फागली | सोमसी जुलाई, 1977

फागली

-नरेन्द्र शर्मा

सोमसी जुलाई, 1977

    फागली नामक मेला हिमाचल के ही नहीं, वरन सभी पहाड़ी प्रदेशों गढ़वाल और नेपाल में भी यह मेला मनाया जाता है। यहां मैं आपको कुल्लु जिला जो कि देव भूमि कह कर पुकारा जाता है (Valley of Gods) के फागली नामक मेले के बारे में बताने जा रहा हूँ। यह मेला कुल्लू से लगने वाले क्षेत्र में आज से कई सौ वर्ष रहने वाले लोगों या जाति की याद  ताज़ा कराता है, और उस समय की (राक्षस जाति) या लोगों के रहन-सहन और संस्कृति पर प्रकाश डालता है। कुल्लु में जहां जहां यह मेला मनाया जाता है तकरीवन एक ही तरह से मनाया जाता है। इस मेले मे जहां कुल्लु के हर मेले में लोक नृत्य मनोरंजन का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण होता है, वेसे ही इसमे भी होता है परन्तु इसी लोक-नाच को उल्टे सीधे इस मेले में नाचा जाता है। यह मेला राक्षसों की याद ताज़ा कराने के लिये मनाया जाता है । ताकि इन्सान को यह ख्याल रहे कि “देवता से बड़े दानु” लोक भाषा में कहावत है, कि देवता से बड़े दानव हए हैं।

    मेले में नृत्य करने वाले खास किस्म की घास जिसे “रावल” कहते हैं, के वस्त्र बना कर पहनते हैं और सैंकड़ो वर्ष पुराने लकड़ी के वने मुखौटों जो कि उस समय की कारीगरी की पहचान है को मुंह पर लगाते हैं । इसके पहरावे और मुंह पर लगे मुखौटों से सभी नर्तक-मण्डली के सदस्य डरावने और उन द्वारा बनए जाने वाले हाव-भाव से यह नर्तक और भी डरावने लगते है। दूसरा, उनका काम यह रहता है कि नाचते समय वे दर्शकों की तरफ ही देखते रहते हैं । कुछ देर बाद नृत्य करके सभी बैठ जाते हैं फिर और बारी बारी से एक एक करके दर्शकों के बीच घुसते हैं। दर्शकों में सुन्दर स्त्री, लड़की या किसी लड़के की ही तलाश करके अपने साथ लाते हैं  । लाकर अपनी मण्डली में खड़ा करके अपने साथ स्त्री के  लिए, कानों में नाक में और गले में लगाने के गहने जो साथ लाए होते हैं, सबको दिखाते हैं और जिसे वो अपने साथ लाते हैं, उसे दिखाते हैं। यह सब कुछ देखने से ऐसा महसूस होता है कि उस समय जब ये जाते थे वयों या लड़कियों का उठाना मामूली बात समझते थे । इसके बाद उसी समय के दौरान कुछ अश्लीलता का भी ये लोग कुछ प्रदर्शन करते थे। आज कल तो काफी कम है पर ऐसा लगता है कि आज से कई वर्ष पूर्व इसका भी अच्छा खासा प्रदर्शन होता होगा। इसको देखने से आज का मानव यही सोचता है कि उस समय के लोग या जाति चरित्रहीन होते थे या श्लीलता से अनभिज्ञ होते थे। यह तो कुछ इस मेले में लोक-नाच की झांकियों की बात हुई।

    विशेश रूप से यह मेला सभी बुजर्ग आदमी कहते हैं कि, राक्षसों पर देवताओं अर्थात् राक्षस जाति पर अच्छे लोगो की विजय की खुशी में मनाया जाता है, जैसे लंका को राम द्वारा विजय करने के बाद दुशहरा मनाया जाता है । इसके बावजूद यह तो सभी जानते हैं कि कुल्ल व शिमलाके हर गांव, कस्बे में अपने अपने देवता होते हैं जहां वर्ष में कम से कम एक बार एक उत्सव या छोटा मोटा मेला होता है। उसमें भी कुछ भाग इस मेले की कुछ लड़ी होती है। इस में देवता की पालकी के सामने देवता का चेला बैठता है और उसके सामन पुरान समय के कुछ औजार (शस्त्र) ज़मीन में गाड़ दिए जाते हैं । फिर चेला जिसे स्थानीय भाषा में गुर कहते है, बारी बारी से एक एक शस्त्र को लेकर बाजे ताल पर नाचता है, इन शस्त्रों में बहुधा खण्डा अर्थात् प्राचीन समय की तलवार, बहुत सी इकट्ठी लोहे की जंजीर, भाला और तीन चार कटारें होती हैं । यह सब कुछ करने का, सबसे बड़ा महत्व या समझा जाता है कि इन शस्त्रो से देवताओं ने राक्षसों पर विजय प्राप्त की थी और लोगों को अभी भी यह विश्वास बना रहे कि देवा अब भी हमारी सुरक्षा के लिए तत्पर है । यही रस्म इस मेले में बल कर और पूर्ण रूप से की जाती है ।

