना’, गदौहड़ा ‘सफाई से काम न करने वाला’, गहोड़ी (चं०) ‘लड़ाका पशु’, गाघा (कु०) खून की धारा’, बड़धू (बघा०) ‘फ़जूलखर्ची’, ढढा (बघा०) ‘लंपट’,बेज्खड़ा ‘भद्दा’, ढरारा (महा०) तिरछा’, ढभलैंहज (ऊ-कां०) ‘सीधी-सादी औरत, जोओट (महा०-सि०) तना’, झंझणू (कां०) ‘आटे में लगने वाला कीड़ा, झुरालू (कु०) ‘दयालु’, झरलू वशीकरण’, छीड़ी ‘लकड़ी’, दैंठी (सो०) ‘ठोडी’, पथीकड़ (मं०) ‘गुलेल’, लौका (को०) छोटा’, लुमटी (का, ‘पंछ’, बझाणा (कां०) ‘चिपकाना’, बयांग (ऊo-कांo-चं०) ‘उलझन’, बलछी, (कां०) ‘उपजाऊ भूमि’, बर्ती (ह०) ‘करमुक्त’, बाझ (ऊo-कां०-०) की हल चलाकर नर्म की हुई मिट्टी’, लैरथी (को०) ‘प्रसूता’, लिंडु (सि) बिच्छूबूटी, लाणका (महा०) ‘पुराना वस्त्र’, लशैड़ (महा०) ढीठ, कंजडा (*. ‘सब्जी बेचने वाला’, गलदेहा (कह०) ‘फरसा’, खुड़ाटी ‘चरागाह’, उल्ह (. ‘थन’, गीटू (मं०) ‘शहतीर’, चुयाल (कु०) ‘किरण’, छींज ‘दंगल’, ‘भिक्षा’, टूआ (मं०-कु०) ‘नई कोंपल’, ठेपी (महा०) ‘ढक्कन’, डरहेच (सि, ‘नेफा’, डिंड (महा०) ‘टखना’, डी (ह०) भैंस, पज़ाड़ (महा०) ‘मुसीबत पठर (चं०) ‘शिकार’, फाढ़ा (कु०) ‘गोद’, थलपा (कां०) ‘आंगन के आगे का खाली भू भाग’, फाण (सि०) ‘बुखार’, फुरड़ (चं०) ‘खूटी’, बगदोड़ (बघा०) ‘आंधी’, भोक ‘बड़ा छेद’, भखट्टे (को०) पलकें, भनेज़ (कु०) उपचार, मयाल ‘चूल्हे की जलती हुई लकड़ी’, मुथू (कु०) गर्दन’, रान ‘जांघ’, राहणी (चं०) ‘लहसुन’, रेटू (चं०-कु०) ‘धागे का गोला’, लिग्गा ‘गीला’, शलात ‘दांत का दर्द’, शाढ़ा ‘खूबानी’, शाफड़ी (महा०-सि०) ‘पसली’, शोधा ‘अतिसार’, सणाट (कह०-०) ‘ओले’, हेला ‘फेरा’।

विदेशी शब्द : आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं में विदेशी शब्दों का आना स्वाभाविक है, क्योंकि कई सदियों तक विदेशी शासकों का यहां प्रशासन रहा है। हिमाचल के साथ लगते पंजाब क्षेत्र की तरह यहां भी उर्दू, फारसी और अंग्रेजी कचहरियों की भाषा रही है, इसलिये राजस्व नीति और कचहरियों की बोलचाल की भाषा के माध्यम से पहाड़ी में विदेशी शब्दों का विशेष योगदान है।

