वाक्य-विचार

पहाड़ी में वाक्य-रचना बड़ी सरल है। वाक्य सर्वदा छोटे और साधारण होते हैं। लंबे और जटिल वाक्यों की प्रायः प्रधानता नहीं रहती। यों तो एक शब्द से भी पूरे वाक्य के भाव लक्षित हो जाते हैं, यथा- सो (सो जा), उठ (उठ जा), बैह (बैठ जा) आदि, परन्तु मूलतः एक वाक्य के लिए दो पद होने आवश्यक होते हैं. जैसे ‘मुन्नू उठेया’ वाक्य में पहला पद ‘मुन्नू’ (बच्चा) उद्देश्य है अर्थात् ऐसा पद जिसके विषय में कुछ कहा जाए तथा दूसरा पद ‘उठेया’ विधेय है अर्थात् जो उद्देश्य के बारे में कहा जाए। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि एक पूरे वाक्य के लिए उद्देश्य तथा विधेय दो पद होने अनिवार्य हैं और यह प्रथा पहाड़ी में भी प्रचलित है। सो, उठ, बैह आदि विधेयों में भी ‘तू’ उद्देश्य लुप्त है। हालांकि उसकी उपस्थिति स्वतः स्पष्ट है- तू सो, तू उठ, तू बैह आदि। भारतीय व्याकरणाचार्यों ने कहा है कि ‘कारकान्विता क्रिया वाक्यम्’ अर्थात् कारक से युक्त क्रिया वाक्य है। यहां उद्देश्य के लिए ‘कारक’ तथा विधेय के लिए ‘क्रिया’ कहा गया है। यह वाक्य का लघुतम रूप है- बगेर हंसो था (लड़का हंसता था), कुत्ता नठेया, हाऊं सूता आदि। परन्तु हर भाषा में ऐसे वाक्य बहुत कम होते हैं। भावाभिव्यक्ति हेतु कुछ बड़े वाक्यों के लिए संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया और क्रियाविशेषण आदि अनेक घटक होते हैं। जैसे विधेय के लिए क्रिया का होना ज़रूरी है, वैसे ही उद्देश्य के लिए संज्ञा का किसी न किसी रूप में होना भी आवश्यक है।

         वास्तव में वाक्य का अर्थ है ‘सार्थक शब्दों का ऐसा व्यवस्थित क्रम जिसस वक्ता अपनी बात दूसरों को साफ-साफ समझा सके।’ इस तरह एक वाक्य का प्रत्येक शब्द दूसरे शब्द से जुड़ा होता है- ‘घोड़ा घाह खाआदा’ वाक्य में घोड़ा (कता), घाह (कर्म) तथा खाआदा (क्रिया) क्रम से जुड़े हैं और यह साधारण वाक्य है। यह वाक्य लंबा रूप ले सकता है- काला घोड़ा हरा घाह खूब खाआदा,यहां भी शब्द क्रम से जुड़े हैं, परन्तु काला (विशेषण) घोड़ा से अधिक निक जडा है, वैसे ही जैसे हरा (विशेषण) घाह (कर्म) तथा खूब (क्रिया विक खाआदा (क्रिया) से अधिक निकटता से जुड़े हैं। इसी तरह ‘निक्का काला ताज़ा हरा घाह खूब मज़े ने खाआदा’ में तीन खण्ड हैं- (1) निक्का काला (2) ताज़ा हरा घाह तथा (3) खूब भजे ने खाआदा। एक वाक्य के ऐसे खयो । ‘वाक्यांश’ कहते हैं। पहाड़ी भाषा में वाक्य-रचना के अध्ययन के लिए वापर निम्नलिखित वाक्यांशों में बांटा जा सकता है –

  1. संज्ञा वाक्यांश   2. विशेषण वाक्यांश   3. क्रियाविशेषण वाक्यांश   4.क्रिया वाक्यांश

1. संज्ञा वाक्यांश

संज्ञाक्यांश वाक्यांश में एक मूल संज्ञा होती है और शेष उसके सहयोगी होते हैं। इस तरह संज्ञा-वाक्यांश ऐसी रचना है जिसमें मुख्य संज्ञा को अन्य सहयोगी विशिष्टता दिलाते हैं। वाक्य में मुख्य संज्ञा कर्ता या कर्म के रूप में हो सकती है। ऐसे वाक्यांशों में मुख्य संज्ञा प्रमुख है तथा शेष उसके विशेषक या रूपांतरक होते हैं। संज्ञा-वाक्यांश में मुख्य संज्ञा एक ही होगी, परन्तु उसके विशेषक या रूपांतरक एक या एक से अधिक हो सकते हैं। ये विशेषक या रूपांतरक प्रायः विशेषण होते हैं। आकारान्त विशेषक संज्ञा के लिंग-वचन के अनुसार रूप बदलते हैं, यथा- पीउंला कपड़ा, पीउंले कपड़े, पीउंली कोटी; काला घोड़ा, काले घोड़े, काली घोड़ी, कालियां घोड़ियां आदि। शेष विशेषक सभी स्थितियों में समान रहते हैं- सुन्दर छोह्टु, सुन्दर छोह्टी, सुन्दर छोह्टे।

अनेक बार विशेषणों की पुनरावृत्ति होती है- लाल-लाल कपड़े, मीठे-मीठे फौल, हौरी-हौरी सब्जी, खरे-खरे माह्णू, दुबले-दुबले बैल आदि। ऐसी स्थिति में संज्ञाएं प्रायः बहवचन में ही अभिव्यक्त होती हैं। एक वचन में प्रायः विशेषण की पुनरावृत्ति नहीं होती, परन्तु यदि पुनरावृत्ति तुलनात्मक स्थिति बता रहा हो तो एक वचन में उसका अर्थ सबसे कम या सबसे ज्यादा अर्थात् उत्तमावस्या दर्शाता है। तब अनेक बार ‘ही’ के अर्थ का द्योतक पहाडी भाषा की बालिया शब्द भी दोनों के बीच प्रयोग में आता है- लाल-लाल कपड़ा ‘सबसे या बहुत लाल कपड़ा’, होछा-ए होछा शोहरू ‘सबसे छोटा लडका’। निक्का-ई निक्का न्याणा ‘सबसे छोटा बच्चा आदि’।

