हिमाचली में चीश-पाणी | सोमसी 1976

हिमाचली में चीश-पाणी

—श्याम कुमारी

सोमसी, 1976

पूर्वजों का कथन है–कि सृष्टि के प्रारम्भ में पानी था । सारी जगती जलमयी थी । सृष्टि के अन्त में भी पानी होगा । सर्वत्र जलमयी होगी । समस्त संसार पानी में डूब जाएगा । प्रायः लोग कहा करते है–कि पानी से भय सर्वत्र सर्वदा है परन्तु पानी के बिना जीवन सूना है । पानी का पर्याय जीवन है जैसा कि अमर कोश के प्रथम काण्ड के वारिवर्ग से उद्धरण प्रस्तुत है:–

पयः कोलालम् अमृतं जीवनं भुयनं वनम् ।

प्रातः उठते ही वरुण देव का आह्वान किया जाता है । सब क्रिया-कलाप पानी से प्रारम्भ होता है । स्नान करते समय भारत की पुण्य सलिला नदियों का स्मरण इस प्रकार किया जाता है:—

गंङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ।।

हिमाचल की सब बोलियों में पाणी शब्द का व्यवहार है । महासू और सिरमौर में ‘चीश’ शब्द पर्याय मिलता है ।

 

1.पानी के अर्थ

व्यवहार में प्रसंगवश अर्थ ज्ञान इस प्रकार है:–

(क) पूजा के निमित्त पानी को जल कहा जाता है, यथा–ठाकरां दा जल, गंगाजल, आदि । जिस पात्र में गंगाजल रखा जाता है उसे गंगाजली कहते हैं। वाद-विवाद में यहां तक समस्या खड़ी हो जाती है–कि सत्यापन के लिये एक दूसरे को गंगाजली सिर पर धारण करने के लिये कहा जाता है जिसका अभिप्राय यह

है–कि गंगाजली उठाने वाला यदि झूठ बोलेगा तो नरक का भागी बनेगा।

(ख) मन्दिर में देवपूजा का जल आचमन के लिये चांदी या ताम्बे के पात्र ‘कूण्डू’ में रखा हुआ चरणामत (चरणामृत) पुकारा जाता है जिसे तीन बार आचमनी से मन्त्रोच्चारण सहित पान कराया जाता है ।

अकालमृत्युहरणं भवव्याधि विनाशनम् ।

विष्णुचरणोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।

(ग) भोजन में व्यञ्जन के रस या तरी को पानी कहा जाता है । हरी और

सरस वस्तु तरबूज, खट्टे, मीठे आदि के तरल पदार्थ को भी पानी कहा

जाता है।

(घ) रसायन में भभके से खींचा हुआ रस अर्क या पानी कहा जाता है। जैसे

लाइचीआं दा पाणी, ‘इलायची का पानी’ सफाणी–सौंफा दा पाणी ‘सोए सौंफ का पानी’ आदि का व्यवहार है।

(च) बोटी ‘पाचक’ के पास लुगड़ी को चौलां दा पाणी कहा जाता है ।

(छ) भोजन के उपरान्त पात्र में लगे शेष अन्न को पानी से धोकर पशुओं के निमित्त रखा जाता है। इसे धो-धुआणी कहते हैं।

(ज) पाणी पाणी होने का अर्थ डर के मारे या गर्मी में पसीना छूटना है ।

(झ) पानी का व्यवहार मान प्रतिष्ठा आदि के मापदण्ड के लिये भी होता है

यथा:–

सांजो दुस्सादा मियां कितणे पाणीए च है।

‘हमें दिखाई दे रहा है । (कि) मियां कितने पानी में है’ ।

(ट) सुनार के पास पीतल पर चांदी का पुट और पीतल या चांदी पर सोने का पुट ‘सुन्ने दा पाणी’ कहा जाता है ।

इस भांति अभिधा तथा लक्षणा द्वारा पानी के विविध अर्थ है प्रसंग वश जिनका व्यवहार हिमाचली में व्यापक रूप में किया जाता है।

  1. पानी के स्रोत

चल और अचल स्थिति में पानी के विविध स्त्रोत हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है:–