    ऊपर लिखित कुछ ही बातों से पाठक समझ गए होगे कि यह मेला क्यों और कैसे मनाया, जाता है । यह मेला देवताओं की राक्षसों पर विजय की खुणी और साथ में राक्षसों को दिए गए वचनों को पूरा करने की परम्परा में होता है । मैं यहां यह बात बताना चाहूंगा कि जिन्हें मैं राक्षस कह कर लिख कर अवगत करवा रहा हुं, वे राक्षस नाम के लोग या जाति जो भी थी, दुर्जन लोग थे और देवता स्वरूप थे, जो देवतायों में विशवासी साधू स्वभाव या सज्जन लोग थे। जैसे कि हमारे हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रन्थ रामायण में उस युग के सब से बुद्धिमान किन्तु दुराचारी रावण को भी राक्षस कहा गया है। अब मैं आपको इन्हीं राक्षसों और देवतायों के सम्बधों की लड़ी छोटी सी पूर्व कथा की ओर ले चलता हूँ।

    सैंकडों वर्ष पूर्व की घटना है। कुल्लू की अनुश्रुतियों में सागू नामक राक्षस का वर्णन आता है । इस  राक्षस के बारे में यह प्रसिद्ध था कि इसका पेट कभी नहीं भरता था। यह राक्षस भृगु तुंग रोहतांग दर्रे पर जहां एक छोटा सा परन्तु बहुत ही भयंकर नाला है, जो जल गिरने वाला प्रपात बन कर व्यास नदि में गिरता है, इसी नाले में रहता था।

    उसके आस पास ही नहीं, अपितु कुल्लू में अभी भी जो ज्याद खाता हे उसे “सागू खोल” कह कर पुकारा जाता है। कहा जाता है जब महान-ऋषि जमदगन स्पिति की ओर से कुल्लु की ओर जा रहे थे तो रोहतांग दर्रे में उनका सागू नामक इस राक्षस से सामना हुआ । जब सागू को यह पता चला कि महर्षि जी अकेले ही स्पिति से कुल्लू की ओर आ रहे हैं तो भृगु तंग पर पा कर इकट्ठा हो गये । जब सागू राक्षस ने देखा कि सभी देवता पृथ्वी पर उतर आये हैं तो सागु महर्षि को खाने की चेष्टा करने लगा, परन्तु वह जब भी ऋषि को हाथ मारता तो उसका हाथ शरीर के बजाए हवा में ही आर-पार हो जाता और हाथ मे कुछ न आता। सागू (राक्षस) हैरान हुआ कि यह चंगा भला आदमी मरे सामने आंखें मूंदे बैठा है परन्तु हाथ शरीर से स्पर्श भी नहीं होता । सागू प्रयास करता रहा और समय बीतता गया और देवताओं ने सागू को युद्ध के लिये ललकारा। देवताओं के उतरने पर सागू देवाताओं से भिड़ गया । सागू (राक्षस) बहुत बड़ा बलवान योद्धा था । परन्तु देवता भी किसी उद्देश्य से पृथ्वी पर साकार हुए थे, युद्ध शुरु हुआ, कई दिन युद्ध चलता रहा। इसी युद्ध के दौरान सागू मारा गया परन्तु श्रुतियों के अनुसार कहते हैं कि, उसकी आत्मा अभी भी उसी नाले में है। अभी भी उस स्थान से डरावनी और भयानक आवाजें आती हैं। उसी को सागू की आत्मा कहते हैं । यह आत्मा हर वर्ष किसी न किसी तरह मानव बलि लती है, यह सब ठीक ही पाया गया है । इस राह में, गलेशियर गिरने, फिसलने, हवा चलने या किसी और बहाने कई मौतें हर वर्ष मनुष्यों की होती है, भेड़ बकरियों की गिनती ही नहीं है ।

