खाणा-पीणा, नंद लैणी ओ गम्भरिए | गम्भरी

खाणा-पीणा, नंद लैणी ओ गम्भरिए

गम्भरी

छायाचित्र सौजन्य : रत्न चंद ‘रत्नेश

जीतेंद्र अवस्थी

     हिमाचल प्रदेश के ज़िला बिलासपुर की वादियों में क़रीब-क़रीब पांच दशक से एक गीत चल रहा है जिसके शुरुआती बोल इस तरह हैं- ‘खाणा, पीणा नंद लैणी ओ गम्भरिए, खाणा-पीणा..’। कभी ज़बान-ज़बान पर चढ़े इस गीत को आज भी बड़े-बूढ़े बड़े चाव से सुनते हैं। सुनते-सुनते ज्यों उनकी जवानी ही लौट आती है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, क्योंकि यह गीत गाने वाली के गाने का जादू इन बड़े-बूढ़ों के सर तब भी चढ़कर बोलता था जब वे जवान थे। ज़िंदगी के साढ़े सात दशक पार कर चुकी इस गायिका-गम्भरी देवी का जादू आज भी काफ़ी हद तक बरकरार है लेकिन वक़्त और हालात ने उसे काफ़ी हद तक गुमनामी के अंधेरों में डाल दिया है। अलबत्ता उसे शोहरत की उजास में लाने की इक्का-दुक्का कोशिशें ज़रूर हुई हैं।

गम्भरी कमाल की लोक कलाकार है। उसे सिर्फ लोक गायिका भर कह देना उसके बहु आयामी कलाकार व्यक्तित्व का अपमान ही होगा। वह गाती तो है ही, उसने गीत भी खुद ही तैयार किये हैं। वह थाली-नृत्य में पूरी तरह माहिर है। उसने अपनी एक पार्टी उस समय बनायी थी जब विकास से कोसों दूर पहाड़ की उपत्यकाओं में मंच पर गाना-बजाना हेय समझा जाता था। पार्टी में शामिल लोगों को उसने कई कलाओं में पारंगत किया। लेकिन वक़्त के उस दौर में, स्टेज पर गाना, नाच करना बुरा समझा जाता था। बिलकुल अनपढ़ गम्भरी ने यह चुनौती स्वीकार की तो वह समाज की आंख की किरकिरी बन गयी। भले समाज के पैरोकारों व ठेकेदारों ने तो उसे एक तरह से बहिष्कृत ही कर दिया। समाज की बेदख़ली की शिकार यह एक अदद अदना औरत लोगों से मिले तिरस्कार व अपमान के कड़वे घूंट पीती हुई कला की बुलंदियां हासिल करती गई। जो भूमिका उसके प्रति उस वक्त समाज के ठेकेदारों ने निभायी थी, वही रोल आज सत्ता के मठाधीश बख़ूबी अदा कर रहे हैं। उसे ‘मान्यता’ देना उन्हें गवारा ही नहीं वरना क्या बात है कि बिलासपुर के मशहूर गांव बंदला के एक ग़रीब परिवार में जन्मी गम्भरी किसी भी लोक गायिका से किसी मामले में उन्नीस है। वह भी हिमाचल की सुरेन्द्र कौर बन सकती थी। रेशमा हो सकती थी अथवा रूना लैला बनकर अपनी कला की खुशबू हिमाचल अथवा हिन्दुस्तान की चौहद्दी से बाहर फैला सकती थी। लेकिन इन लोक गायिकाओं की मानिंद वह खुशक़िस्मत नहीं थी। उसे इतना संरक्षण, प्रोत्साहन या अवसर ही नहीं मिला। और इस तरह छह साढ़े छह दशकों के कला-जीवन में नियति से दो-चार होने के बावजूद वह सिर्फ़ गम्भरी देवी ही है-एक आम महिला।

