ध्वनि-तत्त्व

           वर्ण वह एक व्यक्त अखण्ड ध्वनि है जो मुख के भीतर तालु, कण्ठ तथा जिह्वा आदि के योग से उत्पन्न होती है, जैसे– अ, इ, क्, च् इत्यादि। सब ध्वनियां अखण्ड हैं, क्योंकि अ, इ, क् आदि वर्गों का उच्चारण करते समय उनकी ध्वनि को दो भागों में विभक्त नहीं किया जा सकता। सुविधा के लिए वर्गों को स्वर तथा व्यञ्जन दो भागों में विभक्त किया गया है।

स्वरः स्वर वे वर्ण हैं, जिनका उच्चारण स्वतंत्र रूप से होता है और दूसरे वर्गों की सहायता नहीं लेनी पड़ती, जैसे- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ आदि।

व्यञ्जनः जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से होता है, उन्हें व्यञ्जन कहते हैं, जैसे- क्, च्, ट्, त्, प् इत्यादि।

स्वर

         पहाड़ी भाषा की सभी बोलियों का मूलाधार संस्कृत है। इसलिए पहाड़ी को अपनी स्वर-सम्पदा संस्कृत से मिली है। भले ही इस लम्बे समय में संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश में से गुज़रते हुए संस्कृत के स्वरों की संख्या कम हो गई है फिर भी अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ दस मूल स्वर तो स्पष्ट रूप से पहाड़ी में विद्यमान हैं। यही नहीं प्रयोग की दृष्टि से पहाड़ी में संस्कृत के ‘ऋ’ स्वर को भी छोड़ा नहीं जा सकता। पहाड़ी भाषा में संस्कृत शब्द ऋषि, ऋण, ऋतु सामान्य शब्द हैं इन्हें ‘ऋ’ को छोड़ कर ‘रि’ से लिखना युक्तिसंगत नहीं है। ऋषि वशिष ऋषि जमदग्नि, ऋषि पराशर, ऋषि मार्कण्डेय, ऋषि गौतम आदि अनेक वैदिक ऋषि हमारे यहां अनेक गांवों के देवता हैं जिन्हें यहां के लोग हर समय पूजा-पाठ, आपत्ति-विपत्ति में याद करते हैं। यही स्थिति ऋण की है, जो आम प्रचलित शब्द है। भले ही कुछ क्षेत्रों में ऋतु के लिए रुत शब्द भी प्रचलित है परन्तु हिमाचल के एक बहुत बड़े भाग में ऋतु शब्द का आम प्रयोग है। इसके अतिरिक्त अनेक अन्य संस्कृत शब्द तत्सम रूप में प्रचलित हैं। अतः पहाडी में ‘ऋ’ स्वाकर होना मूलतः सिद्ध होता है।

                 दो और स्वर ध्वनियां पहाड़ी में प्रमुख रूप से सुनाई देती हैं- ‘एँ’ और ‘ओं’। ये दोनों स्वर भारत की भाषाओं के आरम्भिक सर्वेक्षक विदेशी विद्वान डॉ. ग्रियर्सन से भी नज़रअंदाज़ नहीं हो सके थे। उनका कहना है कि एँ का उच्चारण अंग्रेज़ी शब्द met में e की तरह है और ओं का अंग्रेज़ी शब्द block में o की भांति। उनका यह निष्कर्ष पूर्णतः उचित है। वैदिक संस्कृत की ये ध्वनियां प्राकत और अपभ्रंश के माध्यम से पहाड़ी भाषा में आई हैं। पूर्व वैदिक काल में ‘ऐ’ और ‘औ’ का क्रमशः ‘आइ’ और ‘आउ’ उच्चारण था। बाद में इनका आदि स्वर ह्रस्व हो गया- ‘अई’ और ‘अउ’। इस प्रकार वैदिक काल में ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’ तथा ‘औ’ के बीच क्रमश: एँ और ओं ध्वनियों का संकेत मिलता है। शौरसेनी तथा मागधी आदि प्राकृतों तथा बाद में इन्हीं की अपभ्रंशों में ये ध्वनियां स्पष्ट रूप से विकसित हुईं जिन्हें भाषा-विज्ञान में ह्रस्व ‘ए’ और ह्रस्व ‘ओ’ कहा गया। परन्तु लिखित रूप में इनके लिए अलग वर्ण नहीं थे। ‘ऍ’ को कहीं ‘ए’ से तो कहीं ‘ऐ’ से लिखा जाता था। ऐसे ही ‘ओं’ को भी कहीं ‘ओ’ और कहीं ‘औ’ से व्यक्त किया जाता रहा है।

