ईश केन कठ प्रश्न माण्डूक्य उपनिष्दं रा पहाड़ी अनुवाद | अ्नुवादक एंव व्याख्याकार पं भवानी दत्त शास्त्री

ॐ श्री परमात्मने नमः

प्रार्थना

मोहावर्त-निबद्ध-जीव-निवहा पश्यन्ति नानापि यत्

सर्वत्रापि विभासते सुमधुरं यस्यैव भास्सर्वदा।

विस्मृत्यैव जना विचार-रहिता यत्किन कुर्वन्त्यहो

तद् ब्रह्मैव समस्त-लोक-शरणं सत्य परं धीमहि।

मोहारे कन्चाल़े मंझा फस्सी गई रे जीव यों

जेज्जो एत्थी कधी भी नी देखदे लगी रे;

जेस्सरी ही सदा सारे जोत सोभा देयां ही;

जेस्सरी विचार छाडी होर जेज्जो भूली कन्ने

क्या नी करदे लोक? से ता सरण ही सभी री;

ब्रह्म पर सत्य से, तेजो याद करांहे।

 निवेदन

आपणे पैहल़े कई जन्मारे कर्मां फलस्वरूप ही मनुखदेह मिलाही होर तिद्दीरे अनुसार ही एत्थी सभ रिश्तेनाते बणांहे। मावा-बाबारा लाड-प्यार ही सभीरा पालन पोषण करांहा होर समय बीतने पर तिन्हांजो आपणे पैरापर खड़ा हुणेलायक बनाई देयां हा। ब्याहा हुआं हा होर लाड़ा-लाड़ीरे रुपाच जीवनजात्रा आरम्भ हुआंही। होर स्यों ही फेरी मावा-बाबारी पदवी पाई आपणे परिवारारी जिमावारीरे बन्धनांथे बज्झी जाहांहे। जिह्यां जिह्यां मनुख बड्डा हुन्दा जाहांहा तिह्यां तिह्यां जिमावारी बधदी जाहांही। इतने च बुढ़ापा आई जाहांहा, इन्द्रियां ढिल्ही जाहांही, शरीर कमजोर हुई जहांहा होर कई रोग दबांहां हे। खपरा किच्छ कमाई नी सकदा होर परिवारा रे कट्ठे बोझजेहे बणी जाहांहा। फेरी समय आओणे पर चली जाहांहा सभे रिश्तेनाते एत्थी छाड़ी के।

       सभीभूत प्राणियांरा ए खेल कालारी गतिरी परिधिच चलदा ही रैहां हा। पता नी ए(खेल) केबेथे चलीरा हा ? सभे एस्सही खेलारे खिलाड़ी हे । एक समय आओणेरा हुआंहा, जेबे खुसी मनांहे होर एक समय जाणेरा हुआं हा, जेबे सभे दुःखी हुआं है। संसाराच आऔणा ही जाणे रे कट्ठे होर एत्थीर्थ जाणाही आओणेरे कट्ठे हुआं हा। मूढ़ आओणे-जाणे रे चंक्राच बज्झीरे बगत बित्तेया करांहा भूलभुलैयारे भिंघलाच सभीरा।

       एस्स भूल भुलैयारे भिंघला पास्से जेबे हांऊ ध्यान देआं हा तां सोचां हा जे परब्रह्म परमात्मा मॉह पर बड्डी कृपा रही जे मेरे जीवनारे पिछले 47 साहित्य होर कला सम्बन्धी कामांच गुज़रे। आपुजो पढ़ाने होर होरियांजो पढ़ाने रे मौके मिले। राष्ट्रभाषा हिन्दीरे प्रचार होर प्रसारारा सौभाग्य प्राप्त हुआ। कविगोष्ठियां, कवि दर्बार, संगीत सम्मेलन, चित्रप्रदर्शनियां होर नृत्य नाटक आदि रे भी सफल आयोजन हुन्दे रहे। गीता श्रेणी च अध्यात्म विषय भी अछूतनी रैह्या । बड्डीगल्ल ता ए हुई जे मेरा ध्यान आपणी मातृभाषा पहाड़ी च भी गया।

       1935 च ‘ओ भौरे, उड्डी लैणा गाई गाई के’ ए पहाड़ीच पैहला गाणा बणेया। चावेचावे समीए गाया, आज भी गाहांहे। फेरीता 1954 च गीतारा अनुवाद भी पहाड़ीगाणेच हुन्दालगेया होर आठां वर्षांच परा हुआ, पर 27 वर्षां तका ए पोथी नी छपी, 1989 जो प्रकाशित हुई।