     अलबत्ता, इस समय लदरौर के घंडालवीं गांव (बिलासपुर) में रह रही गम्भरी की कला-क्षमता अब भी कोई कम नहीं है, अपने उन पुराने गीतों को अपनी विशिष्ट शैली में अब भी मंच पर पेश करे तो नदी नालों में ही आग लगा दे। एक हाथ में थाली लेकर अब भी जब वह नाचती है तो उसकी चुस्ती-फुर्ती और हाथ-पांव व शरीर की क्रियाएं देखने वाले ‘अश-अश’ कर उठते हैं। उसकी आवाज़ में जवानी वाली लय है। मोहकता है, अल्हड़पन है, रवानी है और मस्ती है। चंडीगढ़ में रहते हिमाचलियों के एक संगठन द्वारा उसके सम्मान के मौक़े पर उसने जब नाच-गाना पेश किया तो देखने-सुनने वालों ने दांतों तले उंगली दबा ली। उसकी कला इतनी करिश्माई है कि अगर वह गाती तो श्रोता भी साथ ही गाने लग पड़ते, अगर वह नाचती तो दर्शक भी झूम उठते। बस उसके गाने भर की देर है-‘इस जग नाल करके प्यार, भोल्या की लैणा…कमल्या की लैणा…।’ सुनने वाला कोई भी कह उठेगा-यह कोई आम कलाकार नहीं है।

     गम्भरी बताती है-गाना-बजाना तो मेरे ख़ून में ही है। मेरा बापू गरदित्तू भी बड़ा रागी था। वह भजन ही नहीं गुग्गा-गीत भी गाता था। उसे उस वक़्त लोग डमरू मास्टर कहते थे और व्याह-शादी तथा अन्य मौकों पर गाने के लिए उसे बुलाते थे।

पिता के सुर में सुर मिलाकर गम्भरी भी गाने लगी। सात-आठ बरस की थी, तब भी अपनी आवाज़ व गानों से वह लोगों को प्रभावित कर देती थी। पिता की प्रेरणा व प्रोत्साहन से इस बच्ची ने ब्याह शादियों के कई गाने सीख लिए। उसने पिता से गाने-बजाने का बाक़ायदा प्रशिक्षण लेना भी शुरू किया लेकिन यह बीच में ही छूट गया। अभी वह तेरह-चौदह बरस की ही थी कि पिता

का साया सर पर से उठ गया। इसके साथ ही मुसीबतों का बोझ भी ऊपर आन पड़ा। गम्भरी को अपनी ही फ़िक्र नहीं थी, छोटे भाई-बहनों की रोज़ी-रोटी की चिंता ने भी घेर लिया। अलबत्ता यह बालिका इन मुसीबतों, चिंताओं से डरने वाली नहीं थी। वह तो किसी और ही मिट्टी की बनी थी। इसलिए वह समय से पहले ही बड़ी हो गयी और विपरीत परिस्थितियों ने उसे मज़बूत बनाने के साथ-साथ चुनौतियों से भिड़ना भी सिखा दिया। उसके अन्दर छिपी कला-प्रतिभा अंगड़ाइयां लेती रही। गाने-बजाने के साथ-साथ उसने गिद्दा भी शुरू कर दिया। अलग-अलग मौक़ों पर ऐसे कार्यक्रमों से पैसा-धेला कमाकर बहन-भाइयों की रोटी की जुगत-जुगाड़ करने लगी। एक तरफ़ उसकी लोकप्रियता बढ़ रही थी तो दूसरी ओर ‘एक लड़की को खुलेआम’ गाते-बजाते देख व सुनकर तथाकथित भले लोग उसे बुरा-भला कह रहे थे। उन्हीं दिनों उसका एक गाना बहुत लोकप्रिय हुआ था- ‘मेरी गल सुण नी मुंगफलिए चल दोनों पठानकोट चलिए, इत्थे जीणा नी दिंदे लोक, कोई होर ठिकाणा मल्हिए…।

     इन भले लोगों की चर्चा की परवाह न करते हुए गम्भरी ने अपनी कला का निखार-प्रसार-विस्तार जारी रखा। उसकी कला की बातें दूर-दूर होने लगीं। पहले किसी की पार्टी (नाच-गाना) में शामिल होकर कार्यक्रम देती रही-फिर अलग-अलग कलाकारों को इकट्ठा कर अपनी ही पार्टी बना ली। अब से चार-पांच दशक पहले दकियानूसी विचारधारा के चलते ऐसा करना अपने आप में एक इनक़लाब था। लेकिन कहा न, गम्भरी तो बनी ही किसी और मिट्टी की है।

      वह बताती है कि उसकी पार्टी में हारमोनियम मास्टर धनी राम, बांसुरी वादक ठेबो राम व संत राम उर्फ बसंता भी शामिल थे जिसे तब पहलवान रागी कहा जाता था।