अरबी : इश्तहार, इलम ‘इल्म’, अफवाह, असर, तंलाह ‘इत्तला’, तराज़ ‘एतराज़’, लाका ‘इलाका’, लाज़ ‘इलाज’, हाज़मा, लुआद ‘औलाद’, अरज़, तबार ‘एतबार’, असल, अकल, कायदा, अब्बल, कज़िया, होंसला ‘हौसला’, जाज़त ‘इज़ाज़त’, लुहाई ‘हलवाई’, जाफ़त ‘ज़ियाफ़त’, ज़ादा ‘ज़ियादा’, जिल्द, हुकत ‘हिकमत’, हुकम, हक, तसल्ली, तलाक़, तहरीर, स्हाब ‘हिसाब’, रहामी ‘हरामी’, हद, उहामत ‘हजामत’, तहसील, सान, उजरत, अखबार, फुआह ‘अफवाह’, सामी ‘असामी’, हाल, मान ‘ईमान’, मानत ‘अमानत’, इमतान ‘इम्तहान’, जसूस ‘जासूस’, मदाद ‘इमदाद’, इजत ‘इज्जत’, उमर, करार ‘इकरार’, इबारत, सुआल ‘सवाल’ अजमाइस ‘आज़माइश’, सफाई, सिफर, जरूरत, जमाना, शकल ‘शक्ल’. क़र्जा, सलाह, साब ‘साहब’, सुलह, सलानी ‘सैलानी’, रकम, ज़ेउर ‘ज़ेवर’, रौनक, ज़ां ‘ज़ाया’, मंजूर, मौका, लिफाफा, खैर-ख्वाह, शरीफ़, शरारत, लफज़, मियाद,बाकम ‘वाक़िफ’, आफ़त, मनहूस, मकान, कलम, मकदमा ‘मुकद्दमा’, मुकद्दर, क़लई, तकदार,तकदीर, इंतज़ाम, इंतकाल, खराब, कब्जा, दमाग ‘दिमाग’, कनून ‘कानून’, इंतज़ार, किस्मतकिस्मत, इनसाफ, फरज़ ‘फ़र्ज़’, कताब, इस्तमाल ‘इस्तेमाल’, शारा ‘इशारा’, – जब्त, राजी, खाली, जमात ‘जमाअत’, रियायत, सेहत, मुश्किल, मशवरा, दालत ‘अदालत’, औदा ‘ओहदा’, कतई, औज़ार, कदर ‘कद्र’, कफन, दुआई दौलत. धोंस, काफी, तवीज़ ‘तजवीज़’, तरक्की, तरकीब, ज़राब ‘जुराब’, जिम्म. जलसा, कमाल, फाइदा ‘फायदा’, फ़र्श, फरार, बकाया, नबज़, नतीजा, नजला. कौशम ‘कसम’, किल्लत, क़िला, खारिज, कुदरत, कसूर ‘कुसूर’, कैद, खत्म, ख़सम, ख़वास, ख़बर, ख़तरा, बहस, फाका ‘फ़ाक़ा’, नीत ‘नीयत’, गर्क ‘गरक’. जद्दी, गरीब, मसाला, गल्त ‘ग़लत’, नकद, नुस्खा, माल, मालक ‘मालिक’, माहिर, मेहनत, मदरसा, असूल, फसल, बज़न, नशा, मुनशी, मर्जी, बियान ‘बयान’, बियाना ‘बयाना’, बसीयत, जरेब ‘जरीब’।

