वैदिक सोमरस और कुल्लुई सूर -मोलू राम ठाकुर | सोमसी, अप्रैल, 1978

वैदिक सोमरस और कुल्लुई सूर

 

मोलू राम ठाकुर

    वैदिक काल के भोजन-पान में दो पेय-पदार्थों का प्रमुख नाम आता है–सोम और सुरा । सोम आर्य या जाति का प्राचीन पेय रहा है । यह शराब नहीं था, बल्कि सोम नामक जड़ी-बूटी का रस था । यह प्रायः सोमयज्ञ में देवताओं को अर्पित करके पिया जाता था। इसके पीने से मन का पाप दूर होता था, असत्य का नाश हो था, और सत्य को वृद्धि मिलती थी। इसीलिए वैदिक साहित्य में सोम की प्रशंसा की गई है। इसके प्रयोग से सद्विचारों का संचार होता था और आध्यात्मिक प्रकाश प्रज्वलित होता था । इस के विपरीत सुरा शराब थी। इस के प्रयोग से बद्धि, धैर्य और स्मरण शक्ति नष्ट होती है । धर्म, अर्थ और काम सभी में ह्रास होता है। इसीलिए प्राचीन साहित्य में इसकी निंदा की गई है । ऋग्वेद क अनुसार सुरापान करने वाले लोग ‘सुराम’ रोग से पीड़ित होते थे तथा उन की पाप की ओर प्रवृत्ति होती थी (10.131.5) । वैदिक साहित्य में सोम और सुरा का इन शब्दों में अन्तर बताया गया है-सोम सत्य, अभ्युदय तथा प्रकाश है और सुरा असत्य, पतन तथा अन्धकार है। (शतपथ ब्रा 05.1; 5.28)

    हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में अब भी सोम और सुरा का प्रयोग होता है । वैदिक साहित्य में सोम और सुरा के प्रयोग के बारे में अनेकों संदर्भ पाते हैं । परन्तु सोम पौधा क्या है ? यह आज कोई नहीं जानता। आजकल देश-विदेश में इस सम्बन्ध में शोधकार्य हो रहे है । ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं से ज्ञात होता है कि मौजवत नाम का पहाड़ सोम के लिए प्रसिद्ध था और यहां सबसे अधिक सोम होता था–सोमयेव मौजवतस्य (ऋग्वेद 10.34.1) | विद्वानों का मत है कि यह पहाड़ी अफगानिस्तान के बलख़ में है। परन्तु कुल्लू में भी मज्ञाट नाम का स्थान और पर्वतशिखर है, इसके पास ही ‘सोमसी’ नाम का गांव है। क्या इस से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वैदिक साहित्य का मौजवत यही पहाड़ हो और सोम यहीं पैदा होता हो। इस बात की पुष्टि इस क्षेत्र में प्रति वर्ष बीस भादों के दिन शिखर और पौधा पूजा से स्पष्ट हो जाती है । उस दिन लोग पहाड़ों की चोटियों पर जा कर प्रातः ही पहले विशेष भोजन बना कर देवताओं के नाम चढ़ाते हैं और उसके बाद इधर उधर हरे घास पर हाथ मार कर ताज़ी ओस चाटते हैं । इस उद्देश्य से विशेषतया वे लोग उन्नीस भादों को ही पहाड़ों की चोटी पर जा कर डेरा डालते हैं जो दीर्घकालिक घातक रोगों में ग्रस्त हों या जो स्त्रियां बांझ हों, और प्रातः ही सब से पहले उठ कर पर्वत-शिखा पर दूर-दूर तक चल कर प्रोस पीने का क्रम जारी रखतं हैं। उल्लेखनीय है कि वैदिक साहित्य में सोम को मद के रूप में कम तथा स्वास्थ्यबर्धक द्रव्य के रूप में अधिक दिखाया गया है, ‘यह सभी रोगों को दूर करने में समर्थ है, इस के सेवन से वक्तृताशक्ति बढ़ती है और दीर्घ जीवन प्राप्त होता है (ऋग्वेद 10.71.10) ।’ बीस भादों के प्रातः काल कुल्लू के तारापुर गढ़, मोजग और मझाट पर्वत शिखरों पर प्रोसबिन्दु सेवन का ठीक यही प्रभाव है। लोग प्रायः पीठ के पीछे से हरी घास पर हाथ मार कर ग्रोस बिटोरते हैं। आज किसी को उस जीवनदायिनी की पहचान नहीं है, जिस किसी भाग्यशाली के हाथ लगी, वह कष्टों से मुक्ति पाता है । बांझपन से मुक्ति के तो अनेक उदाहरण देखने को आए हैं।