  1. (1) प्रवाह-शील

निरन्तर प्रवाहशील स्त्रोतों की गणना इस प्रकार की जाती है –

(क) समुन्दर – समुद्र तो हिमाचल प्रदेश से बहुत दूर है परन्तु बरसात में जहां भी अथाह पानी दिखाई देता है, उपमा में उसे समुन्दर कहा जाता है।

(ख) दरया – बड़ी नदी को कहा जाता है जिसे अवगाहन या तैरने से भी पार करने में कठिनता होती है जैसे–व्यास, सतलुज आदि ।

(ग) नदी – दरया में मिलने वाले सहायक नदी नद जैसे-बिनुआ, न्यूगल आदि कांगड़ा में।

(घ) खड्ड – बरसाती नदी जिसमें बरसात में पानी अधिक वेगशील और अन्य ऋतुओं से बहुत कम जैसे–कुणाह, मान,

पुंग आदि हमीरपुर में ।

(च) नाल़ – बहुत कम पानी वाला परन्तु वर्षा में एक दम प्रवाहशील ।

(ज) कहल – ‘कूल्या’ जो खेतों की सिंचाई के लिये अथवा घराट ‘पनचक्की’ चलाने के लिये नदी या खडु से निकाली गयी हो।

(झ) छहरूडू -प्रपात जिसे बम्बा भी कहते हैं जो ऊँचाई से गिरता है अथवा बांस की नाली लगाकर जिसकी धारा नियमित की जाती है । इस धारा में प्राय: लोग स्नान करते हैं । इसका पानी ग्रमियों में शीतल और शीतकाल में गर्म होता है ।

(ट) छरांह – पूण्य सलिल वाला प्रपात जिसमें स्त्रियां सन्तान की कामना के लिये

स्नान करती है।

2(2) सीमित स्त्रोत

पेय अथवा दैनिक व्यवहार के लिये घर के आस पास मिलने वाले स्त्रोत ये हैं।

(क) नौण जहां पानी भरा जाता है और स्नान करने की भी सुविधा होती है।

(ख) बौड़ी–बां–वापी जिसका पानी पीने के लिये होता है ।

(ग) बौडू–वापी का छोटा प्रकार होता है ।

(घ) खूह–कुआं–दो प्रकार का होता है एक गहरा जिसमें से रस्सी द्वारा पानी

खींचा जाता है और दूसरा पौड़ियों वाला-जहां नीचे उतर कर पानी भरा जाता है ।

(च) तल़ा-ताल-तालाब वर्षा का रूका हुआ पानी या नदी नाल का पानी जहां रोका जाता है । यह गहरा होता है । इसमें से थोड़ा, थोड़ा पानी झरता रहता है।

जहां वर्षा का पानी रोका जाता है-और जिसका प्रयोग सारा साल किया जाता

है ऐसे जलाशय के प्रकार ये हैं—

(छ) कुड्ड ‘कुडया’, यह पहाड़ के अन्दर खोद कर बनायी जाती है । छप्पर से वर्षा का पानी इसमें गिराया जाता है जिसे छीनीआ दा पाणी कहते हैं । इसके अन्य नाम खात्ती और खाई हैं।

(ज) पुक्खर-निम्न धरातल पर वर्षा का संचित पानी इसमें कई दिनों तक रहता है।

(झ) डक्क-बान्ध, इसमें नदी नाल का पानी बांधा जाता है ।

पानी के निकास के लिये नकाल़ कहते हैं। किसी जलाशय या घर के व्यवहार के पानी को निकालने के लिये जो नाली बनायी जाती है उसे चल़ा कहते हैं । गहरे कुएं या कुड्ड के पास छोटा सा गत्त बनाया जाता है जिसमें वर्षों से धुली पौड़िया का पानी रोका जाता है जिसमें पीने का पानी स्वच्छ रहे इस गर्त को चभच्चा कहते हैं। जब यह गन्दे पानी से भर जाता है तो इसकी सफाई की जाती है । इस क्रिया का चुटणा कहते हैं।

 3.पानी के प्रकार

भौतिक गुणों के प्राधार पर पानी के अनेक प्रकार हैं जिनमें प्रमुख ये है :-

(क) खारा – क्षार, जिसमें स्वाद न आये ।

(ख) लूणका – नमकीन, गन्धक वाले स्त्रोत से निकलने वाला पानी जिसे पीकर त्वचा के रोग और उदर विकार ठीक हो जाता है।