फारसी : इंदराज, आदमी, अफसोस, कद, कद्दू, कफ़, अगर, अंदाज़ा, कम, अंदर, कमीना, अवारा, कलगी, चादर, अजाद ‘आज़ाद’, उआज़ ‘आवाज़’, कसीदा, फरिस्ता, करिडा कारिंदा’, कागद कागज’, कारूआई कार्रवाई’, कारखाना, काम, कार, कारदार, कारीगरी, काश्त, कुरती, किसती ‘किश्ती’, किरम, कुश्ती, कमीना, किशमिश, कोशत ‘कोशिश’, खीसा ‘कीसा’, खराक ‘खुराक’, खज़ाना, खजांची, खानदान, गंदा, गुज़ारा, गुरज़, गिरबी, गर्दन, गिरह, गंजाइश ‘गुंजाइश’, गुआह ‘गवाह’, गज़, गमास्ता ‘गुमाश्ता’, चलाक ‘चालाक’, दोस्त, गज़ब, चाकर ‘नौकर-चाकर’, चुगली, गुंजल ‘गुंजल्क’, गुज़ारा, नर्म, चंदा, जगीर ‘जागीर’, जादू, पजामा पाजामा’, ख्याल ‘ख़याल’, दकान ‘दुकान’, जाइदाद ‘जायदाद’, जुआन ‘जवान’, जोश, खमियाज़ा, खरीददारी, दोगला, खर्चा, ताज़ा, धागा ‘तागा’, गुनाह, गुम, गुमान, गुर्दा, गुलाब, चर्बी, चश्मा, चापलूस, चासनी ‘चाशनी’, चिलम, चुस्ती, तीर, तेज, तरीका, दरुआज़ा ‘दरवाज़ा’, दल्हीज़ ‘दहलीज़’, नशाण ‘निशान’, खर्राद, खसखस ‘ख़सख़ास’, ख़सरा, नगरानी, निमदा ‘नमदा’, ख़ाकी, खारिश, नमूना, नोकर, पशम, परहेज़, खराक ‘खुराक’, पाहुंचा ‘पायंचा’, पौड़दा ‘परदा’, पदाना ‘पोदीना’, खुर्दबुर्द, पियाला, पेच, बज़ार ‘बाज़ार’, खुश, खुश्क, बाज़ी, बगीचा, बख्श, बख्शीश, खून, खूब, बराबर, बिस्तरा, जंजीर, जंग, जच्चा, बहाना, बेलचा, बमार ‘बीमार’, बेहोश, जनाना ‘ज़नाना’, ज़मीन, माह ‘माश’, जरदालू, मरद, मज़ा, मौलश ‘मालिश’, जरी, मज़दूर, मस्त, मुफ्त, यार, जुआब ‘जवाब’, जकीन ‘यकीन’, ज़हर, रसीद, सौदा, सस्त, सज़ा, जादू, जिंदा, जिंदगी, सलाना ‘सालाना’, स्ताद ‘उस्ताद’, सलाब ‘सैलाब’, स्याही, तह।

तुर्की : कनात, उड़दू ‘उर्दू, कंलगी ‘कलगी’, काबू, कुड़की की कुली, बुछका ‘बुगचा’, चमचा, मचलका, दरोगा, गलीचा, बंदूक, बेबी वा बड़ी बहन’, ल्हाश ‘लाश’, कैंची, चाकू, बरूद ‘बारूद’, बहादर ‘बहादुर’, तोप, तमगा, तुपक ‘बंदूक-तोप’, तलाश।

पुर्तगाली : अलमारी, इस्तरी, कनस्तर, कप्तान, कमरा, कमीज, र ‘गुदाम’, गोभी, चाबी, चार ‘अचार’, तमाकू ‘तम्बाकू’, पस्तौल ‘पिस्तौल’ ” नलाम ‘नीलाम’, तौलिया, पीपा, बिस्कुट, बालटी, बटन, बोतल, मिस्तरी, संतरा, सागूदाणा।