       जब मुख्य संज्ञा के एक से अधिक विशेषक हों तो ऐसे विशेषक वाक्य में प्रयोग के लिए निश्चित क्रम अपनाते हैं और बिना क्रम के उनका उपयोग नहीं हो सकता, यथा-

            (1) जब गुणवाचक और परिमाणवाचक विशेषण एक साथ आ रहे हों तो परिमाणवाचक विशेषण शब्द पहले आता है  तथा गुणवाचक उसके बाद –

       बड़ा बांका देस-                     बहुत सुन्दर देश

       बख शोभले लोक –                  बहुत अच्छे लोग

       होर ठण्डा पाणी —                  और ठण्डा पानी

      (2) संख्यावाचक विशेषण गुणवाचक विशेषण से पहले आता है –

       दुई नानके छोह्टू –                   दो छोटे बच्चे

       चौन लांबे पेड़ –                    तीन लंबे पेड़

       एक शांवली छोह्टी –                  एक सांवली लड़की

       मेरी दू छोटी बहनें –                 मेरी दो छोटी बहिनें

       (3) जब दो गुणवाचक विशेषण साथ-साथ आ जाएं तो दोनों में से कोई भी पहले आ सकता है-

              नीऊलू फाटू़ ओंदू चादरू –       नीला फटा हुआ पट्ट

                                         अथवा

       फाटू ओंदू नीऊलू चादरू –              फटा हुआ नीला पट्ट

      लौहका जेठा भाई-                            (दो बड़े भाइयों में से) छोटा बड़ा भाई

                                           अथवा

      जेठा लौहका भाई –                           बड़ा छोटा भाई

      निक्की पढ़ाकु भैण –                         छोटी (अधिक) पढ़ने वाली बहिन

                                          अथवा

         पढ़ाकु निक्की भैण –                    (अधिक) पढ़ने वाली छोटी बहिन

        (4) जब सम्बंधवाचक, गणनावाचक, क्रमवाचक, संख्यावाचक दो से . अधिक विशेषण एक वाक्यांश की रचना कर रहे हों तो सम्बंधवाचक सबसे पहले आता है, गणनावाचक उसके बाद तथा अन्य उनके बाद आते हैं –

से मेरे त्रै पुत्र –                   वे मेरे तीन पुत्र

मेरा एक भाई –                 मेरा एक भाई

तिसदा दूजा खेत्र –            उसका दूसरा खेत

तेरा तिजा छोटा घर –        तेरा तीसरा छोटा घर

से मेरी एक दूजी भैण –      वह मेरी एक दूसरी बहिन

        (5) संज्ञा-वाक्यांशों में क्रियाओं के कृदन्तों से बने विशेषको का भी

विशेष स्थान है। ऐसे वाक्यांश लिंग-वचन के आधार पर रूप बदलते हैं :

  • वर्तमानकालिक कृदन्त

रुंदा छोह्टु हसा –                             रोता लड़का हंस पड़ा

रुंदी लड़की हसी –                            रोती लड़की हंस पड़ी

रुंदे लोक चुप होईगे –                        रोते लोग चुप हो गए

(ख) पुराघटित कृदन्त से बने संज्ञा वाक्यांश भी लिंग-वचन के आधार पर परिवर्तनशील हैं –

          चुटिरा किरडा शोट पोरे –                          टूटा हुआ किलटा फेंक दे

          चुटिरी किरडी कौ सा –                             टूटी हुई किलटी कहां है

          चटिरे किरडे कोम नी एंदे –                       टूटे हुए किलटे काम में नहीं आते

         खापरी ज़ोई तरह न लाआ सा                     बूढ़ी पत्नी रास्ते पर लाती है, ट्टी हई

         चुटिरी पूल घौरा पजाआ सा-                       (घास की) जूती घर पहुंचाती है

          हत्थें लिखुरा मिटी जांदा                              हाथ से लिखा मिट जाता है

          मत्थें लिखुरा नी मिटदा –                            माथे पर लिखा नहीं मिटता

(6) कृदन्तीय विशेषणों के साथ अन्य विशेषण मिल कर भिन्न प्रकार के लंबे संज्ञा-वाक्यांशों की रचना करते हैं-

(क) लिखोरा से पत्र

(ख) लिखोरा से लंबा पत्र

(ग) लिखोरे से चार लंबे पत्र

(घ) हसदे लगोरे से सारे प्रदेसी लोग

(7) पहाड़ी में संज्ञा-वाक्यांशों में सर्वनामीय-वाक्यांशों का विशेष महत्त्व है। जब दो या अधिक सर्वनामों का मेल होता है तो उनका संयुक्त रूप अनेक बार संज्ञा का काम देता है और संज्ञा-वाक्यांश की रचना करता है, यथा सम्बंधवाचक ‘जो’ के साथ-