    हिमाचल के इन पर्वत-शिखाओं पर केवल बीस भादों को ही शिखर पूजा और ओस-सेवन की प्रथा क्यों है। इस का सम्बन्ध भी हमारी वैदिक परम्परामों से है। सोम को गिरिष्ठ और पर्वतावृद्ध नाम भी दिए गये हैं जो इस के वर्षा ऋतु  में गिरि-पर्वतों पर पैदा होने के प्रतीक है । प्राचीन साहित्य में ऐसा उल्लेख आता है कि सोम वर्षा द्वारा पृथ्वी पर लाया जाता है । इससे यह अभिप्राय हो सकता है कि सोम की उत्पत्ति वर्षा ऋतु में पर्वतों पर होती है।  वैदिक साहित्य में यह भी उल्लेख आता है कि सोम को श्येन पक्षी स्वर्ग से लाया था । वास्तव में पर्वत शिखरों पर उत्पन्न होने के कारण ही इस का सम्बन्ध स्वर्गलोक से जोड़ा गया है। भादों का महीना इस पहाड़ी श्रेत्र में वर्षा ऋत का प्रमुख समय है। श्येन पक्षी को कुल्लू की स्थानीय भाषा में शीण कहते है और यह पर्वत शिखरों पर वास करता है ।

    सुरा को आज लोग अपनी भाषा में ‘सूर’ कहते हैं। कुल्लू और इसके निकटवर्ती हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रों में इसका बहुत रिवाज रहा है। मेले-त्यौहार, शादी गमी, ‘जौट-ज्वार’ कोई भी कार्य इसके बिना पूरा नहीं होता । परन्तु यह शराब कदापि नहीं है। यहां पेय पदार्थ मुख्यतः तीन रहे है–चाकटी, सूर और सौरा । चाकटी केवल चावल और जौ की बनती है । वैदिक सोमरस का भी जौ (सं0-यव), दूध और दही के साथ सेवन किया जाता था। इसी मिश्रण के कारण इसे याशिर भो जाता था ( ऋग्वेद 5. 26. 5 ) । ‘सूर’ केवल कोदा अन्न की बनती है। और कोई अन्न इस में नहीं पड़ता। इस में मादकता बहुत कम होती है । यह बलवर्धक अधिक है । साधारण निवासियों का यह पेय-पदार्थ है । सौरा’ शराब है । यह चाकटी, सूर, सेब और अंगूर आदि के आसवन से तैयार होता है । हाल ही तक ‘सौरा’ का कुल्लू में कोई प्रचलन नहीं था । आज भी यह केवल भ्रष्ट और दूषित संगति का सेवन है । साधारण लोगों में इसका प्रयोग नहीं है । साहित्य में सुरा का अनेक रूपों में उल्लेख मिलता है । परन्तु यह स्पष्ट है कि वैदिक साहित्य के प्रारम्भिक काल में जिस सुरा के गुण बताए गए हैं वह रामायण काल की सुरा से बहत भिन्न थी। रामायण में वारुणी, सौवीरक, आसव, शर्करासव, मैरेय, माध्वीका आदि अनेक प्रकार की सुरा का उल्लेख है । ये पर्णतया शराब या उपर्युक्त ‘सौरा’ है । ऐसी सुरा की वैदिक साहित्य में भरपूर निंदा की गई है । इसे मांस और जुआ के समान निन्दनीय बताया गया है।

सोम कौन सा है?