फ्रांसीसी : ग्रेज़ ‘अंग्रेज़’, कारतूस, कोपन ‘कूपन’।

अंग्रेज़ी : अफसर, इंजण, इंसपेक्टर, एक्स-रे, कापी, कालर, कफ, कंटोल कंपनी, कोट, कम्पोडर, कालेज, कास्टिक, किलो, कार्ड, क्लर्क, कमेटी, कका कुनीन, कैमरा, कोटा, कोच, कोर्ट, क्रीम, क्लास, क्लिप, क्वार्टर, गवर्नर, गौमैंट गाइड, गाउन, गिन्नी, गज़ट, गार्ड, जेल, टिकट, डाक्टर, ड्राइवर, डिग्री, डिप. दर्जन, नर्स, नोट, नोटिस, पार्सल, पैंसल, पुलिस, पेन, पिन, पील ‘अपील’, पेंट फार्म, फीस, फोटू, फैशन, बकसा, बोट, बूट, स्वैटर, हैट, हैंडल, होस्टल, डिजाइन, डायरी, ट्रैक्टर, ट्रेनिंग, ट्रक, ट्रंक, टैंक, टेलीविज़न, टेलीफोन, टीन, टाइप, टिंचर, टाइम, टाई, जाम, कप, चैक, चिमनी, टॉर्च, चार्ज, गेलन, श्टाम, स्लेट, होटल, गलास, हस्पताल, पैन, गैस, साटिफकेट, स्कूल, सिगरिट, सूट, स्प्रे, सिनमा, समन, लाइन, लेट, लालटीन, लैम्प, कटिंग, पूनिंग, राशन, रबड़, रेल, रपोर्ट, मोटर, मील, मिंट, मशीन, मनेजर, माश्टर, मनिआडर, बटन, बरंट, स्टाफ, स्टूल, सोफा, सूप, क्रीम, पौडर, लिपस्टिक, डाइनिंग टेबल, पैकिंग, ग्रेडिंग, सेल, बिस्कुट, सिल्क, स्लीपर, सर्कट हाउस, चेन, केतली, पैंट, जैकट, टॉप्स, लॉकट, लाइसेंस, लाइट, कापी, पंप। संज्ञा शब्दों का निर्माण : पहाड़ी में भाववाचक संज्ञा अनेक प्रत्ययों से बनती है, जिनमें कुछ प्रत्यय संस्कृत, हिन्दी के हैं तथा अन्य ठेठ पहाड़ी के हैं।

(1) विशेषण शब्दों से व्युत्पन्न संज्ञाएं ‘आई’ प्रत्यय लगाकर –

औखा          औखयाई

बड्डा             बडयाई

ठण्डा           ठण्डाई/ठण्डियाई

भला             भलयाई

चतुर             चतुराई

सरद             सरदियाई

महंगा            मंगियाई/मेंगाई

रूखा            रुखियाई

सुक्का      सुकियाई

पक्का            पकयाई

(2) संज्ञा शब्दों में ‘ई’ प्रत्यय जोड़ने से व्युत्पन्न संज्ञाएं

छेत                  छेती

(अ)मीर          (अ)मीरी

फकीर            फकीरी

ब़जीर              बज़ीरी

कारीगर          कारीगरी

न्हेर                 न्हेरी

(3) क्रिया की धातु में उट’ लगाकर –

मलाणा           मलाउट

सज़ाणा           सज़ाउट

थकणा           थकाउट

बणाणा          बणाउट/बणौट

रोकणा ‘         रकाउट

सज़णा            सजाउट

फैलणा            फलाउट

बोलणा            बलाउट

गिरना            गिराउट

बसणा            बसाउट/बसौट

(4) क्रिया की धातु में आईप्रत्यय जोड़ने से उत्पन्न संज्ञाएं-

पिसणा           पिसाई/पिसयाई

बुणना            बुणाई

भरना             भराई

चिणना           चणाई

घटणा            घटाई

घड़ना            घड़ाई

ढोणा             ढुआई

चीरना            चराई

कतणा           लुणाई

दौड़ना            दड़ाई

सीणा             सियाई

लुणना           लुणाई

कंजूस           कताई

काटणा          कटाई

कमाणा         कमाई

तोड़ना           तड़ाई

डांगणा          डुंगियाई/डंगाई

(5) विशेषण में ‘ई’ प्रत्यय लगाने से-

चोर               चोरी

चलाक           चलाकी

कंजूस            कंजूसी

गरम               गरमी

सर्द                 सर्दी

गरीब              गरीबी

(अ)मीर         (अ)मीरी

बहादुर           बहादुरी

त्यार               त्यारी

सफेद            सफेदी

(6) क्रिया की धातु में बिना कुछ जोड़े अपने आप में संज्ञा –

हांडणा             हांड

बांडणा             बांड

तोपणा              तोप

नाचणा              नाच़

टोलणा              टोल

थूकणा              थूक

हसणा               हस

हौसणा             हौस

पूछणा               पूछ

खंगणा               खंग

हारना                 हार

जीतणा              जीत

मरना                 मर

चोपड़ना           चोपड़

नापणा              नाप

रिढ़ना               रिढ़

जाणना             जाण

पछाणना (पहचानना)       पछाण

पछाड़ना            पछाड़

फड़ाकणा          फड़ाक

तापणा               ताप

जपणा                जप

(7) मल क्रिया के ‘ना’ अथवा ‘णा’ में से ‘आ’ की मात्रा हटाने से बनी भाववाचक संज्ञाएं –

