महासू परिवार में देवता ‘बनाड़’ | सोमसी 1980

महासू परिवार में देवता बनाड़

ध्यानसिंह भागटा

    हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में शैव तथा वैष्णव प्रभाव देखने को मिलता है। शिमला के ऊपरी भाग अर्थात् महासुवी क्षेत्र में शिव तथा विष्णु दोनों से सम्बन्धित देवी-देवताओं का प्रभाव लक्षित होता है। इसी परम्परा के अन्तर्गत शिमला के जुम्बल क्षेत्र में ‘देवता बनाड़’ हजारों लोगों की आस्था तथा श्रद्धा का प्रमुख स्तम्भ के रूप में उल्लेखनीय है ।

    देवता बनाड़ की उत्पत्ति सम्बन्धी गाथा अनेकों अन्य देवी-देवताओं की उत्पत्ति विषयक गाथा की भांति ही अत्यन्त रोचक तथा विचित्र है । ‘देवता बनाड़’ का सम्बन्ध ‘महासू भाइयों से जोड़ा जाता है जिनका जन्म तथा निवास स्थान काश्मीर माना जाता है । महासू देवता पांच भाई माने जाते हैं जो बौठा महासू, चाल्दा महासू, कौलू, शेड कुलिया, बनाड़ आदि नाम से आज भी जाने जाते हैं।

    यह प्रसिद्ध है कि महेन्द्रथ (महासू देवता का वर्तमान मुख्यवास) नामक स्थान में राक्षसों ने आतंक का वातावरण उत्पन्न कर रखा था। वहां के लोग उनके अत्याचारों से तंग थे तथा इस विपत्ति से छुटकारा पाने का कोई साधन खोज रहे थे। यहां प्रमुख व्यक्ति पंडित ‘हूणा’ को किसी महात्मा ने राय दी कि यदि वह काश्मीर जाकर महासू देवताओं से प्रार्थना करे तो वे राक्षसों का संहार करके इस क्षेत्र में शांति स्थापित कर सकते हैं । हूणा पण्डित काफी कठोर तथा लम्बी यात्रा तय करके काश्मीर पहुंचा तथा महासू भाइयों के देवस्थान के बाहर खड़ा हो गया।

    इस समय पांचों भाई महासू कई प्रकार के खेल खेलने में व्यस्त थे अचानक ही उन्हें मानव गन्ध का आभास हुआ तथा उन्होंने अपने सबसे छोटे भाई कौलू’ को यह देखने के लिए बाहर भेजा कि इस पवित्र तथा वर्जित स्थान पर आने का दुस्साहस किसने किया है । ‘कौलू देवता’ के मन्दिर से बाहर आते ही हूणा पण्डित ने बड़े ही दीन-हीन भाव से प्रार्थना की कि वह राक्षसों के अत्याचारों से बहुत दुःखी है तथा उनसे छुटकारा पाने के लिए यहां आया है । पहले तो कौलू देवता ने अत्याधिक क्रोध से उसे उस स्थान से चले जाने को कहा किन्तु हूणा ने नतमस्तक प्रार्थना की कि:

देना बोलू कौलूआ ज्यादा पोओ न रौलो ।

ताऊंखे देऊ ला कौलूआ नैवा जुणा रो पौलो ॥

    इस प्रकार हूणा द्वारा कौलू को विशेष उपहार प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् कौलू मान गया तथा उसे हवन के पश्चात् फैंकी गई राख की ढेरी के नीचे छिपा लिया ताकि वह वहां सुरक्षित रह सके। कौलू ने उसे विश्वास दिलाया कि वह उसके दुःख के निवारण हेतु कुछ युक्ति अवश्य करेगा ।

    कौलु देवता ने महल में जाकर सूचना दी की बाहर कोई भी मनुष्य नहीं है । अन्य भाईयों को उस पर विश्वास नहीं आया उन्होंने इस बात की पुष्टि करने के लिए अपने दूसरे भाई शेड़कुलिया” को महल से बाहर भेजा देवता ‘शेड़कुलिया’ सीटी बजाता हुआ बाहर आया तथा चारों ओर भली भांति खोजने पर भी उसे कोई मानव नजर नहीं आया । अन्दर जाकर उसने भाइयों का कह दिया कि बाहर कोई भी मानव नहीं है।