    सूर तैयार करने की दो पद्धतियां हैं–पहली पद्धति औषधि से सम्बन्धित है और दूसरी पद्धति मूल ‘सूर’ से । परन्तु वास्तविक अभिरुचि औषधि निर्माण से है । इसका अध्ययन अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है । परन्तु औषधि वास्तव में अनेक जड़ी-बूटियों का मिश्रण होता है । इस मिश्रण को लोग ‘ढेली’ कहते हैं । ढेली के निर्माण के लिए सौ से अधिक जड़ी-बूटियों का प्रयोग होता है । परन्तु इन में मुख्य साठ हैं । इन साठ का विवरण अत्यन्त रोचक है, क्योंकि अधिक सम्भव है इन्हीं में से कोई सोम बूटी भी हो । इन जड़ी-बूटियों को बीस भादों के दिन ही भूखे पेट एकत्रित करना होता है और इन्हें वही आदमी एकत्रित करता है जिसे इन की पहचान हो । प्रमुखतः ये सभी जड़ी-बूटियां पहाड़ों की चोटियों पर मिलती हैं। यद्यपि इनका वैज्ञानिक विश्लेषण अभी नहीं हुमा है परन्तु लोगों को इन के गुणों का ज्ञान है । यहां उन का सामान्य परिचय ज़रूरी है । जड़ी-बूटियों के नाम स्थानीय है यद्यपि इन में से अनेक का परिचय आयुर्वेदाचार्यों को ज़रूर है । इनका ज्ञान अब आए दिनों कम होता जा रहा है और सम्भवतः समाप्त हो जाएगा । स्थानीय भाषा में इन के नाम गुणों के अनुसार है-यथा (1) नकटीशी-चपटे, छोटे पत्ते पीले फूल, अमल-युक्त गन्ध जो नाक को लगती है । पाचन शक्ति – वर्धक है । कब्ज़ निवारण के लिए प्रयोग किया जाता है ; (2) गुड़ला बड़ा–चौड़े नर्म पत्ते, नीला फूल, पत्तों का स्वाद मीठा; (3) गड़ला छोटा-पत्ते कदरे छोटे, फूल का आकार भी छोटा, परन्तु फूल श्वेत । ये दोनों भूख बढ़ाते हैं ; (4) बराघा-रा-जौफा-जैसा ऊपर पौधा वैसे ही भूमिगत जड़ों का आकार बाघ के पंजे की तरह, पत्तियां बारीक; (5) डढाणा–इसे ठठामाणा भी कहते हैं। बारीक पत्ते, चौड़ा घना पौधा, बीच में एक डंडी सी निकलती है जिस पर एक फूल निकलता है जो प्रायः कली रूप में ही रहता है। यह बुझते हुए दिल को नव-शक्ति समंत्रित करता है। दिल घट रहा हो तो लोग इस की जड़ें चबाते हैं; (6) चिड़ी-चूण-सीधा पौधा, पत्ते मोटे और लम्बे फूल नहीं निकलते, फल ही दिखाई देते हैं जो पक कर लाल हो जाते है जैसे फलों का गुच्छा हो, दाने अनार के दाने की तरह होते है। (7) घूमण-नीला फूल, छोटे तथा नोकदार पत्ते, सख्त कड़वी गन्ध । इस के खाने से सरूर सा आ जाता है (8) बकरशिंगी-सीधा पौधा, सिर पर पीला फ़ूल जिस का रूप ठीक बकरे के सींग की तरह मरोड़दार और तिरछा होता है। यह भूख की कमी दूर करता है। खांसी व दमे के लिए लाभदायक; (9) बराघा-री-शाई-जंगली सरसों, पत्तों का रंग अन्यथा ठीक सरसों का रूप (10) शरबरा-श्वेत फल, पत्ते भी कुछ सफेद, आस पास सुगन्ध फैलाता है । अजीर्णनाशक (11) ओशतली-बहुत ही ऊंचाई पर दस हजार फ़ुट से ऊपर पैदा होती है । बारीक छोटे पत्ते जिन पर हर समय, कड़कती धूप में भी ओस (शबनम) की बूदें चिपकी रहती है । पुराने बुखार की दवा है ; (12) कौड़खरू शेता पौधा केवल सीधा डंठल, पत्ते और फूल श्वेत रंग के, जड़ें पीली; (13) कोड़खरू काल पत्तों का ऊपरी भाग श्वेत, परन्तु निचला तरफ़ बिलकुल काला । पौधों की रंगत कदरे लाल दोनों कौड़खरू ज्वर की उत्तम औषधियां हैं। बिगड़े