कुटणा               कुटण

पिटणा                पिट्टण

पिशण               ‘पिशण/पिसणं

ओढणा               ओढण

छेकणा               छेकण (फटी हुई वस्तु)

जीणा                  जीण

मरणा                 मरण

अटेरना               अटेरन

मरणा                  मरण

अटेरना               अटेरन

 लेसणा                लेसण 

(8) ‘उण’ प्रत्यय लगाकर –

पला़णा                  पल़ाउण

बणाणा                 बणाउण

खलाणा                खलाउण

घटाणा                 घटाउण 

चाणना                 चणाउण

चंडणा                 चंडाउण (रोटी पकाने का पारिश्रमिक) 

डराणा                 डराउण (डरावनी वस्तु)

(9) ‘ऐन’ प्रत्यय लगाकरपित्तल-

पित्तल                  पित्तलैन

सड़न                   सडै़न

खट्टा                    खटैन                    

फुकणा                  फुकैन

जलना                   जलैन

कपड़ा                   कपड़ैन

गोबर                    गबरैन

गौंतर                    गुंतरैन

लिङ्ग विधान 

           संज्ञा शब्द के जिस रूप से यह जाना जाए कि वह पुरुष जाति का बोधक है या स्त्री जाति का, उसे लिङ्ग कहते हैं। पहाड़ी में हिन्दी की तरह दो लिङ्ग हैंपुंल्लिंग और स्त्रीलिङ्गः संस्कृत की तरह नपुंसकलिङ्ग पहाड़ी भाषा में नहीं पाया जाता। हिन्दी की तरह पहाड़ी में भी लिङ विधान व्याकरणिक है। यह ज़रूरी नहीं है कि हर पुंल्लिंग शब्द का स्त्रीलिङ्ग हो अथवा हर स्त्रीलिङ्ग शब्द का पुंल्लिंग रूप भी हो, परन्तु यह आवश्यक है कि प्रत्येक संज्ञा शब्द चाहे सजीव हो या निर्जीव, अथवा मूर्त हो या अमूर्त, दो में से एक लिङ्ग से अवश्य सम्बंधित होता है और उसी के अनुसार क्रिया, विशेषण, सर्वनाम आदि भी बदल जाते हैं।

           पहाड़ी में प्राणी शब्दों का लिङ्ग विधान प्राकृतिक होता है यथा – बाच्छू, गौभ, लौढ़, काकड़, बौलद, कुखड़ा, कुड़म, गलाहू, भौंरा, टिड्डा, चिड़ा, गीदड़, मच्छर, सप्प, तोता, मिर्ग, बिच्छू, उल्लू, बराल, पझुड़िया, रिंगल, माहू, सुंगर आदि पुंल्लिंग तथा बाच्छी, गौभी, भेड़, गाए, कुखड़ी, कुड़मण, भौरी, टिड्डी, चिड़ी, गीदड़ी, सप्पणी, बराली, फौही, सराल, चकलेओट, गोह, कमोड़ी आदि स्त्रीलिङ्ग शब्द हैं।

निर्जीव संज्ञाओं में वस्तु के आकार के आधार पर प्रायः लिङ्ग भेद होता है. .किरडा’ आकार में बड़ा होने के कारण पुंल्लिंग है तथा ‘किरडी’ आकार में बड़ा होने के कारण स्त्रीलिङ्ग है। इसी प्रकार लोटका-लोटकी, लोटा-लोटडी. मोना-शोठी, डब्बा-डब्बी, दाच-दाची, डाल-डाली, छाबड़ा-छाबडी, टोपा-टोपी कण्ठा-कण्ठी, कराहड़ा-कराहड़ी, कुदाल-कुदाली, रोट-रोटी, रस्सा-रस्सी. झोलायोली. पतीला-पतीली. थाल-थाला, कड़छ-कड़छी, डबरा-डबरी, कटोरा-कटोरी. आरा-आरी, झंडा-झंडी, झुखड़ा-झुखड़ी, कतीरा-कतीरी, ओबरा-ओबरी, पंजडपंजडी, सरताज-सरताजड़ी, टोकणा-टोकणी, शाटा-शाटी, बरछा-बरछी, छत्र-तरी गेठा-गेठी (अंगीठी), ओबरा-ओबरी, बागड़ा-बागड़ी, ढोलक-ढोलकी, संदूक-संदूकड़ी, दमूक-दमुकड़ी।