       जलाई, 1964 रे अन्तिम सप्ताहच पूने (महाराष्ट्र) जाणे होर स्वाया महीना तेत्थी रैहणेरा सौभाग्य प्राप्त हआ, राजकुमारी श्रीमती इन्दिरा सेन जी री कृपाथे। तेत्थी ईशावास्योपनिषद् होर केनोपनिषद्-दुंहूंरा पहाड़ीच पद्यानुवाद प्रभुकृपाथे हुआ। राजकुमारी साहिबा रे ही सौजन्याथे तेत्थी हिन्दी कवितायें-1937 थे 1964 तका लिखीरी ‘कवितासंग्रह’ पुस्तकाच प्रकाशित हुईं।

       दिसम्बर, 1969च राजकीय उच्चतर माध्यमिक कन्या पाठशाला, मण्डी थे सेवानिवृत्त हुणेरे बाद यों पुस्तकां लिखीं-

  1. भजगोविन्दम् संस्कृतगीत कने पहाड़ी पद्यानुवाद। 1977

  2. हिम कुसुमाञ्जलि संस्कृत काव्य कने हिन्दी, पहाड़ी, अंग्रेजी अनुवाद 1978

  3. लेरां धारां री पहाड़ी गीत, कवितायें 1953 थे 1984 तक

  4. हिम-सुमन-गुच्छम् संस्कृत काव्य- कने हिन्दीअनुवाद 1987

  5. विपाशा-लासा: संस्कृत काव्य- कने पहाड़ीपद्यानुवाद 1988

       26 मार्च, 1988 जो हिमाचल कला, संस्कृति होर भाषा अकादमी, शिमलारा वर्ष 1986 रा साहित्य पुरस्कार प्राप्त करने पर होर 18 फर्वरी, 1989 जो पहाड़ी साहित्य सभा दिल्ली द्वारा ‘पहाड़ी साहित्य चूड़ामणि’ सम्मानाथे सम्मानित हुणेपर ए सत्प्रेरणा मिली जे एब्बे उपनिषदारे मन्त्रांरा भी गीता साही अनुवाद करना चाहिये। फलस्वरूप ए सत्कर्म भी प्रारम्भ हुई गया होर मार्च, 1993 जो ‘ईश’, ‘कन’, ‘कठ’, ‘प्रश्न’, ‘मुण्डक’, ‘माण्डक्य’ ‘ऐतरेय’, ‘तैत्तिरीय’, होर ‘श्वेताश्वतर’ उपनिषदांरा पहाड़ीच सान्वय पदार्थ होर पद्यानुवाद हई गया। ए ईश्वरीय पावन कर्म था। तिन्हें ही प्रेरणा दित्ती, तिन्हें ही एस्सजो करने री शक्ति दित्ती होर तिन्हां रीही कृपाथे ए हुआ।

       इह्यां अनुवादारा काम पूरा हुणेपर इध्दिरा प्रकाशन विचाराधीन था। से भी सौखा हुई गया। की ? जे एब्बे हिमाचल कला, संस्कृति होर भाषा अकादमी, शिमला ‘पहाड़ी-पुस्तक-प्रकाशन-हेतु-सहायपतानुदान’ एस्सा योजनारे अन्तर्गत 80 प्रतिशत अनुदान पहाड़ी-अनुवाद-विधाच भी देया करां ही, तां अनुवादा सावगी यो उपनिषदां छपीजाणी, एढ़ा विचार हा।

       एस्सा वर्षा ता पैहली पंज उपनिषदां- ‘ईशावास्योपनिषद्’, ‘केनोपनिषद्’, ‘कठोपनिषद्’, ‘प्रश्नोपनिषद्’ होर ‘माण्डूक्योपनिषद्’ ही प्रकाशित हुई सकणी, जुदी-जुदी नी, एकी पुस्तकारे रुपाच।

       जिह्यांजे आजकाले आसरा, आपणी मातृभाषा पहाड़ीच गीता घरा-घरा पढांहे, बहुतकिच्छ समझीपांहे होर चावे-चावे गाहां हे, तिह्यां ही उपनिषदां भी एब्बे पढ़नी ही।

       गीता जो होर उपनिषदां जो पहाड़ी भाषाच पढ़नेरा भी मौका मिलना आस्सारा सौभाग्य हा होर ए परमात्मारी कृपा ही।

भवानी दत्त

संचालक, साहित्य सदन,

मण्डी (हि.प्र.)

            

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