और पुराने बुखार के उपचार के लिए प्रयोग करतें हैं । इनका स्वाद बहुत कड़वा होता है ; (14) निंबली-सीधा डंठल, केवल एक डाली उस पर एक ही फूल लगता है ; (15) निंबला-पत्ते और फूल निंबली की तरह, परन्तु पौधा झाड़ीदार । ये दोनों हर प्रकार के द्रव को निर्मल बनाते हैं । उदर विकार में उपयोगी ; (16) डोरी-पौधा लम्बा, फूल लाल । कई मन जौ के आटे की जब ‘ढेली’ बनाई जाती है तो जितनी भी सैंकड़ो में रोटियां बनेंगी, पकने पर हर एक रोटी के बीचों बीच चौड़ाई की ओर से लाल धारी बनी होती है । यह इस का प्रभाव है । धारी जितनी लाल होगी, उतनी ही डेली अधिक प्रभावशाली होगी; (17) गिद्धा-मुसली-लाल डंठल, सीवी डाली । शरीर में स्फ़ूर्ति लाती है। इस में लड़ाई के गुण होते हैं, यथा गद्दा (मुगदर) और मूसल साथ रखने की प्रवृत्ति; (18) ढुण मणाट–लता-बेल रूपी पौधा आध फ़ुट से ऊंचा नहीं होता ; (19) कटारी-कटार हथियार के आकार के मोटे पत्ते आगे से नोकदार । हाज़मे के लिए इस को पीस कर औषधि के रूप में खाते हैं। कब्ज़ के लिए रामबाण (20) कौड़ी कटारी-कटारी के ही रूप की, परन्तु पौधा और पत्ते छोटे । कुनीन की तरह कड़वी, ज्वर की उत्तम औषधि ; (21) डुंडलू कूरी-पीले रंग के बारीक पत्ते । बारीक नोकदार दाने जो कपड़ों में चिपक जाते हैं। (22) बांदर छौली-जंगली मक्का, पौधा ठीक मक्की की तरह परन्तु आकार छोटा । इसे मंगोहलू भी कहते हैं। इस में सफ़ेद रंग के फूल लगते है जो शीघ्र झड़ जाते हैं ; (23) चिकटी कूरी-ऊपर सं0 21 से भिन्न, फुट कण्डा की पहाड़ी किस्म, मोटा और चौड़ा पत्ता, चिकने फ़ल जो कपड़ों के साथ चिपक जाते हैं। कई प्रकार की प्रोषधियां बनती हैं, सांप काटे की उत्तम दवा, पत्थरी रोग की बढ़िया औषधि ; (24) बूढी रा लोगड़ एक लम्बा और सीधा पौधा, कोई शाखायें नहीं, पत्ते लगते और गिरते जाते हैं । पौधा सीधा डंडा रह जाता है जिस के गिर्द रुई की तरह नर्म फूल चिपके रहते है । बच्चों की पेट-दर्द, ज्वर और जुकाम में क्वाथ रूप में बढ़िया औषधि ; (25) शठ जलाड़ी-सीधा पौधा जिस की अनेक (साठ) जड़ें होती हैं । सफ़ेद फूल, चौड़ा पत्ता, पेट दर्द और ज्वर की दवा, बदहज़मी को दूर करती है ; (26) कोठा-इस के पत्ते छोटे, फूल भवन (कोठी) की तरह अनेक तहों वाला । इसके फूलों का रस खांसी तथा जुकाम के इलाज में उपयोगी, इस के पत्ते अजीर्ण में भूख बढ़ाते हैं ; (27) बण जुआणे-अजवायन की सुगन्ध और गुण वाला पौधा जिस का तना जमीन के साथ फैलता है, फूल जामुनी रंग के, पेट दर्द की उत्तम दवा , श्वास रोग, दमा तथा काली खांसी में इस का प्रयोग करते हैं। दांत दर्द की भी औषधि ; (28) शुतपुतली-छोटा पौधा परन्तु लम्बी शाखें, पत्ते भी लम्बूतरे नोकदार दृष्टि की शक्ति को बढ़ाती है ; (29) बलातर-छोटा पौधा, सफ़ेद पत्ते, गुलाबी रंग के फूल । बलवर्धक जड़ी है। स्फ़ूर्ति और उत्तेजना बढ़ाती है ; (30) टुम्बली मुंडी-चौड़ा पौधा जिस के पत्ते आगे से पृथ्वी की ओर झुके होत है । नींद लाने की औषधि है ; (31) हौंउली–एक फलीदार पौधा, फलियों की स्वादिष्ट चटनी बनती है। पौधा 2 फुट के लगभग ऊंचा, चौड़े पत्ते, जहां उगने लगता है तो सारे क्षेत्र में फैल जाता है।