               भाषा-विज्ञान की दृष्टि से इनमें से ‘ऍ’ उच्च-विवृत अग्र-स्वर है तथा ‘ओं’ मूलतः अर्ध-विवृत, मध्य स्वर ‘अ’ का लौकिक रूप है और उसी रूप में प्रयुक्त होता है, यथा- अग्नि से ओंग, अष्ट से ओंठ, डर से डॉर, घर से घोर आदि। इस रूप में यह ध्वनि बंगला आदि अनेक भारतीय आधुनिक आर्य भाषाओं में भी विद्यमान है।

            ऍ का उच्चारण (1) नड़ेॅ, गभेॅ, कट्ठेॅ, कन्नॅ, भॅ ण, भेॅ स, छेॅ ल आदि शब्दों में तो मूल रूप में मुखरित है, परन्तु इसकी अनेक अन्य दिशाएं भी हैं।

                                   (2) भीतरी पहाड़ी के कारक प्रत्यय खेॅ (ताखेॅ), लेॅ (मूलेॅ), बेॅ (कौबेॅ) आदि में ‘ऍ’ स्पष्टतः ‘ए’ और ‘ऐ’ से भिन्न स्वर है।

                                   (3) सभी बोलियों में शब्दों के अन्त का ‘ए’ स्वर भी ‘ऍ’ में बदलता है- करेलेॅ, भलेॅ, तारेॅ, केलेॅ, झेड़ेॅ आदि।

                                   (4) महासुई और सिरमौरी आदि बोलियों में हिन्दी आदि के ईकारान्त शब्द ऍकारान्त हो जाते हैं, यथा- डाबेॅ ‘डब्बी, छ़ोह्टेॅ ‘लड़की’, गांधेॅ ‘गांधी’ (यथा गांधे रे बातोॅ), कुराड़ेॅ ‘कुल्हाड़ी’। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह ईकारान्त को ऍकारान्त बनाने की प्रवृत्ति नहीं है। इन बोलियों में ‘ई’ भी है। बल्कि एकवचन से बहुवचन के ये दोनों भेदक स्वर हैं, यथा- छ़ोह्टेॅ लड़की’ से छ़ोह्टी ‘लड़कियां’, बांदरेॅ ‘बन्दरिया’ से बांदरी ‘बंदरियां’, गेंतेॅ ‘गैंती’ से गेंती ‘गैंतियां’, छेउड़ेॅ ‘स्त्री’ से छेउड़ी ‘स्त्रियां’ आदि।

         उक्त लघुतम युग्मों से यह सिद्ध होता है कि ‘ऍ स्वर-ध्वनि ‘ए’ और ‘ऐ’ से स्पष्टतः स्वतन्त्र और भिन्न है। कुलुई के लघुतम युग्म भी देखे जा सकते हैं-

        एंडाए ‘ऐसा यह’, एंडाऍ ‘ऐसा ही’।

         इसी प्रकार पहाड़ी में ‘ओं’ स्वर भी ‘ओ’ और ‘औ’ से भिन्न है –

     (1) अनेक शब्दों में ‘ओं’ मूल ध्वनि है यथा – ओॅ णा ‘आना’, पोॅ णा ‘पड़ना’, कोॅ डा ‘कड़वा’, बोॅ हणा ‘बहना’, सोॅ ण ‘सावन’, परोॅ णा ‘मेहमान’, न्होॅ णा ‘नहाना’, होॅ आ ‘हवा’ आदि।