(ग) मिट्ठा – मीठा पानी जो स्वास्थ्य वर्धक और स्वादु हो। इसे स्वादला पानी भी कहते हैं।

(घ) कसैल्ला – रूका हुआ देर का पानी जो पीने योग्य न हो।

(च) खोहदल़ा – मटला पानी जिसमें कीचड़, मैल धुली हुई हो ।

(छ) चिक्कड़ – कीचड़ वाला पानी

(ज) गारा – जिसमें मिट्टी ही मिट्टी हो और पानी बाहर न निकल सके ।

(झ) गार – कुएं या तालाब में जमी हुई मिट्टी वाला पानी ।

(ट) लील्ला – सर्दियों में मन्द मन्द बहने वाला शान्त नदी का पानी।

(ठ) ततुआणी – गर्म पानी का स्त्रोत जैसे कि मणिकर्ण में पाया जाता है ।

(ड) बर्फान्नी – हिमाच्छादित शिखरों से बहने वाला ठण्डा पानी।

(ढ) खाड्डू – खड्ड का पानी जो सर्दियों में ठण्डा और गर्मियों में गर्म रहता है ।

इसके अतिरिक्त पानी का गुण इन विशेषणों से भी प्रकट किया जाता है –

तत्ता ‘गर्म’ कोस्सा—‘कोस्णा’ ‘कोस्ण, ठण्डा, ‘शीतल’ हौल़ा, हल्का, भारी, आदि ।

 4.वेग गति

पर्वत मालाओ में कल्लोल करता पानी अपनी अनेक छटाएं दिखाता है कहीं पाषाणों से टकराता इतना तीन और कहीं विश्राम स्थलियों में इतना शान्त प्रतीत होता है जिसका वर्णन कठिन है । पानी के वेग और गति के लिये ये शब्द मिलते हैं —

(क) छहरा – पत्थरों से टकराता हुआ पानी जहां तेज धारा में बह रहा हो और जिसे पार करना यात्री के लिये कठिन हो । यदि पांव फिसले तो चकना चूर होने में कोई कसर बाकी नहीं रहती है।

(ख) धार – पर्वत की चोटी से गिर कर आने वाला पानी ।

(ग) बाह – नदी का बहाव, यदि दो या तीन की संख्या में हो तो इस शब्द का प्रयोग होता है।

(घ) उआर पार – आर पार, वर्षा में नदी के प्रवाह के लिये इस शब्द का प्रयोग है । इसके समान प्रयोग ‘दरया चढ़ना’ या ‘खड्डु चढ़णी’ भी व्यवहार में हैं।

(च) कुहरू – दो नदियों के संगम स्थान पर जहां बरसात में एक नदी का पानी इतना अधिक और तेज होता है जिससे दूसरी नदी का पानी रूक जाता है और आस पास के क्षेत्रों को बांध में घेर लेता है । इस रूके हुए पानी के लिये कुहरू शब्द का प्रयोग है।

      5.उद्गम स्त्रोत

जलाशयों में जहां से पानी निकलता है उन स्त्रोतों के नाम इस प्रकार हैं-

(क) सीर – पर्वत या भूमि के निम्नतल से निकलने वाले छोटे छोटे स्त्रोत । कहीं कहीं तो पानी ऊपर से गिराने के लिये सिंहमुख बनाये हुए मिलते हैं जैसे भागसुनाथ में।

(ख) कूण्डी – सरोवर या कुएं का निम्नतल जहां से पानी बुद बुदाता हो ।

6.प्रपा

पर्वत यात्रा में पानी सर्वत्र सुलभ नहीं है । यात्रियों की सुविधा के लिये स्थान स्थान पर पानी पिलाने का प्रबन्ध होता है । इसे पुण्य कार्य समझा जाता है ।

(क) भरो – घास की बनी झोपड़ी में प्रपा का निर्माण होता है । कहीं-कहीं पर पीपल या बट की घनी छाया में पत्थरों से बने ऊंचे ‘टयाला’ पर पांच दस पानी से भरे घड़े रखे होते हैं । यात्री वृक्ष की शीतल छाया में बैठकर विश्राम करते हैं और पानी का आनन्द लेते हैं।