    इसी प्रकार कुछ समय व्यतीत हुआ। प्राचीन परम्परानुसार पांचों भाई अपने-अपने रथ पर सुसज्जित होकर भाद्र मास की चौथ के पूजन के अवसर पर अपने देवालय से बाहर आया करते थे। प्रतिवर्ष की भांति चौथ का समय आ गया तथा पांचों भाई महासू अपने-अपने रथ पर आसीन होकर पूजन के लिए बाहर आने लगे । मुख्य द्वार पर आते ही फिर वही मानव गन्ध उन्हें अनुभव हई तथा उनके रथ आगे बढ़ने की अपेक्षा पीछे हटने लगे । रथों की यह दशा देखकर कौलू को सन्देह हआ कि यदि रथ बाहर न गए तो ब्राह्मण का उद्धार नहीं हो सकेगा। उसने गुस्से में आकर सभी रथों को बलपूर्वक मुख्यद्वार से बाहर धकेल दिया । रथों के मन्दिर से बाहर आते ही उसने अपने गज (लोहे की एक लम्बी तथा मजबूत छड़) द्वारा राख हटाई तथा हूणा पंडित को उसमें से बाहर निकाल लिया । ब्राह्मण रोता चिल्लाता हुआ पांचों भाइयों के चरणों पर गिर गया तथा उनसे अपनी रक्षा की याचना करने लगा । देवताओं को उस पर दया आई तथा उन्होंने उसे रक्षा का वचन दे दिया।

    महासू बन्धुओं ने हूणा पण्डित को फूलों की एक कड्डी (टोकरी) दी तथा कौलू ने अपनी दैवी शक्ति द्वारा पण्डित को क्षण भर में ही महेन्द्रथ पहुंचा दिया। जाने से पूर्व देवताओं ने पण्डित को यह निर्देश दिया कि घर पहुंचते ही तुम नवजात बन्धुओं को सोने के हल में जोतना तथा जिस खेत में तुम हल जोतोगे हम वहां स्वयंमेव ही प्रकट हो जाएंगे । पण्डित ने ऐसा ही किया तथा इस प्रकार देवताओं की उत्पति महेन्द्रश में हो गई। उत्पति के तुरन्त पश्चात उन्होंने राक्षसों का संहार किया तथा शांति स्थापित करके महेन्द्रथ ही नहीं अपितु दूरस्थ स्थानों तक अपना प्रभाव तथा अधिपत्य स्थापित कर लिया । कालान्तर में पांचों भाइयों में विभाजन हुआ तथा प्रत्येक इस प्रकार प्रत्येक देवता अपने-अपने क्षेत्र का स्वतन्त्र स्वामी बन गया ।

    ‘देवता बनाड़’ के हिस्से में ‘खूनीगाड’ क्षेत्र आया जोकि अत्यन्त उजाड़ तथा विरान था। विभाजन के समय ही देवता बनाड़ को यह कहा गया था कि ‘कोटलाह’ (जुब्बल तहसील का पूर्वीभाग) क्षेत्र पर यदि वह अपनी शक्ति से अपना अधिपत्य स्थापित कर सके तो वह क्षेत्र उसे अतिरिक्त भाग के रूप में दिया जाएगा।

    खूनीगाड़ क्षेत्र में कुछ समय तक अपना अधिपत्य स्थापित करने के पश्चात देवता बनाड़ ने ‘कोटलाह’ की ओर रूख किया तथा अपनी अभूतपूर्व शक्ति के द्वारा कुटलाह के ‘कुई’ नामक स्थान पर पुनः प्रकट हो गए। इस स्थान के विषय में यह उल्लेखनीय है कि यहां शिव रूपी ‘देवता क्यालू’ प्राचीन काल से ही विद्यमान था तथा इस क्षेत्र में इस देवता का पर्याप्त प्रभाव था। ‘देवता बनाड’ का इस स्थान पर प्रकट होना ‘शिव’ तथा ‘विष्णु’ का मिलन माना जाता है ।

