अमानवीय आत्माएं

अमानवीय आत्माएं

उमा शर्मा

        भारत के अन्य प्रदेशों की तरह हिमाचल में भी भूतों का काफी प्रचलन है। हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों में रीति-रिवाज परम्पराएं भिन्न-भिन्न हैं लेकिन अधिकतया मिलती जुलती हैं । हिमाचल के प्रायः सभी भागों में भूतों में काफी आस्था है। कुछ लोग तो इनमें बिल्कुल विश्वास नहीं करते। उनके विचार में सिर्फ मन का भलावा और शक है। और इसके इलावा कुछ नहीं । जैसे अंधेरे जंगल में चलते-चलते सामने खड़ा पेड़ या झाड़ी मानव आकृति का एहसास करवाती है। तो डर कर इन्सान समझता है कि भूत खड़ा है और यदि झाड़ी के आसपास जुगनु टिमटिमा रहा हो तो शक पक्का है कि भूत तो सिगरेट पी रहा है। हवा की सायं-सायं पत्तों की सरसराहट रात्रि के पक्षियों की अजीव आवाजें सब मिल कर भूत आस्तित्व की पुष्टि करते हैं।

एक बार मेरे पति सर्दी के मौसम में आफिस से घर आ रहे थे। रात काफी अंधेरी थी (हमारा घर जंगल पार करके आता है)। आगे-आगे एक टार्च वाला आदमी जा रहा था। इन्होंने सोचा कि मैं भी इसके साथ हो लूं टार्च से आसानी होगी । लेकिन जैसे यह भागते वह आदमी और तेज भागता । उसने सोचा मेरे पीछे भूत भाग रहा है । रेस चलती रही । यह उसे नहीं पकड़ पाए और हमारे पड़ोसी का घर आ गया। जब मेरे पति वहां पहुंचे तो घर के सब लोग डरे सहमे से आपस में धीमे-धीमे कुछ बोल रहे थे। जब यह पहुंचे तो पूछा भई क्या बात है। कहने लगे ओह हो आप थे? वह हमारा मेहमान तो बेहोश पड़ा है। उसने समझा मेरे पीछे कोई भूत भाग रहा है।

लेकिन दूसरी तरफ भूतों में विश्वास करने वाले दृढ़ विश्वास से अपने मत की पुष्टि में कई दलीलें रखते हैं कि ‘छल’ जरूर होता है। हमें कई बार भूत फलां स्थान पर मिला। कहते हैं संजोली के घने मोड़ पर एक अंग्रेज औरत बर्फ के दिनों में हर किसी से सिगरेट मांगती फिरती है ‘Give me a Cigarette’ कहते हैं । ब्रिटिश राज्य में एक अंग्रेज औरत इन्हीं मोड़ों पर बर्फ में गिरने से मर गई थी।

इन भूतों की दुनियां भी अजीव होती है । इनकी कई किस्में होती हैं ।

भूत :

यह आदमी भूत होता है । जमीन से लगभग दो फुट ऊंचा चलता है। उजाड़ स्थानों कब्री-स्तानों, श्मसानों में होता है कहते हैं कि जो अकाल मृत्यु से मरते हैं। उन्हीं के भूत बनते हैं । पीछे से आवाज लगाता है। यदि कोई मनुष्य सुन कर जवाब दे दे तो उसकी मत्यू अवश्यंभावी है । यदि न सुने तो बच जाता है ।

चुड़ैल :

यह स्त्री भूत होता है । सुन्दर भड़कीले वस्त्रों में दीखती है। इसके पैर पीठ की तरफ को होते हैं।

पहाड़िया:

अधेड़ भूत होता है । सफेद कुर्ता पजामा (चूड़ीदार) डाले हुक्का उठाए चादर ओढ़े, पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर मिलता है । कहा जाता है कि जब यह मिले तो यदि इसकी चादर छीन ली जाए तो पैसे की कमी नहीं रहती। लेकिन चादर के मामले में पहाड़िया मामा काफी सतर्क रहता है। बिल्ली के गले में घण्टी कौन बांधे ।

बतालू :

छोटा भूत होता है । बिचित्र आकार का होता है। कभी-कभी चार टांगें, चार बाजू, तीन आंखें या दो मुंह लगे होते हैं। कई बार कईयों के ऐसे असाधारण बच्चे पैदा हो जाते हैं तो लोगों को परेशानी में कहते सुना है कि ‘मयो फलाने दे घरे तां बतालू जमी पया’ मतलब अमुक व्यक्ति के यहां बताल पैदा हो गया । यह बतालू पैदा होते ही असाधारण गतिविधियां करते हैं । या बोल पड़ेंगे या चल पड़ेंगे। परन्तु ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रहते ।

झिल भूत :

