हिमाचली धाम | गिरिराज साप्ताहिक, वर्ष 42, शिमला, 17 जून, 2020

हिमाचली धाम

प्रवीण कुमार सहगल

गिरिराज साप्ताहिक, वर्ष 42, 17 जून, 2020

   किसी क्षेत्र में साथ शादी ब्याह या अन्य मांगलिक अवसरों पर आयोजित सामूहिक भोजन को हिमाचल में धाम कहते हैं। धाम का मुख्य आकर्षण है सभी मेहमानों को समान रूप से, पंगत में बैठाकर खाना खिलाना। खाना आमतौर पर पत्तों के बनाए हुए पत्तल पर ही परोसा जाता है और किसी में दोने भी रखे जाते हैं। हिमाचली धाम का स्वाद ही कुछ अलग है। इस धाम को खाने के बाद हर कोई हिमाचल प्रदेश की सराहना करता है। हिमाचली धाम हिमाचल प्रदेश में बहुत प्रचलित है और मुख्यतः शादी और धार्मिक दिनों में काफी बनाई जाती है।

   हिमाचली धाम में अक्सर खुशबूदार चावल, कई प्रकार की दालें, मदरा, खट्टा, मीठा भात परोसा जाता है जिन्हें देखा कर मुंह में पानी आ जाता है। धाम को बनाने वाले कुछ परंपरागत लोग होते हैं, जिन्हें हिमाचल की स्थानीय भाषा में ‘बोटी’ कहा जाता है। धाम को तैयार करने के लिए तैयारी रात से ही शुरू कर दी जाती है। धाम में 500 से 1000 लोगों तक का खाना बनाया जाता है। धाम की परम्परा सदियों से चली आ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पारंपरिक ढंग से धाम पकती है। हिमाचली धाम हिमाचल प्रदेश के हर क्षेत्र में अलग-अलग तरह की होती है।

   कांगड़ा की धाम- हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले की धाम को सबसे बेहतर धाम में गिना जाता है। कांगड़ा धाम में मुख्य रूप से चने की दाल, उड़द साबुत, मदरा, दही चना, खट्टा, चने, पनीर मटर, राजमा, सब्जी में जिमीकंद, कचालू, अरबी, मीठे में ज्यादातर बेसन की रेडीमेड बूंदी, बदाणा या रंगीन चावल भी परोसे जाते हैं। कंगड़ा धाम में चावल के साथ पूरी भी परोसी जाती है।

   शिमला की धाम – प्रदेश की राजधानी शिमला के ग्रामीण अंचल से शुरू करें तो वहां माह उड़द की दाल, चने की दाल, मदरा, स्पेशल सब्जी के रूप में दही में बनाए सफेद चने, आलू, जिमीकंद, पनीर, माहनी, खट्टा में काला चना या पकौड़े, मीठे में बदाणा या छोटे गुलाब जामुन। मीठे के बाद और मिठाई भी परोसी जाती है। हालांकि परंपरा के मुताबिक सभी पकवान एक निश्चित क्रम से आने चाहिए, मगर समय के साथ थोड़ा बहुत बदलाव कई जगह आ चुका है।

   चंबा की धाम – चंबा में डोना भी पत्तल का साथ देते हैं। यहां चावल, मूंग साबुत, मदरा, माह, कढ़ी, मीठे चावल, खट्टा, मोटी सेवेइयां खाने का हिस्सा हैं। यहां मदरा हेड बोटी, खाना बनाने वाली टीम का मुखिया डालता है। किसी जमाने में बोटी पूरा अनुशासन बनाए रखाते थे और खाना-पीना बांटने का सारा काम बोटी ही करते थे। एक पंगत से उठकर दूसरी पंगत में बैठ नहीं सकते थे। खाने का सत्र पूरा होने से पहले उठ नहीं सकते थे। मगर जीवन की हड़बड़ाहट व अनुशासन की कमी ने बदलाव लाया है।

   हमीरपुर की धाम – हमीरपुर की धाम में दालें ज्यादा परोसी जाती हैं। यहां पैसे वाला मेजबान दालों की संख्या बढ़ा देता है। मीठे में यहां पेठा ज्यादा पसंद किया जाता है मगर बदाणा व कद्दू का मीठा भी बनता है। राजमा या आलू का मदरा, चने का खट्टा व कढ़ी प्रचलित है।