   जो-किछ मत बकदा –          जो कुछ मत कह

  जो-कोई आंगा, रोकी लेणा –           जो कोई आएगा रोक लेना

  जिस किसी जो बोलणे दी                  हर एक (व्यक्ति) को बोलने की ज़रूरत

  जरूरत नी ही –                                नहीं है

  सब-किछ मुकी गिया –                      सब कुछ समाप्त हो गया

  सब-कोई एही गलांदे –                      सब कोई यही कहते हैं

  जे-किछ तैं गलाया, ठीक नी हा       – जो कुछ तूने कहा ठीक नहीं है

             (8) सर्वनाम भी संज्ञा के विशेषक होते हैं और संज्ञा-वाक्यांश की रचना करते हैं –

        ए तोता है, से मोरनी थी –                    यह तोता है, वह मोरनी थी

        एस मुनुआ/एसा मुनिया                     इस लड़के/लड़की को कुछ मत कहो

        जो किछ मता गलांदे –

        एई दुबले बौलदा/एसा दुबली              इस दुर्बल बैल/इस दुर्बल गाय को

        गाई बें घाह देआ –                              घास दो

       (9) सर्वनाम प्रायः अन्य विशेषण से पहले प्रयुक्त होता है –

        एजा लांबा सुस्त छोटु असो –                    यह लंबा सुस्त लड़का है     

        मेरी दू छोटी भैणी डाक्टर असो –              मेरी दो छोटी बहिनें डाक्टर हैं

        तेसके चीन बड़े भाई स्कूल दे असो –         उसके तीन बड़े भाई स्कूल में हैं

2.विशेषण वाक्यांश

             दो या अधिक विशेषण प्रायः विशेषण-वाक्यांश की रचना करते हैं जो किसी वाक्य में संज्ञा-वाक्यांशों के विशेषक के रूप में कार्य करते हैं। इनके बारे में ऊपर बहुत कुछ कहा गया है। इनके क्रम का भी उल्लेख किया जा चुका है। पहाड़ी के विशेषण वाक्यांशों में प्राय: यह देखने में आता है कि जहां परिमाणवाचक, संख्यावाचक, सम्बंधवाचक और गुणवाचक विशेषणों का योग हो तो गुणवाचक विशेषण मुख्य होने के कारण अन्त में आएगा-

      (1) संख्यावाचक + परिमाणवाचक + गुणवाचक

           इक गिट्ठ चौड़ा –                    एक बालिश्त चौड़ा

           चार आंगल बेर्ला –                 चार उंगलियों के बराबर चौड़ा

           बिह हत्थ डुग्घा (कुआं) –        बीस हाथ गहरा (कुआं)

          छौह पणसेरी (घीऊ) –            तीन किलो के लगभग (घी)

     यहां गिट्ट, आंगल, हत्थ शब्द संज्ञा नहीं है, वरन् माप के द्योतक परिमाणवाचक विशेषण हैं।

(2) संख्यावाचक विशेषणों की आवृत्ति अनुमान प्रदर्शित करती है –

        चार-पंज घर –                    लगभग चार-पांच घर

        सत्ती-अट्ठी आई जाइयां –    सात-आठ (दिन) के बाद आ जाना

        दो-ढाई घड़ी चुप रह –        कुछ देर चुप रह

(3) एक विशेषण दूसरे विशेषण की विशिष्टता को बल देता है

        रज बोहू हेरू –                   काफी बहुत देखा

        बड़ा खरा होया –                बहुत अच्छा हो गया

        मता किच्छ बदली गिया –   बहुत कुछ बदल गया

 (4) आकृतिमूलक विशेषणों का योग –

        खरी-खोटी सुणनी पौंदी –      अच्छा-बुरा सुनना पड़ता है

        नुआं-ताज़ा सुणा –                 नया-ताज़ा सुना दे

        बुरा-भला मत बकेया कर –   बुरा-भला मत बोल

         उट-पटांग नी बोलणा –        उलटा-सीधा नहीं बोलते

         ऐसे विशेषण-वाक्यांश लिंग-वचन के आधार पर परिवर्तनशील हैं, यथाखरी-खोटी गल, खरे-खोटे माहणु, खरा-खोटा हाल; नुआं-ताज़ा समाचार, नुएंताज़े फौल, नुई-ताज़ी गल आदि।

                (5) ऐसा विशेषणवाक्यांश जिसमें संज्ञा के विकारी रूप का सम्बंधबोधक अव्यय द्वारा विशेषण के साथ योग होता है-

          कम्मे ताईं तेज –          काम के लिए तेज़

          कन्ने दा टौणा –            कान से बहरा

  1. क्रियाविशेषण वाक्यांश

        किसी वाक्य में क्रियाविशेषण के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों के क्रम को क्रियाविशेषण-वाक्यांश कहते हैं। संबंधबोधक शब्दों के सहयोग से बने अधिकांश वाक्यांश भी क्रियाविशेषण वाक्यांश के अन्तर्गत आते हैं। प्रायः इनके कोई विशेषक नहीं होते; परन्तु वे अपने से बाद आने वाले शब्दों की विशेषता दर्शाते हैं। इनके अनेक प्रकार हैं –

              (1) स्थानवाचक क्रियाविशेषण शब्द में अपादान कारक के प्रत्यय के संयोग से क्रियाविशेषण वाक्यांश बनता है-

         ऊबेॅ रे गांव दू तोलुओॅ गांव दूरेॅ ओॅ सोॅ-       ऊपर के गांव से नीचे का गांव दूर है

         हामें गाशवेॅ कौमरेॅ दू रौंदे ऑसोॅ –             हम ऊपर के कमरे में रहते हैं

        ऑखेॅ न तोखेॅ ताईं चौल –                         यहां से वहां तक चल

         एथी ते कदी मत जांदी –                          यहां से कभी न जा

         अग्गी ने मत खेल –                                 आग से मत खेल

            (2) अव्यय की स्थिति में क्रियाविशेषण-वाक्यांश में लिंग-वचन के आधार पर कोई परिवर्तन नहीं आता

स्ताबी चल –                                           जल्दी चल

हौलेॅ बोल –                                            धीरे बोल

सूले हांड – .                                          आहिस्ता चल

सूलेॅ जा छे़केॅ एज़ी                                  आराम से जा जल्दी आना

श्यामु तिशड़ा इ स्ताबी हांडो                  श्याम उतना ही तेज चलता है जितना

जिशड़ा मोती                                         मोती

                             (3) महत्त्व या अधिकता-न्यूनता दर्शाने के लिए क्रियाविशेषण की पुनरावृत्ति भी होती है –