    जनश्रुति है कि जिस स्थान पर इस प्रतापी देवता की उत्पत्ति हुई ‘भांखा’ नामक व्यक्ति का खेत था। भांखा प्रतिवर्ष की भांति खेत से पूर्व घास काटने के लिए खेत में पहुंचा तथा शाम तक उसने पूरे खेत की घास काट दी। दूसरे दिन प्रातः वह बैलों की जोड़ी लिए जब खेत में पहुंचा तो यह देखकर चकित रह गया कि पूरे खेत में घास ज्यों की त्यों उगी हुई है। विवश होकर आज भी उसे घास ही काटनी पड़ी। चार पांच दिनों तक यही घटना होती रही। एक दिन तंग आकर उसने बिना घास काटे ही हल चलाने का निश्चय किया । हल चलाते ही उसके हल से कोई विशेष वस्तु टकराई तक एक विचित्र सी आवाज उत्पन्न हुई। पूर्ण वातावरण क्षण भर के लिए मनमोहक तथा प्रकाशमय हो गया। भांखे ने देखा कि उसके हल के निकट ही सोने की एक सुन्दर प्रतिमा पड़ी है। वह उसी क्षण समझ गया कि यह प्रतिमा कोई साधारण प्रतिमा नहीं है, वह इस प्रतिमा को उसी क्षण घर ले आया तथा अपने मकान के तीरे (ताक) में रखकर नियमित रूप से इसकी पूजा करने लगा। भाखा लकड़ी के एक छोटे नगाड़े को बजाकर प्रतिदिन इस प्रतिमा की पूजा किया करता था। यह नगाड़ा इस स्थान पर आज भी विद्यमान है तथा लोगों की आस्था का आकर्षण बना हुआ है।

    भंखोट (भांखे का निवास स्थान तथा देवता बनाड़ का मुख्य थान) से कुछ ही दूरी पर ‘कोटी’ नामक स्थान पर एक राणा राज्य करता था जिसके यहां पीतल के वाद्य-यन्त्र थे एक दिन ‘प्रतिमा’ को पीतल के वाद्य-यन्त्रों की ध्वनि सुनाई दी तथा उसने पूछा कि यह बाजे कहां बज रहे हैं ? भांखे से उत्तर पाने के पश्चात् देवता बनाड़ ने बड़ी माता (शीतला) के प्रकोप से कोटी की ठकरैत को नष्ट कर दिया तथा वहां की समस्त सम्पत्ति तथा वाद्य-यन्त्र अपने अधिकार में ले लिए । तदोपरान्त उसी स्थान के ठीक सामने ‘घयान’ नामक स्थान पर एक अन्य ठाकुर की ठकरैत थी इस पर भी देवता बनाड़ ने अपना अधिकार कर लिया तथा धीरे-धीरे ‘रावीं’ तथा जुब्बन के पूर्ण क्षेत्र में देवता बनाड़ की पूर्ण मान्यता स्थापित हो गई। राजा जुब्बल ने भी देवता बनाड़ को अपना अराध्य मानकर उनको राज्य देवता की उपाधि प्रदान की।

    ‘देवता बनाड़’ इस क्षेत्र का प्रतिनिधि देवता है तथा इस देवता का नाम यहां के लोगों द्वारा बहुत ही आदर तथा श्रद्धा से लिया जाता है । ‘देवता बनाड़’ के मन्दिर इस क्षेत्र के प्रायः सभी स्थानों पर विद्यमान हैं तथापि ‘पुजारली’ तथा ‘भंखोट’ के मन्दिर इनके प्रसिद्ध मन्दिरों में से हैं । देवता का कोई भी शुभ कार्य तथा यज्ञ प्रायः इन्हीं मन्दिरों में सम्पन्न होता है। देवता बनाड़ के पूजन आदि का प्रबन्ध अत्यन्त लोकतांत्रिक ढंग से किया जाता है । ‘देवता बनाड़’ अपने क्षेत्र के सभी गांवों में एक-एक वर्ष के लिए जाता है तथा पूरे वर्ष के पूजन आदि का सारा व्यय उसी गांव के लोगों द्वारा किया जाता है । देवता के मन्दिर में एक पुजारी, एक ठाणी (रसोईया) तथा एक वादक सदैव अपने-अपने कार्य के लिए तैनात रहते हैं । देवता का सुबह तथा शाम दोनों समय नियमित रूप से पूजन होता है । इसके अतिरिक्त अर्द्धरात्री तथा रात खुलने से पूर्व भी नवद (इम समय केवल ढोल आदि वाद्य-यन्त्र ही बजाए जाते हैं) बजाई जाती है। सायंकाल अंधेरा होते ही मन्दिर के बाहर आग जलाई जाती है जो प्रातःकाल तक निरन्तर जलती रहती है। जिस गांव में देवता रहता है उस गांव के चार-चार व्यक्ति नियममित रूप से देवता के मन्दिर में पहरा देते रहते हैं। जो रात भर ‘खबरदार’, ‘खबरदार’ की आवाजें लगाते रहते हैं ।