     (2) पहाड़ी में ‘अ’ स्वर ‘ओं’ में बदलता है यथा- डर से डोॅ र, घर से घोॅ र, मन से मोॅन, हरा से होॅ रा, सप्त से सोॅ त आदि। यह स्वर बंगला आदि अनेक भारतीय भाषाओं में है।

     (3) महासुई, बघाटी तथा सिरमौरी आदि बोलियों में आकारान्त शब्द ओंकारान्त हो जाते हैं- खाणोॅ ‘खाना’, पीणोॅ ‘पीना’, लिखणोॅ ‘लिखना’, लांगणोॅ ‘लांघना’, रोबणोॅ ‘रोपना’, मौरणोॅ ‘मरना’, मौकोॅ ‘मौका, डोराउणोॅ ‘डरावना’।

      (4) अकारान्त पुंल्लिंग शब्दों के विकारी रूप भी ओंकारान्त हो जाते हैं, यथा- देशोॅ रैॅ वीर ‘देश के वीर’, घोॅ रोॅ रेॅ माण्हु ‘घर के आदमी’, खेचोॅ लेॅ जाणोॅ ‘खेत को जाना’ आदि।

      (5) कुलुई में ओं एक स्वतन्त्र ध्वनि है, यथा

    मोती ‘मोती’         मोॅ ती ‘मति’         मौती ‘मौत से’

    कोड़ा ‘कोड़ा’          कॉ ड़ा ‘कड़ा’         कौड़ा ‘कड़वा’

   इस तरह पहाड़ी में ‘ऍ’ और ‘ओं’ स्वतन्त्र स्वर दीखते हैं परन्तु चूंकि ये अधिक न्यूनतम युग्म नहीं बनाते और पहाड़ी की वर्तनी को अधिक जटिल बनाना भी उचित नहीं लगता अतः इन्हें मूल स्वर न कहकर गौण स्वर कहना उचित रहेगा। अत: पहाड़ी के स्वर इस प्रकार हैं –

   (1) मूल स्वर- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।

   (2) गौण स्वर- ऍ, ओॅ।

 

       इन्हें स्वर तालिका में इस प्रकार दर्शाया जा सकता है –

जिह्वा की         अग्र स्वर    मध्य स्वर   पश्च स्वर

ऊंचाई           प्रसृताकार  प्रसृताकार  वर्तुलाकार

उच्च संवृत     ऋ

संवृत             ई                                    ऊ

निम्न संवृत     इ                                     उ

अर्ध संवृत      ए                                    ओ

उच्च विवृत     ऍ                                    ओ

अर्ध विवृत      ऐ                  अ              औ

विवृत                                                   आ

व्यञ्जन

       पहाड़ी भाषा में व्यञ्जन वर्ण हिन्दी भाषा के व्यञ्जनों की अपेक्षा अधिक हैं। ऐसी अतिरिक्त व्यञ्जन ध्वनियों में प्रथमतः चवर्ग ध्वनियां हैं, जो चवर्ग ध्वनियों से भिन्न हैं अर्थात् पहाड़ी में च, छ, ज, झ तालव्य ध्वनियों के साथ-साथ वर्म्य ध्वनियां च, छ, ज़, झ भी हैं। पहाड़ी में कहीं-कहीं ये ध्वनियां तालव्य स्वनों की संध्वनियों के रूप में विद्यमान दीखती हैं लेकिन कहीं ये तालव्य स्वनों से भिन्न स्वतन्त्र स्वन हैं अर्थात् च, छ, ज़, झ ध्वनियां च, छ, ज, झ की संध्वनियां नहीं हैं वरन् अलग-अलग स्वतन्त्र – ध्वनियां हैं, जिनकी पुष्टि निम्नलिखित लघुतम विरोधी युग्मों से होती है-