               स्ताबी-स्ताबी चल ‘जल्दी-जल्दी चल’, सूलेॅ -सूलेॅ पढ़, हौलेॅ़-हौलेॅ़ का आहिस्ता-आहिस्ता पढ़, धीरे-धीरे लिख’,

               न्हीठा-न्हीठा हो ‘अधिक नीचे हो जा।’

                            (4) अनुकृति-मूलक क्रियाविशेषण-अनुकृति के आधार पर क्रियाविशेषणों का प्रदर्शन ऐसे वाक्यांशों को जन्म देता है-

 छे़केॅ-सूलेॅ केरनाऍ मूँ कोम –               कभी न कभी करूंगा ही मैं यह काम

अंदर बाहर हांडदे-ई कटी दिहाड़ी –    अंदर-बाहर चलते-फिरते ही बिता दिया

                                                           दिन

छे़र देवा छे़र, आगे-पीछेॅ बी हेर –         आत्म-विभोर तो देवता हो जा, पर आगे

                                                          पीछे भी देख

जेबे-केबे किहां मारदा फेरे तू –           जब-कभी क्यों मारता है फेरे तू

इताह-उतांह मत फिरे –                      इधर-उधर मत घूमो

जाहलू काह्लू बी हाक                       जब कभी भी आवाज मार दूं

पोंगी, खिट मारी देआं –                      दौड़ मार कर आ जाना

(5) दिशाओं को दर्शाते सम्बंधसूचक दिशा-विशेष के साथ मिलकर क्रियाविशेषण-वाक्यांश की रचना करते हैं –

      सज्जे पक्खे कुण था तां खब्बे पक्खे कुण?-  दायीं ओर कौन था तो बायीं ओर कौन?

     यहां एक्खे ‘पासे’ सम्बंधसूचक है तथा सज्जा-खब्बा दिशावाचक क्रियाविशेषण है। सज्जे पक्खे, खब्बे पक्खे क्रियाविशेषण वाक्यांश हैं। इसी तरह धीरेॅ सम्बंधसूचक अव्यय का अर्थ है तरफ, ओर

     ऊझेॅ धीरेॅ रौहा सी आपु हेठेॅ धीरेॅ पाहुणेॅ          ऊपर की ओर रहते हैं स्वयं नीचे की

                                                                        ओर अतिथि

 (6) सम्बंधसूचक जब सर्वनाम के साथ मिलकर क्रियाविशेषण वाक्यांश बनाता है तो सर्वनाम पहले आता है और वह भी विकारी रूप धारण करके प्रयुक्त होता है –

         (क) साई : इस साई कोई लाल न ए- इस जैसा कोई लाल नहीं है

                 तौ साई मूर्ख मैं होर नी हेरू – तेरा जैसा मूर्ख मैंने और नहीं देखा

                  मिंजो साई लिख-           मेरी तरह लिख

         (ख) भांए : इस भाए हाऊं अनपढ़ हा – इसके अनुसार मैं अनपढ़ हूं

 तिजो भाए ए माहणू ए –                 तेरे अनुसार यह आदमी है

 मिंजो भांए ए देवता ए –                 मेरे अनुसार यह देवता है

           तिसा रे भाए तू किछ मत करदा – उसके अनुसार तू कुछ मत कर।

           (ग) ताईं : तिस ताईं रोटी बणाई ए – उसके लिए रोटी बनाई है

          कुसा ताई भत रखिरा –             किस के लिए भात रखा है

ताईं के लिए कुछ बोलियों में सर्वनाम विकारी रूप न धारण करके सम्बंधकारकीय रूप अपनाता है और यद्यपि ताईं का अर्थ उर्दू ‘वास्ते’ या हिन्दी ‘कारण’ है, परन्तु प्रकृति में यह पुंल्लिंग न होकर स्त्रीलिंग है –

        तेरी ताईं खाणा बी छुटू –                तेरे कारण खाना भी छूट गया

        तिन्हां री ताईं ई ढबुए कढिरे –        उनके वास्ते ही पैसे निकाले हैं

        मेरी ताईं किछ मत करदा              मेरी खातिर कुछ मत करना

        तिसा री ताईं झूठ गलाणा पेया –     उसकी खातिर झूठ बोलना पड़ा

4.क्रिया वाक्यांश

        क्रिया-वाक्यांश क्रिया का वह अंश है जो उस वाक्य की मूल क्रिया होती है अथवा एक क्रिया के स्थान पर क्रिया-का-समूह होता है जो क्रिया के भाव को पूर्ण अभिव्यक्ति देता है। किसी भी वाक्य में क्रिया-वाक्यांश का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके बिना कोई भी वाक्य पूर्ण वाक्य नहीं होता। मात्र एक क्रिया भी पूर्ण वाक्य बना लेती है; ऐसा गुण वाक्य के किसी अन्य तत्त्व में नहीं पाया जाता। वास्तव में क्रिया-वाक्यांश किसी वाक्य के विधेय का वह भाग है जिसमें एक क्रिया और उसकी सहायक क्रियाएं शामिल होती हैं। पहाड़ी भाषा में मूलतः दो प्रकार के क्रियावाक्यांश हैं- सरल और संयुक्त।