(ख) धरम्याणा–वर्ष या कुछ महीनों के लिये भरो लगाने का संकल्प कुछ लोग करते हैं । इसे धर्मार्थ पानी कहा जाता है । एक या दो घड़े प्रतिदिन मन्दिर में देना भी धर्म समझा जाता है।

(ग) चट्ठ – जलाशय – कूप, वापी आदि के पास ईंट पत्थर लगाकर एक भाग का निर्माण किया जाता है जिसमें समय समय पर लोग पानी के घड़े डालते रहते हैं यह पशओं के लिये होता है क्योंकि वे कुएं से पानी पीने के लिये असमर्थ है। कभी-कभी लोग अपने पशुओं को कुएं के पास ले आते हैं उन्हें स्नान कराते है और पानी पिलाते है । इससे पानी घर तक दूर ढोने में श्रम लघुता होती है ।

7. पात्र

घरों में भांति भांति के पात्र व्यवहार में लाये जाते है। जिन में मिट्टी के पात्र इस प्रकार है –

मट्ट – मटका जिसमें बीस घड़ों के लगभग पानी के संग्रह की क्षमता होती है। चाट्टी, घड़ा, घड़ोल्लू आदि अन्य पात्र हैं।

हण्डू, पारू, प्रौली छोटे पात्र हैं ।

तरमेहड़ा – ताम्बे के पात्र को कहते हैं।

चरोट्टी, चरोट्टू, गाग्गर, गंगासागर, मसरवा, गड़बू, लोटकू, ग्लास आदि पीतल के पात्र होते हैं कलस, छूच्छी, आचमनी आदि पूजा पात्र चांदी के होते हैं।

छाम्बा – प्रायः पात्र जूठे कम किये जाते हैं । भ्रम परिहार के लिये अंजलि बान्ध कर पानी पी लिया जाता है । अंजलि द्वारा पान के लिये इस शब्द का प्रयोग है। चूट्टी-चुल्लू भर अंजलि में रखे पानी से क्रूला ‘चुल्ली’ के लिये इस शब्द का व्यवहार है।

  1. साधन

पानी भरने के लिये इन साधनों का प्रयोग किया जाता है –

(क) बैंहगी–बहंगी बांस के डण्डे पर बनी यह झूले की तरह कन्धों पर लटकती है । दोनों ओर लगाई रस्सी के नियन्त्रण में दो या चार घड़े ले जाने की इसमें क्षमता होती है, इसका व्यवहार केवल पुरुष करते हैं।

(ख) दोघड़–दो घड़ों को भरकर सिर पर ले जाने का व्यवहार स्त्रियां करती है।

(ग) बिन्ना – मूंज, घास या कपड़े से बर्तुलाकार गुंथी चुटिया को सिर पर धारण कर स्त्रियां घड़े उठाती हैं ।

 

  1. वर्षा

नद नदियों का प्रदेश होते हए भी यहां का जन-जीवन वर्षा पर निर्भर है । यदि वर्षा समय समय पर होती रहे तो धरती शस्य-श्यामला और जीवन सुखमय होता है अन्यथा अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है । अम्बर में घनघोर घटा छा जाती है । बिज ‘बिजली’ चमकती है । गड़ाक्के ‘गर्जन’ होते हैं। यदि वर्षा मन्द मन्द हो तो इसे किण किणाट, किणी-किणी, भर-भर, सिम समाट आदि शब्दों से व्यक्त किया जाता है । यदि वर्षा तेज हो तो इसे द्राड़ कहा जाता है। न्हेरी ‘अन्धेरी’ और तूफान से आने वाली वर्षा को ‘पलच्छ’ कहा जाता है । ओले पड़ने को आह् ण कहते हैं।

खुआजा – वर्षा का देवता माना जाता है । जब नदी में बाढ़ आये तो द्रंई ‘मल्ला खुआजा की पूजा करते है । छोटी छोटी रंगबिरंगी झण्डियां जल में पत्र पुष्प सहित प्रवाहित करते हैं । मक्की के आटे का रोट और कड़ाह ‘हलवा’ भेंट करते है।