/ चांबड़ा / ‘पतीला’                    /चांबड़ा / ‘चमड़ा’ /

/ चौखिणा / ‘सड़ जाना’            / चौखिणा / ‘उठाया जाना’

/ कचेड़ा / ‘खमीर’                    / किचेड़ा / ‘शरारतें’

/ मौछी / ‘मक्खी                       / मौछी / ‘मछली’

/ जंग / ‘लड़ाई’                          / जंग / ‘धातु की मैल’

/ जोत / ‘जोतना’                        / ज़ोत/ ‘पहाड़ की चोटी’

/ झौड़ / ‘लम्बा खेत’                     झौड़ / ‘गिर जा’

           कागड़ी और मूल चम्बयाली में चवर्गीय वर्ण नहीं हैं। गादी बोली अनेक पष्टस कुलुइ से साम्यता रखती है। ध्वनि के क्षेत्र में वहां कछ ऐसे विशिष्ट शब्द हैं ” कुलुई में वत्स्य-चवर्गीय वर्णो से उच्चरित होते हैं। यों लगता है कि गादी में चवर्गीय अषर हैं, परन्तु क्या ये ध्वनियां हैं या संध्वनियां यह शोध का विषय है, यथा –

        गादी         कुलुई         अर्थ

        चंडणा        चांडणा        पीटना, निशाना लगाना

        चड़ेषा         चडेशा         चुगलखोर, शरारती

        चुचु               चु़च़ू              स्तनाग्र

       चुहाण             चुहाण          तीन-चार वर्ष की बछड़ी

        छो                  छ़ो              जल प्रपात

       छोत               छ़ोत             मरने के बाद शुद्धि संस्कार

       छुब्बड़           छु़ब्ब             लचीली झाड़ी की रस्सी

        जंघ               ज़ोँ घ            जांघ

       जिल्लणा        जि़ल्लणा        सख्त चीज़ से दबाना

        झमकणा        झो़ॅमकणा           वर्षा थम जाना

        झिक्कड़            झो़ॅकड़            झाड़ियों का समूह

       चवर्ग ध्वनियों के अतिरिक्त पहाड़ी में एक और स्वतन्त्र ध्वनि मर्धय ‘ल़’ है। यह दन्त्य ‘ल’ का विकृत रूप नहीं है वरन् पूर्ण स्वतन्त्र और विभेदक ध्वनि है, जैसे

 

/ गल / ‘बात’                                                  / गल / ‘गला’

/ लाल / ‘लाल रंग’                                           / लाल / ‘लार’

 / गाल / ‘गाल’                                                / गाल़ / ‘गाली’

/ डाल / ‘डालना’                                             / डाल़ / ‘पेड़

/ काली / ‘कालीदेवी’                                        / काली / ‘काले रंग की’

/ पाला / ‘पल्ला’                                                 / पाल़ा / ‘पाला’, ‘ओस’; ‘टोला’

/ ढाल । ‘प्रणाम’                                                 / ढाल़/ ‘गर्भपात’

            परन्तु जहां तक प्रवृत्ति के नियम का सम्बंध है तब दन्त्य ‘ल’ में क्रमिक परिवर्तन आता है। हिन्दी-भाषी क्षेत्रों में मात्र ‘ल’ वर्ण है, परन्तु हिन्दी क्षेत्र से ऊपर की दिशा में चलते हुए कांगड़ा आदि क्षेत्र में दन्त्य ‘ल’ मूर्धन्य ‘ल’ में बदल जाता है – काला से काला। मण्डी, चम्बा आदि पहुंचते-पहुंचते ‘ल़’ प्रायः ‘ड़’ में परिवर्तित होता है– काला से काड़ा। आगे चल कर कुलुई में यह स्वर में बदल जाता है ‘आ’ – काड़ा से काआ। इस प्रकार ‘ल’ का क्रमिक विकास यों लक्षित होता है- नाला > नाला़ > नाड़ा > नाआ, पाला > पाला > पाड़ा > पाआ, खोल > खोल़ – खोड़ (कपड़े खोड़) > खोअ आदि।