          (1) धातु रूप : पहाड़ी में क्रिया का धातु रूप न्यूनतम क्रिया-वाक्यांश है। अकर्मक क्रिया की धातु एकलरूप में आज्ञार्थ वाक्य का काम देती है- उठ, बैह, बेश, सो, हस आदि। ऐसे वाक्यों में मध्यम-पुरुष सर्वनाम एक-वचन ‘तू’ न होते हुए भी अपनी उपस्थिति दर्शाता है- (तू) उठ, (तू) सो आदि। सकर्मक क्रिया की स्थिति में कर्म का होना ज़रूरी है भले ही क्रिया वहां भी धातु रूप में रहती है- खिंद धो, पत्री लिख, पोथी पढ़, कथा शुण आदि। नकारात्मक स्थिति के लिए ‘न’ या ‘मत’ प्रत्ययों का प्रयोग होता है और वाक्य रचना में कोई अन्तर नहीं पड़ता- सो मत, न उठ, कागद न/मत फाड़, पत्थर न/मत सुट आदि।

इस प्रकार क्रियावाक्यांश की न्यूनतम इकाई क्रिया की धातु है जो आज्ञार्थ रूप में मध्यम-पुरुष सर्वनाम एक-वचन का पूर्ण भाव अभिव्यक्त करती है। बहुवचन की स्थिति में धातु प्रायः आकारान्त हो जाती है जब मध्यम-पुरुष बहुवचन ‘तुसे’ या ‘तुमे’ लुप्त होता है –

     हाथ धोआ –                        हाथ धोओ या तुम हाथ धोओ

     कताब पढ़ा –                       पुस्तक पढ़ो

     एबेॅ सोआ                            अब सोओ

     टी.बी. हेरा –                        टी.वी. देखो

     अपणे हत्थ दसा –                अपने हाथ दिखाओ

     लुहारा जो खलोथी देआ –           लुहार को अन्न का निश्चित भाग दो

    (2) सरलतम क्रिया-वाक्यांश : पहाड़ी भाषा में हिन्दी आदि अन्य भाषाओं की तरह सरलतम क्रियावाक्यांश संयोजक क्रियाओं से बनते हैं जो वर्तमान और भतकाल के आधार पर दो प्रकार के होते हैं। संयोजक क्रिया को मूल क्रिया या सहायक क्रिया भी कहते हैं। यह पहले उल्लेख हो चुका है कि पहाड़ी भाषा में संयोजक क्रिया दो प्रकार से व्युत्पन्न हुई है- बाहरी शाखा में सं० ‘भू’ धातु से तथा भीतरी शाखा में सं० ‘अस’ धातु से। उदाहरण देखे जा सकते हैं –

      क) भीतरी शाखा ‘अस’ धातु से –

         श्यामु दकानदार असोॅॅ –       श्याम दुकानदार है

         आदमी आच्छा असोॅ –         आदमी अच्छा है    

         दांद चीटे असोॅ –                  दांत सफेद हैं

         सो खरा माहणु सा –            वह अच्छा आदमी है

         ते खरे माहणु सी –              वे अच्छे लोग हैं

         बगेर कमजोर असोॅ –         लड़का कमज़ोर है

     (ख) बाहरी शाखा ‘भू’ धातु से .

        ए सर्प ऐ –                     यह सांप है

        तू बांका ऐ-                   तू सुन्दर है

        बाहर कुण हा –             बाहर कौन है

        सो चडेषी हा –              वह चुगली करने वाली है

        इढ़ी चच्चड़ हिन –         यहां पिस्सू हैं

     (ग) भूतकाल की स्थिति में भीतरी शाखा की बोलियों में थिया-थिए-थी का प्रयोग होता है तथा बाहरी शाखा में हिन्दी के समान था-थे-थी-थियां रूप प्रचलित हैं।

        सो टस्सु निमाणा थिया –   वह बालक बिना मां के था

        ते छोह्टु डरपोक थिए –     वे लड़के डरपोक थे

              सो गाई दुबली थी –        वह गाय दुबली थी

        से जबरा ज़मींदार था –     वह बूढ़ा ज़मींदार था

        तिसारे घरे चार पुत्र थे –    उसके घर में चार पुत्र थे

        तिसारी पंज बेटियां थियां –  उसकी पांच बेटियां थीं

                  (3) संयुक्तक्रिया क्रियावाक्यांश : इस श्रेणी के अधीन दो उप-श्रेणी के क्रियावाक्यांशों का उल्लेख किया जा सकता है– (क) मुख्य क्रिया तथा संयोजक क्रिया के योग से बने तथा (ख) दो या दो से अधिक मूल क्रियाओं का संयोजक क्रिया के साथ बना क्रियावाक्यांश।

(क.1) सामान्य वर्तमान – लिंग, वचन के आधार पर रूपांतरित होता है

हाऊं झीशी बियूजू –                                  मैं प्रातः उठता हूं

एह खपराला मंझ तूहे किहां रहंदे –            इस टूटे-फूटे मकान में तुम कैसे रहते हो

आओं घोॅ रे सुतु औसो –                            मैं घर में सोता हूं

तुएं खेचोॅ दे सुतोॅ ओॅसोॅ –                           तुम खेत में सोते हो

घोड़ी उठदी ऐ कन्नेॅ घोड़ियां उठदियां हन-घोड़ी उठती है और घोड़ियां उठती हैं

(क.2) अपूर्ण भूत – लिंग, वचन के आधार पर परिवर्तन आता है-

मैं मुंडुए जो मारदा था –                     मैं बालक को मारता था

से खेतां च कम्म करदे थे –                 वे खेतों में काम करते थे

शोहरी सारी रात पोॅ ढ़ा थी –               लड़की सारी रात पढ़ती थी

छोह्टु मूं देखओ होॅसोॅ थिए –              लड़के मुझे देख कर हंसते थे

पहाड़ों गाशेॅ दिओॅण पोॅड़ोॅ थिया –       पहाड़ों पर बर्फ पड़ता था

(क.3) सम्भाव्य भविष्यत् – बाहरी शाखा की बोलियों में हिन्दी के । समान गा-गे-गी तथा भीतरी शाखा में ला-ले-ली का प्रयोग होता है –