     देखते ही देखते गम्भरी की पार्टी की मांग बढ़ी। जहां कहीं भी कोई सार्वजनिक कार्यक्रम होता-गम्भरी बुलायी जाती। लेकिन भले मानस उससे हद दर्जे की नफ़रत करते–’औरत होकर इस तरह नाचती-गाती है सबके सामने…बेशर्मी की भी कोई हद होती है…।’ लेकिन दूसरी तरफ़ उसकी आलोचना करने वाले भी उसी के गीत गुनगुनाते थे। वह बताती है-जो लोग मुझ पर सौ-सौ लांछन लगाते थे, वह लुक-छिपकर मेरे प्रोग्राम देखने भी आते थे। सब फ़िदा थे…।

     गम्भरी अकेले इस वैरी समाज के साथ जूझती रही। इस मोर्चे पर भी वह अकेली ही थी। लेकिन तभी एक शख्स उसकी ज़िंदगी में आया। एक सच्चा दोस्त, पक्का मददगार। और यह था संत राम उर्फ़ बसंता। गम्भरी कहती है-‘हम दोनों ने एक समझौता किया और मैं ख्वाहमख्वाह ही ईर्ष्या रखने वाले और वैरी समाज को छोड़कर बसंते के साथ भाग निकली।’

     गम्भरी और बसंता अब भी साथ रह रहे हैं। बसंता इस समय 71-72 बरस का है। जवानी में वह अव्वल दर्जे का पहलवान था। दूर-दूर तक मशहूर था। उसने हिमाचल के अलावा पंजाब व हरियाणा में भी कई कश्तियां जीतीं। अब भी कहीं कुश्ती हो तो बसंता को उसमें ज़रूर बुलाया जाता है। हालांकि कोई बीस बरस पहले उसने कुश्ती लड़नी छोड़ दी थी। वह गम्भरी के साथ स्टेज पर गाता भी है। कहता है- ‘जब गम्भरी गा-गाकर अथवा नाचकर थक जाती थी तो मैं लोगों को प्रोग्राम में बिठाये रखने के लिए बातें सुनाया करता था। मेरी गप्पें इतनी बढ़िया होती हैं कि लोग बंधे रहते हैं-मैं तां बड़ा गप्पी हूं जी। बात करनी कोई मुझसे सीखे। फिर मैं नाच भी लेता हूं…।’

गम्भरी-बसंता के बीच आधी सदी से ज्यादा लम्बी दोस्ती है। इतने अरसे में भी दोनों एक-दूसरे से दूर नहीं हुए। बल्कि बसंता तो अब भी बहुत ज़्यादा ‘पॉजेसिव’ है और गंभरी उसकी अहसानमंद है। बताती है-बसंते ने मुझे कई कुछ सिखाया है जी। उसकी ही बदौलत मैंने विपरीत स्थितियों में भी

अपना हौसला और मूड बनाये रखना सीखा है। उसने मुझे यह भी बताया कि मुक़ाबले पर उतरे कलाकार की कमजोरियों और उसकी मजबूरियों से किस तरह फ़ायदा उठाना है। यह बसंते के गुरों और मेरी घोर तपस्या का ही नतीजा है कि मैंने शिमले की मशहूर गायिका ‘रोशनी को एक मुक़ाबले में धूल चटायी।’

     दोनों की सहभागिता रंग लायी और गम्भरी ने न केवल गिद्दा बल्कि थाली-नाच भी खुद ही सीखा और अपने गाने खुद ही तैयार करने शुरू कर दिये। ‘खाणा-पीणा नंद लैणा ओ गम्भरिए…।’ वाले गाने में पूरा दर्शन भरा हुआ है। खाओ, पीओ, आनंद करो-और गम्भरी, बसंता दोनों ही इसी फ़िलासफ़ी पर चल रहे हैं। बसंता कहता है-‘अगर हमें देसी घी और मुर्गा-शुर्गा न मिले तो भूखों रहना मंजूर-खायेंगे तो बढ़िया ही। कई बार सफ़र में, रिश्तेदारी में अच्छा खाना न मिले तो हम खाते ही नहीं।’