       अघोष महाप्राण व्यंजनों (ख, छ, ठ, थ, फ) की ध्वनि सर्वदा ठीक वैसी नहीं है जैसी हिन्दी, पंजाबी अथवा डोगरी में है। बल्कि यदि किसी शब्द में इन अक्षरों के साथ स्वर बलशाली हो तो इनमें एक और ‘ह’ का समावेश होता है। इस तरह इन सबमें और अधिक महाप्राणत्व की प्रवृत्ति रहती है। स्वराघात के कारण ‘ख’ का उच्चारण ‘ह’ हो जाता है और यह प्रवृत्ति आम बोल-चाल तक सीमित नहीं है, लिखित रूप में भी लेखकों की रचना से इस बात की पुष्टि मिलती है। उदाहरणार्थ ‘खेल’ को ‘खेह्ल’, खड़ना को खह्ड़णा (खड़ा होना), ‘छिंज’ को ‘छिंह्ज’, ‘खादा’ (खाया) को ‘खाह्दा’, ‘फिरी’ (फिर) को ‘फिह्री’, ‘ठाका’ को ‘ठ्हाका’, ‘थाना’ के लिये ‘ठ्हाणा’, ‘थाली’ के लिए ‘थ्हाली’ आदि लिखा जा रहा है। अघोष महाप्राण व्यंजनों का यह दोहरा महाप्राणत्व पहाड़ी भाषा की एक स्वतंत्र और अलग विशेषता है।

               सघोष महाप्राण (घ, झ, ढ, ध, भ) की स्थिति भिन्न है। पंजाबी क्षेत्र से लगती काँगड़ी, कहलूरी, सीमावर्ती बोलियों में सघोष महाप्राण व्यंजनों की ध्वनि अपने वर्ग के अघोष अल्पप्राण (क, च, ट, त, प) की ओर झुकती है। वहाँ ‘घर’ प्रायः ‘कहर’ होता है। इसी तरह झंडा , च्हंडा, ढोणा > ट्होणा, धागा ) त्हागा आदि। पहाड़ी भाषा की शेष बोलियों में सघोष महाप्राण व्यंजनों की ध्वनियों में कुछ शिथिलता आती है। जहां पंजाबी डोगरी में सघोष महाप्राण व्यंजन अघोष अल्पप्राण की ओर झुकते हैं, (जैसे घोड़ा से क्होड़ा, ढोल से ट्होल) वहां पहाड़ी की सिरमौरी, बघाटी और महासुई बोलियों में इसके विपरीत सघोष महाप्राण व्यंजन सघोष अल्पप्राण की ओर प्रवृत्त होते हैं, जैसे ‘घर’ शब्द ‘कहर’ न होकर ‘ग्हर’ होता है, ‘झगड़ा’ शब्द ‘च्हगड़ा’ न होकर ‘ज्हगड़ा’, ‘धोती’ शब्द ‘त्होती’ न होकर ‘होती’, ‘भगत’ शब्द ‘प्हगत’ न होकर ‘ब्हगत’ आदि। यहां यह द्रष्टव्य है कि पहाड़ी में पंजाबी डोगरी की तरह घोषत्व को क्षति नहीं पहुंचती बल्कि प्राणत्व में परिवर्तन होता है। पंजाबीडोगरी के क्ह, च्ह आदि की बजाय पहाड़ी में ग्रह, ज्ह आदि का परिवर्तन इसे विशिष्टता प्रदान करता है।