नदी में पानी की ध्वनि को कल कल, छल छल कहा जाता है । एक दूसरे पर पानी के छींटे मारने को छपाक्का कहा जाता है। भीगने के लिये ‘सिजणा’ और भिगोने के लिये ‘सेड़ना’ शब्द का व्यवहार है। वर्षा में रुके पानी में हो रही बून्दा बान्दी से बने ‘बुदबुदों ‘ को पटार कह कर पुकारते हैं।

बत्तर – फसल बीजने से पहले जो वर्षा भूमि को उर्वरा करने में सहायक होती है – उसे बत्तर कहा जाता है । बत्तर होने पर किसान बिजाई का काम प्रारम्भ करते है । मक्की बीजने के लिये बत्तर की प्रतीक्षा की जाती है।

  1. यातायात के साधन

पानी को पार करने के लिये प्रमुख साधन ये हैं –

(क) पूल़ – स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त कई नदियों पर पुल बान्धे गये हैं। इससे यातायात में विशेष सुविधा हो गई है ।

(ख) बेड़ी – मनुष्यों, पशुओं और अन्य वस्तु जात को नदी के पार पहुंचाने में विशेष रूप में सहायक है ।

(ग) किश्ती – यात्रियों को पार लगाने में आरामदायक है।

(घ) खटनाऊ – जहां बेड़ी, किश्ती का प्रयोग सफल न हो सके ऐसी अवस्था में तेज नदी की धारा को पार करने के लिये द्रेंईं ‘मल्लाह’ भैंस की दो खालों में श्वास से वायु भर कर, उनके ऊपर खाट धर कर और एक या दो यात्रियों को बैठा कर नदी के पार तैर कर पहुंचाते हैं। बहुधा अकेला द्रेंईं खाल पर चढ़कर और अपनी पीठ पर एक यात्री को विठा कर नदी पार कराता हैं । यह बड़े साहस का काम है । यदि भोला भाला यात्री दुर्भाग्यवश अपने हाथ पैर छोड़ दे तो उसे जल समाधि लेने में देरी न लगे । ऐसी संकटकालीन स्थिति में द्रेंईं यात्री को पार पहंचा कर प्रसन्नता व्यक्त करता है और पुरस्कार की कामना इन शब्दों से करता है-

बोल बाले बझियां दे, जै जेआ, मस्ती मिली जाए माहराज ।

(च) छाड़ – नदी में रोड़े ‘बड़े खड़े पत्थर’ पग पग पर रखे जाते हैं जिन पर कदम कदम बढ़ा कर यात्री नदी पार करता है । कभी प्रवाह में पत्थर दूरी पर भी रखा जाता है जिस पर थोड़ा उछल कूद कर यात्री पार जा सकता है ।

(छ) गाहण – नदी पार करने में यदि कोई अन्य साधन सुलभ न हो तो यात्री तैर कर या छड़ी ‘सोट्ठी हाथ में लेकर पानी की गहनता मापता जाता है, और पार पहुंच जाता है । गहनता का माप दण्ड इस प्रकार बताया जाता है-

गोड्डें गोड्डें ‘घुटनों तक’, पट्टें पट्टें ‘जङ्गा तक’,

लक्कें लक्कें ‘कटि, पर्यन्त’, गलें गलें ‘कण्ठ तक’,

कन्ने कन्नें ‘कान तक’ ।

यदि पानी सिर से ऊपर चढ़ जाए तो बांस का परिमाण बताया जाता है-

इक नाहल़, दो नाहली डुग्गा आदि । जहां पानी बहुत गहरा हो उसे लील गगन और (अ) थाह कहा जाता है ऐसी स्थिति में जहां पत्तण ‘पार करने का स्थान’ या अन्य साधन न हो वहां तारू ‘तराक’ अपने साहस का परिचय देता है । तारी ‘तैराकी’ में छटनाऊ मारना ‘लहरों’ को बाहुबल से काटकर, उछल कूद कर आगे बढ़ना, नकजुभ्भी मारना ‘पानी के अन्दर गोता लगाना’ विशेष तैराकी मानी जाती है । सखणोत्रू ‘नया तैराक’ जोश में प्राकर वेग में बढ़ जाता है जिसका परिणाम , नकाक्के, गोते खाना होता है । कभी कभी नदी में रूढ़ना ‘बह जाना’ भी दिखाई देता है । तैराकी शिक्षण विधि में एक लोकोक्ति है–