पुंल्लिंग से स्त्रीलिङ्ग  बनाने के कुछ नियम इस प्रकार हैं –

  1. अकारान्त पुंल्लिंग शब्दों में ‘ई’ की मात्रा जोड़ने में स्त्रीलिङ्ग बनते हैंबांदर-बांदरी, कुकड़-कुकड़ी, बाह्मण-बाह्मणी, झीर-झीरी, भौर-भौंरी, कुम्हारकुम्हारी, लुहार-लुहारी, सन्यार-सन्यारी, चमार-चमारी, हिरण-हिरणी, कुकरकुकरी, गीदड़-गीदड़ी आदि।
  2. आकारान्त शब्दों के ‘आ’ को ‘ई’ द्वारा प्रतिस्थापित करने से स्त्रीलिंग बनते हैं- साला-साली, बकरा-बकरी, कुआरा-कुआरी, खापरा-खापरी, स्याणा-स्याणी, जबरा-जबरी, लाड़ा-लाड़ी, माठा-माठी, टिड्डा-टिड्डी, ठगड़ा-ठगड़ी, बूबाबूबी, मेंडका-मेंडकी, मौंसा-मौंसी, मामा-मामी आदि।
  3. अकारान्त व ईकारान्त शब्दों में ‘अ’ और ‘ई’ के स्थान पर ‘अण’ या ‘अन’ प्रयुक्त होता है, यथा- धोबी-धोबण, तूरी-तूरण, तेली-तेलण, जोगीजोगण, नेगी-नेगण, हेसी-हेसण, बरागी-बरागण, नाती-नातण, हाथी-हाथण, कोढ़ीकोढ़न, कोली-कोलन, माली-मालण, पड़ोसी-पड़ोसण, नाई-नाएण, बाढी-बाढण, पराधी-पराधण, कुड़म-कुड़मण, ब्राघ-ब्राघण, मालक-मालकण, नाग-नागण, रीछ-रीछण, गूर-गूरन आदि।

       4. उ-ऊकारान्त शब्दों में भी ‘उ’, ‘ऊ’ को ‘ई’ द्वारा प्रतिस्थापित करने स स्त्रीलिंग बनते हैं, यथा- दाद-दादी, नानू-नानी, छोहरू-छोहरी, छेलू-छेलो, बच्छू-बच्छी, भाणजु-भाणजी, छोहटू-छोटी, दोहतु-दोहती, पोतु-पोती, चाचूचाची, ताऊ-ताई, मामू-मामी, मुन्नू-मुन्नी।

        5.कुछ सम्बंध सूचक प्राणीवाचक पुंल्लिंग शब्दों के आगे ‘आणी’ या आनी प्रत्यय लगाने से स्त्रीलिङ रूप बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में आरम्भिक दीर्घ स्वर भी ह्रस्व में बदल जाता है- माश्टर-मश्टराणी, ठाकर-ठकराणी, नौकरनोकराणी/नुकराणे, पंडत-पण्डताणी, देउर-दराणी, जेठ-जठाणी, डाक्टर-डक्टराणी. मिस्तरी-मिस्तराणी, गोरखा-गोरखाणी, बझिया-बझियाणी, साह-साहणी आदि।

         6.कुछ शब्दों के स्वतंत्र स्त्रीलिङ्ग शब्द होते हैं, जैसे- आमा-बाप, शाशू-शौहुरा, मर्द-बेटड़ी, मर्द-जणास, बलद-गाए, खाडु-भेड़, लौढ़-भेड़, बियाहजोई, बेटी-बघेर, खसम-ज्वाणस।