     गम्भरी एक सवाल के जवाब में खूब जोर का ठहाका लगाते हुए कहती है-‘मेरी पढ़ाई ? निल-बटा-निल जी!’ अलबत्ता वह अच्छी हिन्दी, पंजाबी बोल लेती है। साथ-साथ अंग्रेज़ी के कई शब्द भी प्रयोग करती है। इस तरह एक अनपढ़ गरीब, पहाड़ी औरत ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी कला को नयी बुलंदियां दीं और गाने भी खुद ही तैयार किये। कहती है-‘पहाड़ में, अपने इलाक़े में स्टेज पर गाने वाली मैं पहली औरत थी।

बोलती है- मेरी ज़िंदगी की कहानी तो बहुत ही दिलचस्प है जी, चाहो तो फ़िल्म ही बना लो…।बताती है-गांव में जन्मी, पली, परिवार का बोझ उठाया, नाच-गाना सीखा और बसंते के साथ भाग निकली। पुलिस केस भी बना लेकिन गम्भरी ने कला-यात्रा जारी रखी। पहले मैं फ्री नहीं थी, लेकिन बसंते के साथ भागकर मैं सारे समाज से फ्री हो गयी-निश्चित! अगर इस पहलवान के साथ नहीं भागती तो कोई मुझे स्टेज से उठाकर ही ले जाता…कई लोग मेरे पीछे पड़े हुए थे। बसंते के साथ मैं पूरी तरह आज़ाद थी। हम दोनों ने कई स्टेज प्रोग्राम दिये। 32-33 बरस पहले जालंधर छावनी में पंजाबी सिंगर सुरेन्द्र कौर के साथ फौजियों के लिए प्रोग्राम दिया। तब मुझे मैदान (पंजाब) में शिमले वाली पहाड़न’ कहते थे। मेरे प्रोग्राम से बड़े-बड़े करनैल-जरनैल खुश हो गये। मुझे परमानेंट रूप से प्रोग्राम पेश करने को कहा…बहुत पैसे भी दे रहे थे लेकिन मुझे मंजूर नहीं था…।’

     साथ-साथ रहे अब भी रह रहे हैं, लेकिन गम्भरी-बसंता ने शादी नहीं की। वह कहती है-मैंने बसंते के लिए लड़की देखी और दोनों की शादी कर दी। अब उसके बच्चे हैं, भरा-पूरा परिवार है, मैं भी इसी परिवार के साथ रहती हूं। मैंने बसंते का कर्जा चुका दिया है।’ बसंता कहता है-‘हमें कोई प्रोब्लम नहीं है। मेरे बच्चे गम्भरी को बड़ी मां कहते हैं और पूरा सम्मान देते हैं। मेरी घरवाली भी इसकी पूरी इज्ज़त करती है, खेती-बाड़ी, घर-वार सब पर गम्भरी का ही कंट्रोल है जी।’

     सो इस पहलवान साथी के लिए गम्भरी ने एक बार बंदला क्या छोड़ा कि बाद में वहां जाने का नाम ही नहीं लिया। बल्कि एक गाना भी तैयार किया है-‘चढ़ियां नी जांदियां बंदले रिया कुआलियां…।’ दोनों ने साथ-साथ रहने, प्रोग्राम देने के साथ-साथ एक-दूसरे के साथ शादी न करने का संकल्प भी लिया था, जिसे आज तक निभा रहे हैं। अब भी गम्भरी कहीं जाती है तो बसंता साथ होता है-महफ़िल हो अथवा स्टेज प्रोग्राम। लेकिन शादी नहीं की।

     गम्भरी को एक अफ़सोस ज़रूर है। कहती है-मैं अपने उस्ताद गंगा राम खत्री से सुरताल, गाना-बजाना सीख रही थी। पर यह काम सात-आठ बरस ही चला। अगर गंगाराम खत्री कुछ और बरस जीता तो मेरी जिंदगी कुछ और ही होती।

     गम्भरी का गाना-बजाना सिर्फ़ अपने लिए पैसे इकट्ठे करने तक ही सीमित नहीं रहा। जब हमीरपुर में कुछ बरस पहले भूकम्प आया था और रोपड़ी गांव पूरी तरह तबाह हो गया था तो गम्भरी ने एक प्रोग्राम दिया और इससे जितने भी पैसे उसे मिले, उसने गांव वालों को दे दिये। उसने नगरोटा में सामाजिक कार्यों के लिए भी धन इकट्ठा किया था।