बगेर सकुला-खे जाला –                                     लड़का स्कूल को जाएगा

जू सुतॉली से खोआली –                                     जो सोएगी वह खोएगी

जू़ गाओॅ ले से नाचोॅ़ ले –                                     जो गाएंगे वे नाचेंगे

नेगी कताब पोॅ ढला, नेगण पोॅ टी लिखली-         नेगी किताब पढ़ेगा, नेगिन तख्ती लिखेगी

लोक नी बोलगे, मैं ता सच्ची                               लोग नहीं बोलेंगे, मैं तो सच्ची बात

गल गलांगी –                                                    कहूंगी

इस कम्मा जो हरि करगा –                               इस काम को हरि करेगा

        कुछ बोलियों में पुरुषवाचक उत्तम-पुरुष सर्वनाम एकवचन के लिए भिन्न रूप प्रचलित हैं, यथा

आओं आटा पिशु (बघाटी) –                  मैं आटा पीतूंगा

हाऊं रोटी खानु (कुलुई) –                     मैं रोटी खाऊंगा

               (क.4) सामान्य भूत – (i) अकर्मक क्रिया की स्थिति में क्रिया कर्ता के लिंग वचन के अनुसार बदलती है- घोड़ा दौड़ेया, घोड़े दौड़े, घोड़ी दौड़ी, घोड़ियां ऐसी स्थिति में विशेषण के साथ मिल कर क्रिया-वाक्यांश में विशेषण भी क्रियानुसार परिवर्तित होते हैं –

लड़का ऊदा पड़ा –                  लड़का नीचे पड़ा (गिरा)

लड़के ऊदे पड़े –                     लड़के नीचे पड़े (गिरे)

लड़की ऊदी पड़ी –                  लड़की नीचे पड़ी (गिरी)

शोहरू लोमा पोऊ –                 लड़का लंबा पड़ा

शोहरू लोमे पोए –                    लड़के लंबे पड़े

शोहरी लोमी पोई –                    लड़की लंबी पड़ी

(ii) सकर्मक क्रिया की स्थिति में क्रिया कर्म के लिंग वचन अनुसार बदलती है- मैं भत्त खादेया, मैं फल खादे, मैं रोटी खादी, मैं रोटियां खादियां; तुसेॅ बूटा काटू, तुसेॅ बूटे काटेॅ, तुसेॅ बूटी काटी। इसी तरह –

      तेँ पराणा कपड़ा कुत्थु सुटेया –             तूने पुराना कपड़ा कहां फेंका

      तेँ पराणे कपड़े कुत्थु सुटे –                  तूने पुराने कपड़े कहां फेंके

      तेँ पराणी खिंद कुत्थु सुटी –                  तूने पुरानी खिंद कहां फेंकी

      तुएं होॅरोॅ पेड़ काटा –                           तूने हरा पेड़ काटा

      तुएं होॅरे पेड़ काटे –                             तूने हरे पेड़ काटे

      तुएं होॅरी बूटी काटी –                           तूने हरी बूटी काटी

          (क. 5)  भूतकालिक-कृदन्त से रचित अन्य काल-रचना में भी – सामान्य भूत जैसी स्थिति रहती है। उनमें केवल सहायक क्रिया के भिन्न रूप जुड़ जाते हैं, यथा –

                (i) आसन्न भूत में हा-हन-हिन, ए-हन, ओॅसोॅ आदि- घोड़ा दौड़ेया ए, .. लड़की ऊदी पड़ी असोॅ, शोहरू लोमे पौड़ेॅ सी आदि।

               (ii) पूर्ण भूत में था-थे-थी, थिया-थिए-थी आदि- घोड़ी दौड़ी थी, लड़के ऊदे पड़े थिए, शोहरू लोमे पोॅए थी आदि।

              (ख) दो या दो से अधिक मूल क्रियाओं का संयोजक क्रिया के साथ राचत क्रियावाक्यांश- इनमें एक मुख्य क्रिया होती है, अन्त में संयोजक क्रिया रहती ह और बीच में सहायक क्रिया का योग होता है, यथा ‘से पत्र लिखणे लगुरा थिया’- वाक्य में तीन क्रियाएं हैं (1) लिखना से लिखणे, (2) लगना से लगुरा तथा (3) संयोजक क्रिया थिया। यहां विशेष रूप से सहायक क्रिया ‘लगना’ का महत्त्व है। यह आरम्भबोधक सहायक क्रिया है। इसके प्रयोग से पहले मूल क्रिया णा-नाकारांत से णे-नेकारान्त हो जाती है, यथा लिखणा से लिखणे; अन्य उदाहरणसे तेस समय खाणा खाणे लगुरे थे, किछ माण्डू नचणे लगुरे थे, मास्टर तिन्हां जो देखणे लगुरा था आदि।

             (2) ऐसी ही सहायक क्रिया ‘पेणा’ या ‘पौणा’ (पड़ना) है जो मूल क्रिया में अनेक रूप से संयोग करती है और प्रायः विवशताबोधक क्रिया है- तेसा जो जमीना पर बैठणा पेया था, तिसजो तेथी किछ दिहाड़े कटणे पेए थे, तौबे ए कोम नभेरना-ए पौणा सा ‘तुझे यह काम समाप्त करना ही पड़ेगा’।

             (3). एक और सहायक क्रिया ‘जाणा’ है जो अनेक रूपों में मूल क्रिया से जुड़ती है जो निरन्तरताबोधक सहायक क्रिया है– हुण तिकर ता तिस जो आई जाणा चाहिंदा था, तू नी आंदा तां मैं चली जाणा था, कपड़ा शोके गोवा असों ‘कपड़ा सूख गया है’, धोएदे झुड़के शुके गोवे असों आदि।