(32) कोर्थ दुधला इस के पत्तों, जड़ों और फ़ूलों से दुधिया रस निकलता है, जो दुर्बलता के इलाज में उपयोगी होता है। इससे मीठी सुगंध आती है; (33) कायल–यह एक बड़ा वृक्ष है जो चील की तरह इसी जाति का पेड़ है। इसकी सूई की तरह नर्म कौंपलें कई बीमारियों में काम आती है, इस का तेल कफ़ आदि को दूर करता है, चर्म रोग में भी उपयोगी है ; (34) भेरल-बरास (बराह या बुरास की जाति का वृक्ष है, परन्तु इस पर बरास की तरह लाल फूल नहीं आते । इस की कौंपलें पेचिश, सिर दर्द और बवासीर के इलाज में प्रयुक्त होती हैं । (35) डानकू–एक छोटा नर्म पौधा है जिस पर तीन या चार फूल लगते हैं, फूल में बड़े आकार का फल-सा लगता है, जो खाने में मीठा होता है, पौधा नीचे की ओर झुका रहता है, नींद लाने के लिए उपयोगी है; (36) जुज़ला–पौधे के तने और पत्तों पर बाल-से उगे होते हैं (37) दूध-छाउं ली-छोटा सीधा पौधा, छोटे पत्ते । इस की जड़ों और पत्तों से दुधिया रस निकलता है जो बड़ा बलवर्धक होता है ; (38) मटोशल–बहुत ऊंचाई पर होता है । बारीक पत्ता, फल नहीं होते । जड़ो में रेशे-से होते हैं जो ऊन की तरह लगते हैं । ज़ुकाम, नज़ला, सिर-दर्द की औषधि है; (39) घण मिसरी चौड़े पत्ते डण्ठल छोटी, फ़ूल गुलाबी । इस की जड़ें मीठी होती है । गवाले उखाड़ कर खाते हैं। खांसी, बुखार