(दैनिक ट्रिब्यून दिनांक 29 मई, 1997 से साभार उद्धृत)

बंदले की धार का गीत

रात के ग्यारह बज रहे थे। घुमारवीं के स्कूल-हॉल में भीड़ इतनी थी कि खिड़कियों और दरवाजों पर भी लोग टंगे थे। 3 अप्रैल, 1991 की उस शाम प्रार्थी जयंती पर शुरू हुआ कवि सम्मेलन आख़िरी चरण पर था। भीड़ भरी चलती बस के सामने गिरते हुए पत्थरों से कवि थे और लोग थे कि गम्भरी! गम्भरी!! पुकार रहे थे। उन्हें जिस कविता का इंतज़ार था, उस का नाम है-गम्भरी। लोकगीत की नायिका और गायिका, तब पैंसठ वर्षीय-बंदले री गम्भरी यानी बंदले की अनारकली ठहरी। लगभग बारह बजे रात घोषणा हुई कि बाहर खुले मैदान में गम्भरी का नाच-गाना होगा। लोग मधुमक्खियों से उड़ गए और कवि सम्मेलन का छत्ता खाली था। हमने उस रात घुमारवीं को गम्भरी में तबदील होते देखा।

आधी रात खुले मंच पर अपनी मंडली के साथ गम्भरी हाज़िर है। घुमारवीं में लम्बे समय के बाद आई गम्भरी को देखने के लिए ही लोग उतावले हैं। औसत कुद, दुबला-पतला शरीर, छींट का सूट पहने साधारण गृहणी सी गम्भरी के लिए उत्सुक भीड़ शांत है। उस कोने बसंता ने ढोलक पर थाप दी और गम्भरी हाथ पर थाली लिए धीरे-धीरे थिरकने लगी। वातावरण की लय को समेटते हुए, बहुत धीमी थिरकन । कंठ से फूटती किसी झरने की झंकार नहीं, बल्कि एक पहाड़ी नदी के प्रवाह-सी लय। पारम्परिक आरती से शुरू किया, जबकि गम्भरी अपने में स्वनिर्मित परम्परा है। बीच में उम्र ने टेक ली, गम्भरी ने खुद भी चेता। बोली-“अब नी रही से गम्भरी। भीड़ करुणा में डूब गई। फिर फरमाइश आई उसी गीत की और गम्भरी में जैसे यौवन लौट आया-‘खाणा पीणा नंद लेणी हो गम्भरिये!’

अब नदी झरने के पड़ाव पर है। भीड़ का उल्लास उमड़ पड़ा है। बसंता बाकी साज़िंदों के साथ ताल-सुर में डूब रहा है और मंच पर गम्भरी षोडशी-सी थिरकती है। कभी डाली-सी झूमती, कभी बेल-सी टूटती। भजन-भेंट से लेकर श्रम और जीवन के दुख-सुख के गीत वह समान प्रभाव के साथ गाती है और भावानुकूल नाचती जाती है :

दूरा रा पाणी हो गम्भरिए भरया नी जांदा!

राजी रहणे बाह्मणी अड़िए ज़िउंदे जिवा रे मेले!

जीवन के प्रति आस्था लिए, प्रकृति के उल्लास में वह अपना गीत गांव-गांव द्वार-द्वार बांटती जाती है। वह बहुत कुछ लोक से लेती है और इसी में अपना भी रचती जाती है। उसमें एक लोक कवि, गायिका और नर्तकी का संश्लिष्ट व्यक्तित्व गहरे प्रभाव के साथ उभरता हैं।

बारह धारों का देश है : बिलासपुर। इनमें से ‘बंदले की धार’ के एक गांव में गरदित्तू के घर जन्मी गम्भरी ने लोक संगीत में इतना नाम कमाया कि ‘बंदले की धार’ और ऊंची हो गई। इसी तरह अखाड़े में बसंता पहलवान ने भी नाम कमाया। ‘गम्भरी के बिना कारज सूना, बसंता बिन छिंज सूनी’ जैसी कहावतें वैसे ही नहीं निकल आती लोक में। गम्भरी का कहना था कि बसंता से उसने शादी तो नहीं की पर ‘नाचदे-गादे बणी गई जोड़ी’। निस्संदेह लोक में कलावंतों की इस जोड़ी को स्वीकार मिला है।

तुलसी रमण

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