             (4) सहायक क्रियाओं में रहणा या रौणा का विशेष महत्त्व है। यह सातत्यबोधक सहायक क्रिया है। यह प्रायः मूल क्रिया के वर्तमानकालिक कृदन्त में जुड़ता है, यथा ‘पढ़ना’ क्रिया का वर्तमानकालिक कृदन्त रूप पढ़दा तथा सो रातदिहाड़ पढ़दा रौहा सा ‘वह रात दिन पढ़ता रहता है’, से अपणे शाहुरे जांदा रहंदा हा, लोका राची नाचदे रौहा औसो आदि।

            (5) भाषा चाहे हिन्दी हो या पहाड़ी ‘सकणा’ (सकना) क्रिया स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त नहीं होती। यह सदा दूसरी क्रिया के साथ जुड़कर ही अर्थात् संयुक्त क्रिया के रूप में ही प्रयोग में लाई जाती है- मैं खड़ा नी उठी सकदा, पढ़ी-लिखी रो नारी महान बणी सको। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि ‘सकना’ क्रिया के प्रयोग से पहले मूल क्रिया की धातु ईकारान्त हो जाती है, उठणा या बणना क्रियाओं की उठ या बण धातुएं सकणा से पूर्व उठी या बणी रूप धारण कर गईं। इसी तरहतेरे बोल पूरे नी हुई सकगे, तू मिंजो चिट्ठी नी लिखी सकदा था, तेरी गल से सुणी नी सकया था, मैं तरी संकदा हां ‘मैं तैर सकता हूं’ आदि। ‘सकणा’ प्रायः शक्तिबोधक सहायक क्रिया है जो क्रिया वाक्यांश में मूल क्रिया के सामर्थ्य को दर्शाती है।

वाक्यावली

      भाषा की मूल और वास्तविक इकाई वाक्य है। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, अव्यय वाक्य के अंग हैं। ये व्याकरण के विभिन्न विधान हैं जो वाक्य की रचना करते हैं। वाक्य-विन्यास के संदर्भ में अब तक केवल भिन्न प्रकार के वाक्यांशों पर विचार किया गया है, यथा- संज्ञा-वाक्यांश, विशेषण-वाक्यांश, क्रियावाक्यांश, क्रियाविशेषण वाक्यांश। इनकी रचना पर विस्तार से विवेचन किया है क्योंकि इन्हीं वाक्यांशों के आधार पर मूल वाक्य का गठन होता है। वाक्य चाहे छोटा हो या बड़ा, सरल हो या जटिल, इनमें से एक या अनेक का समावेश रना है। जहां तक सामान्य बोल-चाल की लोक-भाषा का सम्बंध है, पहाड़ी की बग-भग सभी बोलियों के वाक्यों में कर्ता, क्रिया और कर्म का क्रम रहता है- बाब पिओं शराब अर बेटा पिओँ दुध ‘बाप पीता है शराब और बेटा पीता है दूध’, मैं खाआ करदा अंब ते खाणा, मूं जाणा स्कूला-बें, हामे ना पकावमी रोटी ‘हम नहीं पकाएंगी रोटी’, आऊं ना खणुए खाति ‘मैं नहीं खोदूंगा गड्डा’, तेईए थी भेज़ीदी निटी हाजी नी पुहती ‘उसने थी भेजी हुई चिट्ठी अभी नहीं पहुंची’, परन्तु क्योंकि आरम्भ से ही पहाड़ी में लिखने वाले लेखक मूलतः हिन्दी के लेखक रहे हैं इसलिए पहाड़ी का कर्ता, क्रिया और कर्म का क्रम लिखित रूप में प्रचलित नहीं रहा है और यह क्रम पूर्णतया हिन्दी के क्रम से प्रतिस्थापित हो चुका है। इसलिए एतत्पश्चात् अध्ययन में वाक्य-क्रम कर्ता, कर्म और क्रिया रहेगा। इसके अतिरिक्त आगामी पृष्ठों में संज्ञा, विशेषण अथवा क्रिया आदि में मात्र एक संज्ञा भी हो सकती है और पूरा संज्ञा-वाक्यांश आदि भी हो सकता है, और क्योंकि वाक्यांशों पर पहले ही पूरा विवेचन हो चुका है अब पुनः उनका विवेचन नहीं होगा।

         अध्ययन की दृष्टि से वाक्यों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता हैसाधारण तथा मिश्रित। साधारण वाक्य वह है जिसमें एक ही वाक्यांश हो, अर्थात् एक क्रिया से बना वाक्य। मिश्रित में एक से अधिक वाक्यांश होते हैं। मूल वाक्यांश प्रमुख होता है, शेष वाक्यांश उस पर आश्रित होते हैं।

साधारण वाक्य

               (1) पहाड़ी में साधारण वाक्य वह है जिसमें एक क्रिया रहती है। कर्ता तथा अन्य कारकों के योग से वाक्य का आकार बढ़ता रहता है। कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं –

(क) केवल एक क्रिया का वाक्य; यह सर्वदा आज्ञार्थ होता है –

         सो – अर्थात् ‘तू सो’

          जा – अर्थात् ‘तू जा’

         उठ – अर्थात् ‘तू उठ’

(ख) कर्ता और क्रिया; यहां क्रिया कर्ता के लिंग, वचन के अनुसार बदलती है –

         घोड़ा दौड़या –          घोड़ा दौड़ा

         डाकिया आवला –     डाकिया आएगा .