         7.कुछ शब्दों में ‘ऐण’ प्रत्यय लगाने से स्त्रीवाचक शब्द बनते हैं जैसेगुरु से गुरैण, ठाकुर से ठुकरैण।

         8.कुछ शब्दों में ‘णी’ व ‘नी’ प्रत्यय लगाने से स्त्रीवाचक शब्द बनते है जैसे- ऊंट-ऊंटणी, जाट-जाटणी, मोर–मोरनी, सेर-सेरनी, चकोर-चकोरनी।

वचन

         शब्द के जिस रूप से किसी पदार्थ की संख्या का ज्ञान हो, उसे वचन कहते हैं। पहाड़ी में संस्कृत के द्विवचन का विधान नहीं है, केवल एकवचन और बहुवचन ही प्रचलित हैं, जैसे- ‘काउड़ा’ पुंल्लिंग एकवचन है और ‘काउडी’ स्त्रीलिंग एकवचन। इनके बहुवचन रूप क्रमशः ‘काउड़े’ और ‘काउड़ी’ बनते हैं। जैसा कि उदाहरण से स्पष्ट है, अनेक शब्दों के हिन्दी की तरह बिना कारक प्रत्यय के रूप एकवचन और बहुवचन में समान रहते हैं, परन्तु कारक प्रत्यय लगने पर पुंल्लिंग में रूप भिन्न बनता है, जिसका आगे उल्लेख किया जाएगा। बहुवचन बनाने के कुछ नियम इस प्रकार हैं –

1.पुंल्लिंग शब्द : पुंल्लिंग शब्दों के केवल आकारान्त के ही शुद्ध बहुवचन बनते हैं। वहां आकारान्त शब्द बहुवचन में एकारान्त हो जाते हैं, यथा- जबरा से जबरे, टिंडा से टिंडे, जुटा से जुटे, ध्याड़ा से ध्याड़े, कंडा से कंडे, चांबड़ा से चांबड़े, दाणा से दाणे, शाणा से शाणे, छाबा से छाबे, झोला से झोले। शेष किसी तरह के पुंल्लिंग शब्दों के स्वतंत्र अर्थात् बिना कारक प्रत्यय के बहुवचन रूप नहीं बनते।

2.स्त्रीलिंग की स्थिति में : (क) कुछ अकारान्त स्त्रीलिंग शब्द बहुवचन में आकारान्त हो जाते हैं, बाहरी पहाड़ी में ‘आ’ प्रायः ‘आं’ हो जाता है, यथाकताब से कताबा (i), भेड़ से भेड़ा (भेड़ा), चीट-चीटा (i), बोतल से बोतला (i), भाख से भाखा (i), म्हैस से हँसा (i), भैण-भैणां, आंज-आंजा, गलगला, तार-तारा।

कुछ अकारान्त स्त्रीलिंग शब्द बहुवचन में ईकारान्त (या ईंकारान्त) हो जाते हैं, यथा- बहण से बहणी, संगण से संगणी, भित्त से भित्ती, म्हस से म्हेसी, गाय से गाई (ई़ं) की आख से आखी, रात से राती, जात-जाती, काःल-काःली,टोल्ह-टोल्ही, आर-आरी।

(ख) आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द बहुवचन में आंकारान्त हो जाते हैं. गया- कथा से कथां, जगा से जगां, जटा से जटां, माला से माला, डगा (ढोल बजाने की छड़ी विशेष) से डगां।

(ग) इ-ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द बहुवचन में भीतरी पहाड़ी में समान रहते हैं लेकिन बाहरी पहाड़ी में ‘इयां’ में बदल जाते हैं- जम्हीरी से जम्हीरियां. स्लेटी से स्लेटियां, मकोड़ी से मकोड़ियां, कुड़ी से कुड़ियां, मुन्नी से मुनियां, सोठी से सोठियां, ताकी से ताकियां, बोरी से बोरियां, प्योसी से प्योसियां (गुड़ की डली), मूली से मूलियां, कुकड़ी से कुकड़ियां, गुली से गुलियां, चौकी से चौकियां, झझरी से झझरियां आदि।