    इसी प्रकार कुल्ल की लोक-कथाओं और अनुश्रतियों में बड़े-राक्षसों का वर्णन आता है, जो कई वर्षों तक देवताओं के लिए सिर दर्दी बन रहे । यह मेला जिसका मैंने वर्णन किया “टूण्डी” नामक राक्षस से भी सम्बन्धित बताया जाता है जिसका राज्य इलाका लाहुल से लेकर नेपाल तक के सभी पहाड़ी इलाकों पर रहा होगा। फिर भी इस विषय में ठीक से कुछ नहीं कहा जा सकता । कुछ भी हो, कुल्लू में इसका बहुत प्रभुत्व रहा, लाहौल स्पिति से ले कर गढ़वाल, नेपाल तक की सभी लोक कथानों में ‘टूण्डी” नामक राक्षस का नाम सभी जानते है। इस मेले का सीधा सम्बन्ध इसी से बताया गया है ।

    इसमें सभी रस्में देऊखेल की तरह की जाती है। बाकी पहरावा वही होता है जो पीछे बताया गया है । मेले के दौरान कुछ बोलियों बोली जाती है। उसके दौरान किसी यादमी में इस ‘टूण्डी” राक्षस की आत्मा आती है और तब वह डरावने डरावने कार्य करता है । मैंने यह स्वयं भी देखा है कि जब किसी में राक्षस की आत्मा प्रवेश करती है, तो सबसे पहले वह जो मशाल जलाए होते हैं उनको खाने के लिए झपटता है, क्योंकि आग से राक्षक काफी डरते हैं । वह व्यक्ति ऊंची ऊंची छलांगें लगाता है । सिर्फ एक ही चीज से वह डरता है वह है शंख का पानी,जिसको छिड़कने से आत्मा दूर चली जाती है।

    इस मेले का एक महत्वपूर्ण अंग है कि इस मेले में “भारता” (भविष्यवाणी) जिसमें आने वाले साल में क्या कुछ और कैसा होगा ? बारिश, फसल, नुकसान, बीमारी आदि की भविष्यवाणी की जाती है । देवता का चेला जब उस में देवता की प्रात्मा प्रवेश करती है, बताता है, जिसको सुनने के लिये दूर दूर से लोग  आते हैं । कहते हैं कि जब यह भविष्यवाणी (भारता) बोली जा रही होती है तो राक्षस भी इनको सुनने के लिये वहां आते है । कई बार उनकी आत्मा किसी आदमी में प्रवेश करती है। परन्तु वह ज्यादा हरकतें नहीं कर सकता क्यों कि सामने ही शंख में पानी पड़ा रहता है।

    कुल्लु के औटर सिराज में और भीतरी सिराज में यह भी कहावत है कि कोई समय था जब इन पहाड़ी प्रदेशों पर स्त्रियों बों का ही बोल-बाला था । लगभग वही राज चलाती थीं। उस समय कुछ लोगों ने ऐसे एक मेले की नीव रखी जिसमें सभी बेशर्मी और निर्लज्जता का दिल खोल कर प्रदर्शन करते थे। ऐसा सब देखकर स्त्रियों ने फिर पुरुषों के अधीन रहना स्वीकार किया । आज कल भी इसी सिराज में दीपावली-सहियाले मनाये जाते है, जिनमें लोग निर्लज्जता का प्रदर्शन करते हैं जिसे देखकर उस समय की राक्षस-सभ्यता की याद ताज़ा होती है ।

    इल मेले मनाने के और भी कई कारण है । सबसे बड़ा कारण इस मेले को मनाने का यह है कि जब देवताओं ने राक्षक  कम जाति का और उनके दमनकारी साथियों का संहार किया तो राक्षसों ने हार स्वीकार करके उन से वचन लिया कि हमारे नाम से कुछ मेले मनाये जाएं, जो देवताओं ने स्वीकार किये । वे चाहते थे कि इससे उनके नाम और जाति को लोग अंतिम समय तक नहीं भूलेंगे। क्योंकि सब से ज्यादा प्रभुत्व इन लोगों का पहाड़ी इलाकों में ही रहा है और इसी लिए इनके मेले-उत्सव भी ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में ही प्रचलित है।

गांव व डाकघर नगर,

जिला कुल्लू (हि0प्र0) ।

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