यह एक प्रकार की झाड़ी का भूत माना जाता है। कांगड़ा में ‘झिल’ का मतलव झाड़ी होता है कई बार लोगों के कपड़े चादर वगैरा यदि नीचे लटकी हो और झाड़ी से फंस जाए तो कई लोग कहते हैं कि उसे झिल भूत ने पकड़ा है । लेकिन अब तो इसका कम बोल बाला है।

घोरी:

यह बाबा भूत होता है । साधु समान नग्न घूमता है । बच्चों को ले जाना इसका काम होता है। इसके साथ एक लंगड़ी कुत्तिया भी रहती है। कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी का प्याला (Bowl) बनाता है और उसी में खुद भी ऊटपटांग चीजें खाता है। कुत्तिया को भी उसी में खिलाता है।

यह सब प्रकार के भूत चिपकू होते हैं । जिसे यह भूत चिपक जाए उसे पीछा छुड़ाना मुश्किल होता है । जब किसी को भूत लगे तो हाथ पैर सिर (बाल खोल कर) इधर उधर पटकते हैं और न जाने क्या-क्या बकते हैं । कई आदमियों के कण्ट्रोल से बाहर हो जाता है। प्राय: देखा गया है कि यह भूत प्रेत ज्यादातर जवान औरतों को ही लगते हैं । (वह शायद इसलिए कि इसी बहाने काम से पीछा छुटा रहे ।)

श्मशान घाटों, कब्रस्तानों पर कई बार चमकती सी ज्वाला दिखाई देती है। लोगों के विचार में जब कोई मर जाये तो भूत खुश हो कर नाचते हैं। यह ज्वाला उनके नाम का प्रतीक है। लेकिन वैज्ञानिकों के विचार में ऐसे स्थानों में हड्डियां होती हैं और हड्डियों में फासफोरस होता है। पानी के सम्पर्क में आने से फासफोरस में चमक आ जाती है ।

ग्रीष्म ऋतु में बजुर्ग औरतों को प्रायः कहते सुना, बच्चो ! फला ज नहीं जाओ। वहां ‘छल’ होता है। भगवान जाने यह ‘छल’ कहाँ तक सच है। ‘ में भी एक बार ज्यूस हरवर्ट का एक लेख आया था, उन्होंने भी यही कहा था “मैं स्वयं भूतों में विश्वास नहीं करता लेकिन मेरे साथ ऐसी घटना घटी कि मैं विश्वास करने हर मजबूर हो गया। उन्होंने लिखा कि हमारे गांव में एक अकेला सा घर था। उसके लोगों का मत था कि इस रहता है। डर के मारे वहां कोई रहना पसन्द नहीं करता था। मैं अविश्वासी तो था ही, अपना मकान वहां बदल कर लिया। रात होते ही वहां तो हंगामा सा मचने लगा-घुंघरू – गाने की आवाज। इधर उधर जा कर देखा तो कुछ नहीं। थोड़ी देर बाद ऐसा लगा जैसे मेरी किताबा की बड़ी अलमारी नीचे गिर गई है। खूब धमाका हुआ लेकिन वहां पहुंचने पर कुछ नहीं। अलमारी वैसे खड़ी थी।

चाहे कुछ भी हो भोली भाली जनता अपनी खून पसीने की कमाई ‘भूत हटाने वाले डाक्टरों की भेंट चढ़ा देती है। हमारे प्रदेश में इन डाक्टरों को भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न नामों से पहचाना जाता है। कहीं पर इन्हें ‘स्याना’, कहीं पर गूगा पीर, चेला, डाऊ, पीर, बावा, डागी प्रसिद्ध हैं। औरतें भी यह काम कुशलता से करती हैं, उन्हें ‘डागी’ कहा जाता है। राखी के कुछ दिन बाद डागी औरतें डगवांस या डगयाली मनाती हैं। लोगों को आम कहते सुना है कि दरवाजों पर लोहे की कोई चीज रख दो आज डगयाली है ।

यह डागनियां खूब सज संवर कर उस दिन अपने इष्ट देव के स्थान (जो कंडाघाट के पास की ऊंची पहाड़ी पर स्थित है) पर जाती हैं। न जाने वहां पर क्या-क्या होता है। डगयाली के बाद यदि किसी का कोई जानवर आदि मर जाये तो यही कहा जाता है कि डागी खा गई।

यह स्याने और डाऊ लोगों की हर बिमारी का इलाज करने का दावा करते हैं। लोगों के अन्ध विश्वास की हद नहीं जब भी कुछ हुआ तुरन्त कह दिया इसे तो किसी ने कुछ किया है। डाक्टर अथवा वैद्य कुछ नहीं कर सकते । चलो डाऊ के पास ।