    देवता का एक सुन्दर रथ है जिसके बाहर सोना मढ़ा रहता है। इसके   ऊपर सोने का एक काफी बड़ा छत्र लगा रहता है। रथ केवल उसी समय सजाया जाता है, जब देवता का मन्दिर से बाहर ले जाना हो अन्यथा पूजा ‘भरी पीढ़ी’ (इममें स्वयं देवता तथा अन्य सहयोगी देवी देवताओं की मूर्तियां पूजन के लिए सजा कर रखी जाती है) की ही की जाती है।

    देवता का हर प्रकार का प्रबन्ध लोकतान्त्रिक विधि से किया जाता है। देवता की एक साधारण सभा है जिसके सदस्य पूरे इलाके के लोग होते है । इस सभा की बैठक किसी विशेष निर्णय लिए जाने की स्थिति में ही बुलाई जाती है। यह बैठक देवता के प्रमुख ‘थान’ अथवा उस गांव में बुलाई जाती है जहां पर देवता उस समय हो । साधारण मामलों में निर्णय कारदारों द्वारा लिया जाता है जिनका चयन प्रत्येक गांव तथा प्रत्येक वर्ग में से किया जाता है । समय-समय पर पुराने कारदारों के स्थान पर नये कारदार भी चने जाते हैं। कभी-कभी देवता स्वयं भी किसी व्यक्ति को कारदार नियुक्त करता है। ‘वजीर’ तथा भण्डारी बादि कुछ ऐसे सदस्य है जि हें पैत्रिक अधिकार से कार्यकारिणी में रखा जाता है। कारदारों की बैठकें एक वर्ष में प्रायः चार-पांच बार होती है। बैठक में लिए गए प्रत्येक निर्णय की सूचना कारदार अपने-अपने गांव वालों को देते हैं ।

    ‘देवता बनाड़ का अपना एक काफी बड़ा भण्डार भी है जिसमें अन्न तथा नकदी जमा रहती है। आवश्यकता पड़ने पर इस भण्डार से जरूरतमन्द लोगों को अनाज तथा धन कम व्याज पर ऋण के रूप में दिया जाता है। जब कोई महान यञ अथवा अनुष्ठान किया जाता है तो भण्डार में जमा सामग्री को प्रयोग में लाया जाता है।

    देवता बनाई’ शांत एवं प्रतापी देवता है । देवता के किसी भी कार्य, यज्ञ तथा मेले आदि में बलि नहीं दी जाती। समय-समय पर देवता अपने सहयोगी देवताओं के साथ बद्रीनाथ, केदारनाथ तथा अन्य तीर्थ स्थानों को धार्मिक यात्रा पर भी जाता है। यात्रा से वापिस आने पर कई स्थानों पर बड़ी-बड़ी धामें दी जाती है तथा यज्ञ हवनावि किए जाते हैं।

    शांत, प्रतिष्ठा, वीशू, जातर, जागरा, वसन्त पंचमी तथा बूढ़ी दिवाली आदि मेले तथा त्यौहार देवता के नाम पर बड़ी धूम-धाम तथा क्षद्धा से मनाए जाते हैं । इन अवसरों पर लोग देवता के दर्शन करने दूर-दूर से आते हैं तथा उनसे सुख तथा समृद्धि की कामना करते हैं। देवता के प्रति लोगों की श्रद्धा विश्वास तथा आस्था आज भी वैसी ही है जैसी कि सैकड़ों वर्ष पूर्व थी।

भाषा एवं संस्कृति विभाग,

शिमला-२

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