मार खाई पढ़ना प्रौन्दा (कने) गोत्तेआं खाई तरना औन्दा । जिसमें दर्शाया गया है कि पीट खाकर पढ़ना आता है (और) गोत्ते खाकर तैरना आता है ।

पर्वत की कन्दरा में जहां पानी हो उसे गुफा कहते हैं। जहां बैठने का स्थान हो उसे जलाधारी कहते हैं जिसमें ऊपर पर्वत से पानी सिमसिमाता रहता है ।

पानी में जीव जन्तुओं से सदा भय बना रहता है । उन जन्तुओं में प्रमुख हैं सर्प, मच्छी, डीहन्ना, जोक ।

निश्चल पानी में सुआल़ ‘शैंवाल’ या जल नीली आ जाती है। इसे हटा कर पानी स्वच्छ किया जाता है और व्यवहार में लाया जाता है।

नदी के पास घराट ‘पनचक्की’ विशेष लाभप्रद है। कहीं कहीं पानी के कूल भयावह भी पाये जाते हैं। क्योंकि यहां मसाण ‘श्मशान’ होते हैं। लोग सुनाते हैं-कि रात्रि को मशालें लेकर मसाण में नदी के तट पर प्रेत जल धीर बन कर नृत्य करते हैं। ऐसे जल कूल का नाम जलोद्धर दिया जाता है। वापी का नाम भी चुड़ैल बौड़ी जैसे शिमला में सुना जाता है।

  1. शकुन विचार

पानी की गणना शुभ लक्षणों में है। यात्रा करते समय पानी से भरा कलश द्वार पर रखा जाता है। कलश से पानी द्वारा मार्जन और बन्दना कर यात्रा प्रारम्भ की जाती है। कन्या को तथा अन्य सम्बन्धियों को भी नदी, सरोवर तक जाकर विदा किया जाता है । विवाह पूजा आदि संस्कारों में कलश रख कर तथा समय-समय पर मार्जन, तर्पण और आचमन कर पानी का महत्व दर्शाया जाता है।

घर से बाहर निकलते ही यदि पानी का भरा घड़ा मिल जाए तो शुभ शकुन समझा जाता है । यदि इसके विपरीत खाली घड़ा मिले तो यात्री तुरन्त घर लौट आता है क्योंकि यह अशुभ समझा जाता है । विवाह, यज्ञ आदि के समय वर्षा की बुन्दा बान्दी हो जाए तो शुभ समझा समझा जाता है। प्रातः स्नान के उपरान्त देवताओं की प्रतिमा पर पानी चढ़ाना, पीपल या वट वृक्ष को पानी से सिंचित करना पुण्य माना जाता है । अतिथी सेवा में पानी से हाथ पैर धुलाना सत्कार माना जाता है । अनेक कार्यों में पानी की छिड़कन शुद्धता के लिये की जाती है ।

इस प्रकार पानी के महत्त्व के साथ पानी से सम्बन्धित शब्दावली का भी विशेष महत्व है। बिजली के प्रयोग से नल कूप उलीचन यन्त्र (पम्पिंग सैट) लगने पर पानी से सम्बन्धित कई शब्दों का शनै-शनैः लोप हो रहा है जैसे बैंहगी, दोघड़, बिन्ना, मट आदि । देश और काल की परिधि में पानी से सम्बन्धित शब्दों का संग्रह तुलनात्मक दृष्टि में महत्वपूर्ण है नहीं तो यह सब भविष्य में छायावाद बन कर रह जाएगा जैंसे महाकवि जयशंकर प्रसाद का कामायनी में वर्णन चिन्ता सर्ग :–

नीचे जल था, ऊपर हिम था,

एक तरल था, एक सधन,

एक तत्व की ही प्रधानता

कहो उसे जड़ या चेतन ।

द्वारा श्री संत राम शर्मा,

70, दी माल,

शिमला-1

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