(घ) सिरमौरी और महासुई में ध्वनि के कारण एकारान्त स्त्रीलिंग शब्द बहवचन में ईकारान्त हो जाते हैं, यथा- बांदरे (एकवचन) से बांदरी, गेंते से गेंती, कोहे से कौही, छेउड़े से छेउड़ी, छोटे से छोटी, कुराड़े से कुराड़ी।

(ङ) ऊंकारान्त स्त्रीलिंग शब्द बहुवचन में उआं बनता है- जूं से ज़ुआं, ब्रूं से ब्रुंआं ।

(च) अनेक बार ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्द बहुवचन में ईंकारान्त हो जाते है-

एकवचन                                  बहुवचन

हाखी                                        हाखीं

आटी                                       आटीं

किल्ली                                     किल्लीं  

किलणी                                    किलणीं

माक्खी                                     माक्खीं

मौसी                                       मौसीं

(छ) ‘अण’ प्रत्यय से जो स्त्रीलिंग शब्द बनते हैं उनके बहुवचन ‘ई’ प्रत्यय लगाने से बनते हैं –

एकवचन                                बहुवचन

धोबण                                  धोबणी

प्रेतण                                    प्रेतणी

जटण                                   जटणी

 डायण                                डायणी

दरेण                                  दरेणी

          ऊपर कथित विवेचन विशुद्ध बहुवचन से सम्बंधित है। विकारी बहवन की स्थिति इससे भिन्न है। पंजाब से लगती सीमावर्ती बोलियों को छोड़ कर शेष बोलियों में संज्ञा शब्दों के विकारी रूप एकवचन और बहुवचन में समान रहते है। हिन्दी में ‘घोड़ा’ शब्द का एकवचन में विकारी रूप ‘घोड़े’ है और बहुवचन में ‘घोड़ों’, यथा- घोड़े का रंग, परन्तु घोड़ों का रंग। परन्तु भीतरी शाखा की पहाडी बोलियों में ‘घोड़ा’ का विकारी रूप एकवचन में ‘घोड़ें है और बहुवचन में भी ठीक यही रूप ‘घोड़ें’ ही रहता है। यहां घोड़ें-खें का अर्थ ‘घोड़े-को’ भी है और ‘घोड़ों-को’ भी। इसी तरह हिन्दी में एकवचन में ‘हाथी पर’ तथा बहुवचन में ‘हाथियों पर’ रूप हैं। परन्तु पहाड़ी की उक्त बोलियों में दोनों स्थितियों में एक ही रूप प्रचलित है। यहां ‘हाथी पांधे’ का अर्थ ‘हाथी पर’ भी है और ‘हाथियों पर भी। इसी तरह ‘छोटुए आपणा साज सामान थागा’ में छोहटुए का अर्थ ‘बच्चे ने’ भी हो सकता है तथा ‘बच्चों ने’ भी।

         पहाड़ी भाषा की बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की सभी बोलियों में व्यंजनान्त पुंल्लिंग शब्दों की यह विशेषता देखने योग्य है। जहां हिन्दी और पंजाबी में ऐसे शब्द केवल बहुवचन में विकार धारण करते हैं, वहां पहाड़ी में ये एकवचन में भी विकार ग्रहण करते हैं। जैसे हिन्दी और पंजाबी में ‘घर’ या ‘जंगल’ के साथ एकवचन में प्रत्यय जुड़ने पर ‘घर’ या ‘जंगल’ रूप रहेगा- घर में (घर बिच) या जंगल में (जंगल बिच), परन्तु बहुवचन में इनके रूप बदलते हैं- घरों में (घरां बिच), जंगलों में (जंगलां बिच)। इसके विपरीत पहाड़ी में व्यंजनांत पुंल्लिंग शब्द एकवचन में भी प्रत्यय जुड़ने से पहले विकार आ जाता है- इक घरा-च सत्त भैणां थियां, एकी जंगला-मंझ (एक जंगल में) आदि। इसी तरह ‘पत्थर को’ के लिए ‘पात्थरा जो’, ‘देश के वीर’ के लिए ‘देशो रे वीर’।

 

 

    

 

      

 

Translate »
error: coming soon