वहां का दृश्य भी बहुत दर्दनाक होता है। कई लोग भय से कई तमाशा देखने के शौक से इकट्ठे हो जाते हैं । डाऊ कई चीजों को मिला कर धूनी बनाते हैं और फिर ग्रसत व्यक्ति को धुनी दी जाती है। और पूछा जाता है। बता तू किसका भूत है ? किस ने तुझे भेजा है ? क्यों आया क्या लेकर जायेगा ? यदि धूनी लगने से जवाब न मिले तो संगल डंडे से उसकी पिटाई की जाती है। पिटने के बाद ग्रस्त मनुष्य का भूत बोलने लग जाता है । मैं फलां व्यक्ति का भूत हूं, फलां ने मुझे भेजा है। फिर डाऊ उससे सौदा करता है। बता कैसे जायेगा। कितना अनाज लेगा, कितना लोहा लेगा, कितना पैसा लेगा आदि आदि (शायद जो-जो चीजें डाऊ की जरूरत की हों) । भूत बोलने लग जाता है इतनी-इतनी चीजें फलां वृक्ष के नीचे गढ़ा खोद कर उसमें डाल देना और उस पेड़ में कील गाढ़ देना, मैं मनुष्य से निकल कर कील द्वारा पेड़ में प्रवेश कर जाऊंगा। आश्चर्य की बात है कि जब इतने जोर से मार पड़ती है तो चोट कैसे नहीं लगती होगी।

एक किस्सा याद आया, एक जवान औरत का। उसकी सास उसे बहुत तंग करती थी। काम अधिक लेना, खाने पहनने को ऐसे ही देती थी। वधु दु:खी थी, दुखी होकर पीर से इलाज पूछने गई। पीर ने बताया। दूसरे ही दिन वधु को दौरे पड़ने शुरू हो गये, हाथ पैर पटकना, सिर मारना और ऊट-पटांग बातें करनी । ‘स्याना’ बुलाया गया । स्याने ने मन्त्र पढ़े और कुछ सोच कर बोला बहुत खतरनाक भूत है। मार पीट कर और धूनी देकर उससे बुलाया गया तो बोली कि इसके अन्दर मैं इसके बाप का भूत हं यदि इसकी सास इस पर अत्याचार करना छोड़ दे तो मैं निकल जाऊंगा नहीं तो सास में प्रविष्ठ करके उसे तंग करूंगा। सास बेचारी डर गई और कभी उससे काम न लेने की कसम खाई और जिन चीजों की भूत ने इच्छा प्रकट की उनका दान किया।

कई बार लोगों को कहते सुना है कि किसी ने अमुक व्यक्ति को ‘ढकांदरा’ लगा दिया है। यह ‘ढकांदरा’ क्या बला होती है ? ढकादरा मेरे विचार से तो एक प्रकार की एलर्जी (allergy) होती है जो कई बार कोई चीज खा लेने से हो जाती है । इसमें रोगी का गला, मुंह, बाजु आदि में सूजन और खारिश हो जाती है। जैसे किसी जहरीली चीटियों के काटने से झाउड़ जैसे पड़ जाते हैं । ग्रस्त व्यक्ति को डाऊ के पास ले जाया जाता है जहां उसकी झाड़ फूंक शुरू हो जाती है।

जहां यह लोग भूत प्रेत उतारने का काम करते हैं वहां किसी को चिपकाने में भी पीछे नहीं चूकते। किसी को भूत चिपका देना, किसी के घर में क्लेश डालना, पति-पत्नी में झगड़ा करवाना, भाई-भाई में अनबन करवाना आम बात है।

कुछ परिश्रम किये बिना यह लोग काफी पैसा कमा लेते हैं । इनके मुख्य ग्राहक गांव के गरीब अनपढ़ और भोले लोग होते हैं जो वास्तविकता से अनभिज्ञ होते हैं। और अपने खून पसीने की कमाई इन ढोंगी लोगों की भेंट चढ़ा देते हैं ।

समय बहुत बदल चुका है । विज्ञान ने काफी उन्नति कर ली है हमें इन आधारहीन बातों को न मानते हुए अपना ध्यान काम की तरफ लगाना चाहिए । और समाज के इन ढोंगी तत्वों को निकालना होगा।

इसके लिए युवावर्ग को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा तभी इनके चुंगल से छुटकारा मिल सकेगा। बिमारियों के इलाज के लिए सरकार ने सरकारी हस्पताल खोले हैं। जहां पर योग्य चिकित्सक विद्यमान है । डाऊ चेले से इनका इलाज न करवाकर डाक्टरों के पास जाना चाहिए। ताकि गरीबों की मेहनत की कमाई समाज के इस वर्ग के हाथ में जाने से बच जाए।

मैंने कई लोग ऐसे देखे हैं जो इन चेलों के चक्कर में पड़ कर बिल्कुल खाली हो चुके हैं लुट चुके हैं। न तो बिमारी का इलाल हुआ न भूत गया। कमजोरी जोर पकड़ती गई फिर वही बात हो गई धोबी का कुत्ता घर का न घाट का । न इधर के रहे न उधर के।

डोगरा लॉज शिमला

(हिमाचल प्रदेश)

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