पेचिश की लाजवाब दवाई । शूल, पेट-दर्द में प्रयुक्त होता है, । (40) कोदरा-कोदा अन्न, इस के नर्म पत्ते डाले जाते हैं । सख्त अन्न है, परन्तु पचाने वालों के लिए बड़ा बलवर्धक होता है ; (41) ब्रराली री चाई बारीक पत्ते, खेतों में आम उगता है, बारीक दाने जो पकने पर लाल हो जाते है । फोड़े फिन्सियों की उत्तम औषधि (42) काउणी-कंगणी अन्न, लम्बा पौधा जिस के सिर पर बालियों में अन्न होता है, इस के नर्म पौधे को प्रयोग में लाया जाता है; (43) डेढू घाह–खेतों में आम उगता है, पत्ते व फ़ूल गोल होते हैं, फ़ल भी गोल; (44) घरोटलू घाह–अर्थात् बनफ़शा, इस से सभी परिचित है, पत्ते गोलाकार, फूल भी गोलाकार रंग गुलाबी। खांसी, जुकाम, कफ़, क्षय, ज्वर, गुर्दे के दर्द में अत्यन्त लाभदायक, (45) चूतड़ तौड़ी–एक सीधा पौधा या डाली जो ऊपर और नीचे से बारीक और बीच से मोटी होती है । अर्थात् नीचे से एक जड़ उस पर डण्ठल, ऊपर डण्ठल में तीन तहें, सिर पर फ़िर एक तह । हर प्रकार की तेज़ दर्द को हटा कर आराम देती है; (46) लौढ़-घुरशू-पौधा बारीक, पत्ते छोटे फ़ली की तरह मरोड़दार, गूढा-गुलाबी फ़ूल; (47) गौठू घाह फ़ूल और पत्ते गोल, पौधा छोटा, पेट दर्द की दवा ; (48) ठाण्डी–बारीक डली, (चाभ) तालाबों के खड़े पानी में उगता है, बारीक लम्बे पत्ते, सर्दी, ज़ुकाम आदि में   के रूप में बड़ा लाभदायक; (49) टेंडा शेक-बहुत ऊंची शिखरों पर उगता है, छोटा पौधा । इस के पत्ते चबाने से नशा-सा आ जाता है ; (50) शौठ-लौंगरिया-सीधी एक जड़ परन्तु ऊपर पौधा घना तथा फैला हुआ अर्थात् साठ शाखाओं वाला । बलबर्षक औषधि है; (51) टूट गोंठा या सोम लता-बहुत ऊंचाई पर पैदा होता है । टहनियां धारीदार, पत्ते छोटे और -पतले, फूल बारीक और छोटा, फल गोलाकार गुलाबी या लाल रंग का ; शरीर में उत्तेजना लाता है। (52) रिंगलू घाह-बारीक, छोटे पत्ते वाला घास, पत्ते तत्तैया की शक्ल के होते हैं, (53) छिकछिकी-छोटा तथा घना पौधा, बारीक पत्ते, फोड़े-फिन्सियों की दवाई है; (54) भोंग (भंग) राहुल सांकृत्यायन ने तो भंग को ही सोम कहा है। परन्तु स्थानीय लोग भाग के नशे को नीच स्थान देते हैं। उनके अनुसार भांग का नशा डरपोक होता है, ‘साहस और हिम्मत का अभाव रहता है । परन्त भांग भूख खूब बढ़ाता है, हाज़मा तेज करता है; (55) गनकौकड़ एक लता होती है जो बहुत दूर तक फैलती है, पत्ते लम्बूतरे, फल बेर की तरह होते हैं जो पकने पर लाल हो जाते है, स्वाद मीठा होता है। इस की जड़ें कई दवाइयों में डाली जाती हैं (56) कुंग कैसर, (57) निहाणी-सीधा पाधा, छोटे छोटे पत्ते सफैद फूल, बुखार, ज़ुकाम में काढ़ा बना कर दिया जाता है; (58) चोरा-बहुत उंचाई र होता है, इस की जड़ें कई दवाइयों में डाली जाती हैं; (59) दुधलू माहुरा-काला माहुरा या संखिया नहीं, बाल्क उसी की जाति का, माहुरे के बाहर दूसरा माहुरा होता है। इस के पत्तों, जड़ों में दुधिया रस निकलता है। गठिया आदि बीमारियों के इलाज में लाभदायक (60) नर विषि- काला माहुरा अपने चारों ओर तक कोई फल पौधा उगने नहीं देता, इर्द गिर्द सब कुछ जला देता है । यही इस की सब से बड़ी पहचान है। यह सीधा पौधा होता है। इस के चारों ओर इसी प्रकार का दूसरा पौधा होता है जो इस की रक्षा करता है या जिस से बाहर के पौधे, झाड़ियां रक्षा पाती है। इन दोनों के बीच ही नरविषि होती है। प्राय यह मिलती नहीं है। यदि दुधलु माहुरा और नरविषि मिल जाए तो औषधि उत्तम बनती है।