   ऊना की धाम – ऊना जिले के कुछ क्षेत्रों में सामूहिक भोज को धाम कहते हैं। पहले ऊना में मामा की तरफ से धाम दी जाती थी। यहां पत्तलों के साथ डोने भी दिए जाते हैं, विशेषकर शक्कर या बूरा परोसने के लिए यहां चावल, दाल चना, राजमा, दाल माश खिलाए जाते हैं। यहां सलूणा, कढ़ीनुमा खाद्य (इसे पलदा भी कहते हैं) खास लोकप्रिय है। ऊना जिला का पंजाब से हिमाचल में विलय हुआ है इसलिये यहां पंजाबी खाने-पीने का अधिक असर है।

   बिलासपुर की धाम – बिलासपुर क्षेत्र में उड़द की धुली दाल, उड़द, काले चने खट्टे, तरी वाले फ्राई आलू या पालक में बने कचालू, रौंगी, लोबिया, मीठा बदाणा या कद्ऊ या धिया के मीठे का नियमित प्रचलन है। समृद्ध परिवारों ने खाने में सादे चावल की जगह बासमती, मटर पनीर व सलाद भी खिलाना शुरू किया है।

   मंडी की धाम – छोटी काशी मंडी क्षेत्र के खाने की खासियत है सेपू बड़ी, जो बनती है बड़ी मेहनत से और खाई भी बड़े चाव से जाती है। यहां मीठा, मूंगदाल या कद्उ का छोटे गुलाब जामुन, मटर पनीर, राजमा, काले चने, खट्टी रौंगी, लोबिया व आलू का मदरा, दही लगा झोल, पकौड़े रहित पतली कढ़ी खाया व खिलाया जाता है।

   कुल्लू की धाम – कुल्लू का खाना मंडीनुमा है। यहां मीठ, बदाणा या कद्उ, आलू या कचालू खट्टे, दाल राजमा, उड़द या उड़द की धुली दाल, लोबिया, सेपू बड़ी, लंबे पकौड़ों वाली कढ़ी व आखिर में मीठे चावल खिलाए जाते हैं।

   सोलन की धाम- सोलन के बाघल, अर्की तक बिलासपुरी धाम का रिवाज है। उस क्षेत्र से इधर एकदम बदलाव दिखाता है। हलवा-पूरी, पटांडे खूब खाए खिलाए जाते हैं। सब्जियों में आलू-गोभी या मौसमी सब्जी होती है। मिक्स दाल और चावल आदि भी परोसे जाते हैं। यहां खाना धोती पहन कर भी नहीं परोसा जाता है।

   किन्नौर की धाम – हिमाचल में सबसे अलग धाम किन्नौर की मानी जाती है क्योंकि, यहां पर कई सालों से मांसाहारी भोजन ही धाम में परोसा जाता है। किन्नौर की दावत में शराब व मांस का होना हर उत्सव में लाजिमी है। हालांकि शाकाहारी बढ़ रहे हैं। इसलिए यहां बकरा कटता ही है। खाने में चावल, पूरी, हलवा, सब्जी जो उपलढा हो बनाई जाती है।

   लाहौल-स्पीति की धाम – लाहौल-स्पीति का माहौल ज्यादा नहीं बदला। वहां तीन बार मुख्य खाना दिया जाता है। चावल, दाल चना, राजमा, सफेद चना, गोभी आलू मटर की सब्जी और एक समय भेडू का मीट, कभी फ्रायड मीट और सादा रोटी या पूरी भटूरे भी परोसे जाते हैं। परोसने के लिए कांसे की थाली, शीशे या स्टील का गिलास व तरल खाद्य के लिए तीन तरह के प्याले इस्तेमाल होते हैं। नमकीन चाय, सादी चाय व सूप तीनों के लिए अलग से।

   सिरमौर की धाम – सिरमौर के साथ एक तरफ हरियाणा व दूसरी तरफ उत्तराखंड की सीमा लगती है। इसलिए यहां के मुख्य शहरी क्षेत्रों में सिरमौर का पारंपरिक खाना सार्वजनिक उत्सवों व विवाहों में तो गायब ही रहता है। ग्रामीण इलाकों में चावल, माह की दाल, पूड़े, जलेबी, हलवा या फिर शक्कर दी जाती है।

   इस बदलाव के जमाने में जहां हमने अपनी कितनी ही सांस्कृतिक परंपराओं को भुला दिया है, वहीं हिमाचली खानपान की समृद्ध परंपरा बिगड़ते छूटते भी काफी हद तक बरकरार है।

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