 महाप्राणत्व से सम्बधित पहाड़ी भाषा की विशेषता यहीं समाप्त नहीं होती। इसका एक और गुण भी है। यहां पूर्व, अन्त या मध्य के वर्णलोप के कारण अनुनासिक, अन्तस्थ तथा ऊष्म व्यंजन भी महाप्राणत्व-युक्त हो जाते हैं। इस प्रवृत्ति के और ज़ोर पकड़ने पर जब दो स्वरों के बीच मूल महाप्राण स्पर्श व्यंजन आ जाए तो वे कई बार हकार अथवा अन्य महाप्राण व्यंजन द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं –

          मधुकर > मधुक > माहुँ

          मुखाकार > मुखार > नुहार

          बन्धन > बांधना > बन्हणा

          नख > नख > नैह

          सौगन्ध > सौंह

          नि+भाल > निभाल > निहाल (ना)

          अंधकार > अन्धेर > न्हेर

यह भी उल्लेखनीय है कि पहाडी की अनेक बोलियों में, विशेषतः गादी में

ऊष्म ध्वनियों में ‘श’ और ‘स’ से भिन्न एक अन्य ध्वनि है। हो सकता है यह ध्वनि संस्कृत ‘ष’ जैसी न हो क्योंकि संस्कृत ‘ष’ के उच्चारण को अब हम प्रायः नहीं जानते, फिर भी यह तो निश्चित है कि पहाड़ी की बोलियों में ‘श’ और ‘स’ से भिन्न भी इस श्रेणी की एक अन्य स्पष्ट ध्वनि है जिसे ‘ष’ रूप में ही दिखाना अधिक उचित है। गादी बोली के कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं– षतणा ‘फंसना, लगना’, षुद्र ‘जिसे यज्ञोपवीत पहनने का अधिकार है’, षाधणा ‘बुलाना’ आदि।

       पहाड़ी की विभिन्न बोलियों में हकार की एक विशिष्ट ध्वनि है जिसमें महाप्राणत्व बहुत धीमा सुनाई देता है। यह ध्वनि हल्की खांसी की तरह सुनाई देती है। इस ध्वनि के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में क्षणिक रुकावट सी होती है और फिर श्वास झटके से बाहर निकलता है। इसे काकल्य स्पर्श कह सकते हैं। यह संस्कृत विसर्ग (:) का स्पष्ट प्रतिरूप है अतः पहाड़ी में विसर्ग (:) का होना बहुत ज़रूरी है। यह स्वरयंत्रमुखी ध्वनि है जो विशेष रूप से एक प्रबल स्वर और ण, न, ल, ड, और ल के बीच में स्पष्ट रूप से श्रव्य है, यथा-

         आण (ले आ)                  आ:ण (बिच्छु बूटी)

         बाणा (पहनावा)               बा:णा ( जोतना )

         शाणा (जंदा, ताला)          शाःणा (टहना)

          शिला (बड़ा पत्थर)          शि:ला (जहां धूप नहीं आती)

          हांडा (बर्तन)                   हां:डा (फेरे)

          टोणा (देखना, परखना)   टोःणा (रोपना)

इस तरह पहाड़ी के व्यञ्जन वर्ण निम्न हैं –

कण्ठ्य            क्       ख्       ग्        घ्        ङ्

तालव्य            च्        छ्       ज्        झ्        ब्

मूर्धन्य              ट्         ठ्       ड्         ढ्       ण्

वत्स्य्र                च़्        छ़्      ज़्       झ्

दन्त्य                त्         थ्      द्        ध्         न्

ओष्ठ्य             प्         फ्    ब्         भ्         म्

अर्धस्वर            य्         र्      ल्        ल्         व्

ऊष्म                 श्       (ष्)   स्         ह्         :

उत्क्षिप्त             ड़        ढ़

संयुक्त              (क्ष)      त्र     (ज्ञ)

            इनके अतिरिक्त पहाड़ी भाषा में हिन्दी से भिन्न कुछ अन्य ध्वनियां भी हैं जो महाप्राण व्यञ्जनों से सम्बंधित हैं, जैसे –

            ण्ह, न्ह, म्ह, र्ह, ल्ह, ल्ह़

 

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