ढेली औषधि का निर्माण

    ऊपर कषित सभी जड़ी-बूटियों को, मटोशल को छोड़, शेष सब को पहले बारीक काटा जाता है फिर सब को ओखली में डाल कर मूसल से खूब बारीक कूटा जाता है। मटोशल शेष जड़ी बूटियों से नहीं मिलती। इसे अलग से काटा और कूटा जाता है। बारीक कूटने के बाद दवाई प्रयोग के लिए तैयार हो जाती है।

    ढेली कई मन जौ के आटे की एक साथ बनती है। इतनी हेली इकठ्ठा बनाने का मुख्य कारण यह है कि ढेली वर्ष में केवल एक बार बीस भादों के एक दो दिन के अन्दर बनती है, और गांव में केवल एक दो घरों में तैयार होती है, जिन के मालिकों को उपर्युक्त सभी जड़ी बूटियों का ज्ञान होता है। ढेली की सभी गांव वालों को आवश्यकता होती है, परन्तु जड़ी बूटियों की जानकारी सब को नहीं होती। अतः हर परिवार अपनी साल भर की जरूरत के अनुसार अपने घर से मन आध-मन जौ का आटा उस पर विशेष में पहंचा देता हैं। इस तरह उस घर में कई मन प्राटा इकट्ठा होता है। उस पाटे का अंदाज़ा ले कर जड़ी बूटियों को अपेक्षित मात्रा में इकट्ठा करके पूर्व कथिक रूप से कूटा जाता है। तब इकट्ठे हुए आटे को फ़र्श पर उंडेल दिया जाता है। आटे के ढेर को इस तरह सजाया जाता है कि एक कटोरे का रूप धारण करे। बीचों बीच बने कूपक में कूटी हुई जड़ी बूटियों को एक बड़ी लोहे की छाननी में पानी के साथ छाना जाता है । जब सारी जड़ी बूटियां छान ली जाती है तब पाटे को गूंधना प्रारम्भ करते हैं। एकत्रित हुए सभी लोग पहली बार हाथ डालते ही ‘पोली पोली’ शब्द का उच्चारण करते हैं, और आटे को मुट्ठी में लेकर एक दूसरे पर फैंकते हैं। घड़ी भर के लिए एक तमाशा लग जाता है, जब आटे की मुट्ठियां एक दूसरे पर बरसती है। चूंकि आटा बहुत अधिक होता है, इसलिए उसे हाथ से गूंधने का प्रश्न नहीं उठता। उसे पैरों से गूंधा जाता है। अच्छी तरह मलने के लिए सभी सभी के ढेर के चारों तरफ गोलदायरे में बैठ जाते हैं, एक रस्सी ले कर उसे सभी पकड़ कर टांगों में आटे को खूब मलते हैं।

    इस प्रकार परों से गूंध कर आटा कुछ सख्त रखा जाता है। इसी प्रयोजन के लिए लकड़ी के चौखट बने होते हैं। हर एक आदमी एक-एक चौखट लेकर उस में आटा डालता है और फिर उसे पैर से खूब दबाया जाता है। जब यह निश्चय हो जाए कि आटा मज़बूती से दब गया है तो चौखट को एक किनारे से खोल देते हैं और आटे की एक चौरस सी मोटी रोटी बन जाती है जिसे ‘बीमा’ कहते हैं। इस प्रकार सारे आटे के दो चार सौ बीमे बनते हैं। उन्हें एक कमरे में संवार कर रख देते हैं। दो-अढ़ाई महीने के बाद बीमें सूख जाते हैं। किसी एक बीमा को बीच से तोड़ कर देखा जाता है। बीचों बीच ‘डोरी’ जड़ी-बूटी के कारण लाल लकीर सी लगी होती है। तब सारे बीमों को आटे के हिसाब से सभी लोगों में बांट दिया जाता है। इस प्रकार औषधि-निर्माण की क्रिया समाप्त हो जाती है। यह उल्लेखनीय है कि पूर्व कथित जड़ी-बूटियों के अतिरिक्त आटे के ढेर में चार बलियां भी डाली जाती है। ये बलियां शहद की मक्खी, मकड़ी, घरेलू मक्खी और तिलचटा की होती है। इन में मधु मक्खी तलाश करना कठिन होता है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने छत्ते से मधु मक्खी लेने नहीं देते क्योंकि यह विश्वास है कि वह छत्ता नष्ट हो जाता है। यह पौषधि अर्थात् ढेली’ सूर के लिए मुख्य साधन है। इसके बिना सूर जम नहीं सकती अर्थात् बनती नहीं है। परन्तु इस का प्रयोग जौ या चावल की चाकटी में नहीं हो सकता। वहां ‘फाफ’ का प्रयोग होता है जिस के निर्माण में काला माहुरा और नरविषि का प्रयोग अनिवार्य बताया जाता है।

    सोम मलरूप में अनुप्राणित पेय था जिस से स्वास्थ्य, सद्विचारों और अध्यात्मिक प्रकाश की वृद्धि होती थी। वैदिक साहित्य के अध्ययन से यह भी स्पष्ट है कि सोम में मादकता भी थी, लेकिन बहुत कम मात्रा में। इस मद में लोग अपनी दरिद्रता को भूल जाते थे और अपने को धनी समझते थे, परन्तु सोम का मद व्यक्ति को कर्तव्यपथ से च्युत नहीं करता था। (ऋग्वेद 8.48) ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि वैदिक काल में सोम का प्रभाव सा हो गया था और तब सोम के स्थान पर कुछ अन्य लताएं चुनी गई थीं, पर उन में सोम की सी उत्करष्टता नहीं थी (ऋग्वेद 1-5.7) । ढेली में पड़ने वाली पूर्वोक्त जड़ी-बूटियों में सोम ढूंढना कठिन हो सकता है परन्तु बाद की लताएं अवश्य ही इन में से कुछ हो सकती है। इन में से अनेक में जीवन शक्ति का संवर्धन करने के गुण हैं। वे केवल अनुसन्धान की अपेक्षा रखते हैं।

सूर निर्माण-क्रिया

    वैदिक काल की सुरा सम्भवतः अन्न को आसवन करने से तैयार होती थी, क्योंकि इस के निर्माण में अनेक प्रकार के फल, फूल, पत्ते, रसायन, छाल, गुड़ के अतिरिक्त बीजों और अन्न का उल्लेख आता है। इस द्रष्टि से सुरा का पर्यायवाची कुलुई में ‘सौरा’ है जिस में सुरा की तरह आसवन की प्रक्रिया समाविष्ट है और यह अन्न और सेवादि फलों से आसुत होता है। परन्तु इस के विपरीत ‘सूर’ में आसवन का कदापि स्थान नहीं है। यह केवल ऊपर कथित जड़ी-बूटियों के प्रभाव से तैयार होती हैं, और इस में मादकता भी बहुत कम होती है। इस क्षेत्र में ‘सौरा’ का पान आम घरों में नहीं है। यह केवल भ्रष्टसंगत का पेय पदार्थ है। हेव्नत्सांग ने अपने यात्रा संस्मरण में उस समय की तीन तरह की मदिराओं का उल्लेख किया है। वह लिखता है कि क्षत्रिय लोग अंगूर और ईख की मदिरा पीते थे। चुआई हुई सुरा वैश्य पीते थे तथा बौद्ध भिक्षु और ब्राह्मण गिने और अंगूर का रस पीते थे। ‘सूर’ इन मदिराओं की भी किसी श्रेणी में नहीं आती। यह पूर्णतः कोदा अन्न में साठ से ऊपर जड़ी-बूटियों का मिश्रण है।

    वैदिक काल के परवर्ती साहित्य में कई स्थानों पर सोम को एक बूटी का रस न हो कर अनेक बूटियों का रस कहा गया है। अनेक स्थानों पर सोम को निकालने का तरीका दिया गया है और यह स्पष्ट होता है कि जड़ी-बूटियों को पाषाण पर रख कर कूटा जाता था। सिल बट्टे में पीस कर उन का रस निकाला जाता था और फिर छान कर काष्ठ या धातु के पात्र में रखा जाता था। यह प्रक्रिया ऊपर कथित ढेली की जड़ी-बूटियों के रस से मेल खाती है। सूर बनाने के लिए कोदा अन्न को पीस कर आटा तैयार किया जाता है। आटे को गूंध कर बिना रोटी पकाए धातु के बड़े बर्तन में रखा जाता है। इसे चेहुर कहते हैं। जब चेहुर आठ-दस दिन का हो जाए तो उस की बड़ी-बड़ी रोटियां बनाई जाती है। रोटियों को छोटे टुकड़ों में तोड़ कर मिट्टी के घड़ों में डाला जाता है, साथ में पर्याप्त मात्रा में पानी डाला जाता है। दो दिन के बाद इन घड़ों में रोटी की मात्रा के अनुसार ढेली कूट कर तथा छान कर डाल दी जाती है। सोलह-बीस किलो आटे के लिए लगभग एक किलो ढेली पर्याप्त होती है। घड़े को मिट्रो आदि से मजबूती से बन्द कर दिया जाता है। बारह-पन्द्रह दिन के बाद सूर तैयार हो जाती है। जड़ी-बूटियों के प्रभाव से आटा घने पानी में बदल जाता है। यही सूर है। परन्तु इस में सुरा या सौरा जैसी मादकता नहीं होती।

    यद्यपि वैदिक साहित्य में सोम और सुरा का बहुत उल्लेख पाता है परन्तु उसी काल में ही ऋषियों ने सुरा को कभी आदर का स्थान नहीं दिया है क्योंकि इस के पीने से मानव को बुराइयों और असत्वृत्तियों को उत्तेजना मिलती थी। सुरापान से पाप की ओर प्रवृत्ति होती थी (ऋग्वेद 7.86.6) । इस के सेवन से बुद्धि, धैर्य, स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है। इसी लिए इसे मांस और जुए के समान बुरा माना गया है।

सहज निवास,

मकान सं0 26, शिमला-2

अप्रैल, 1978

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