        बगेर होॅसे –               लड़के हंसे

        शोहरी झाॅ़ड़ी –          लड़की गिरी

        मूसा नस्सेआ –          चूहा भागा

(ग) कर्ता, कर्म और क्रिया; इसमें क्रिया कर्म के अनुरूप बदलती है –

घोड़े घा खादेया         – घोड़े ने घास खाया

मुन्नीए चा सुटी –        लड़की ने चाय फेंकी

उनी कोल्हु फेरू –       उसने कोल्हू फेरा

भाऊए.दूध पीऊ –        बच्चे ने दूध पीया

मठे डाल़ टुकया –       लड़के ने पेड़ काटा

बब्बें पुत्र भनेआ –       पिता ने पुत्र को पीटा

(घ)कर्ता, कर्म वाक्यांश और क्रिया –

मठेयां सब डाल टुक्के –              लड़कों ने सब पेड़ काटे

तिनी काढ़ोर दुध पिआ –             उसने काढ़ा हुआ दूध पिया

अंबरे घणे तारे दुसदे –               आकाश में घने तारे दिखाई देते हैं

अंबरे इक तारा दुसदा –              आकाश में एक तारा दिखाई देता है

बेटड़ीए हौरा घाह लूणू –              स्त्री ने हरा घास काटा

(ड) कर्ता संज्ञा-वाक्यांश, कर्म संज्ञा-वाक्यांश और क्रिया

               इसा खड्डा बक्खे दो सड़का हन –      इस नाले के किनारे दो सड़कें हैं

               काठेरी हंडी कदी भत न रिझंदा –      काठ की हांडी में कभी भात नहीं पकता

               एसा बेटड़ीए हौरा-हौरा घाह लूणा –     इस स्त्री ने हरा-हरा घास काटा

               तिनी मठे अपणा मुंह काला़ कित्ता –     उस लड़के ने अपना मुंह काला किया

(2) संयोजक क्रिया से गठित वाक्य

        ऐसी वाक्य-रचना में संज्ञा या संज्ञा वाक्यांश कर्ता के रूप में रहता है, उसके साथ एक विधेयार्थ और अन्त में संयोजक क्रिया रहती है। संयोजक क्रिया मूल में कर्ता और विधेयार्थ के बीच सम्बंध स्थापित करती है। ऐसे वाक्य में विधेयार्थ या तो संज्ञा या संज्ञा-वाक्यांश अथवा विशेषण या क्रियाविशेषण वाक्यांश हो सकता है। कर्ता और विधेयार्थ विशेषण के बीच लिंग और वचन की साम्यता रहती है और उसी अनुसार संयोजक क्रिया भी रूप बदलती है। इस प्रकार के विकार के आधार पर वाक्य के भिन्न प्रकार होते हैं।

(क) संयोजक क्रिया की कर्ता से समता; यहां कर्ता (संज्ञा या सज्ञा वाक्यांश) + कर्म (संज्ञा अथवा संज्ञा-वाक्यांश) + संयोजक क्रिया का क्रम रहता है –

आं माश्टर ऑ सू –                     मैं अध्यापक हूं

मोहन वकील सा –                     मोहन वकील है

कंस कष्णा रा मामा था –            कंस कृष्ण का मामा था

बिमला झगड़ालू ऑ स्त्री थी –         बिमला झगड़ालु स्त्री थी

मेरे चाचे डलेवर थिए –                मेरे चाचे ड्राईवर थे

तिस दियां चार मुन्नियां थियां –      उसकी चार लड़कियां थीं

यों असांरी डोह्रियां थी –               ये हमारे (छोटे) खेत थे

यों असारे खेतर थे –                    ये हमारे खेत थे

                            (ख) संयोजक क्रिया की विधेयार्थ से समता – संयोजक क्रिया के प्रयोग . का एक अन्य रूप सम्बंधकारकीय अथवा अधिकरणीय वाक्य रचना में मिलता है। इसमें वस्त, भाव या व्यक्ति के सम्बंध या अधिकार रखने की भावना निहित रहती कैं। ऐसे वाक्यों में कर्ता सर्वदा संज्ञा-वाक्यांश का होता है जिसका कर्मकारकीय या अधिकरणीय रूप होता है; कर्म में भी संज्ञा-वाक्यांश की भावना रहती है और क्रिया उसी से मेल खाती है –

तिसा री चार मुन्नियां हन –                 उसकी चार पुत्रियां हैं

तिसा रा इक पुत्र ए –                         उसका एक पुत्र है

तेसी घरे बिचे दस आदमी थिए –       उस घर में दस आदमी थे

तेथी एक बी ज्वाणस नी थी –             वहां एक भी स्त्री नहीं थी

(3) अकर्मक क्रिया से रचित वाक्य

        पहाड़ी के सरल वाक्यों में अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं की स्थिति भिन्न रहती है। इस विषय पर विचार करते समय यह तथ्य ध्यान में रहना चाहिए कि पहाड़ी की भीतरी शाखा में, कुछ स्थितियों में मण्डियाली सहित, क्रियाओं का तिङन्त रूप प्रचलित है। भीतरी शाखा की सभी बोलियों में वर्तमान काल की क्रियाएं तिङन्त होती हैं जिनमें कर्ता के लिंग भेद के अनुसार क्रिया में परिवर्तन नहीं होता, यथा- बगेर हांडों ‘लड़का चलता है’, ज्वाणस हांडों ‘स्त्री चलती है’, छोहटु सेओ खाओं ‘लड़का सेब खाता है’, छोहटी सेओ खाओं ‘लड़की सेब खाती ह’, मरद नौचा सा ‘मरद नाचता है’, बेटड़ी नौचा सा ‘स्त्री नाचती है’ आदि। शेष बालियो में क्रिया कृदन्तीय है, जिनमें क्रिया या क्रिया-वाक्यांश अपने कर्ता के लिंग वचन से साम्यता रखते हैं। विधेयार्थ का क्रिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता –

          मेरा पुत्त रोज स्कूल जांदा है –              मेरा बेटा रोज़ स्कूल जाता है

           मेरी पुतरी रोज स्कूल जांदी है –           मेरी बेटी रोज़ स्कूल जाती है

          माठा सारी रात सोंदा हा –                 लड़का सारी रात सोता है

          माठी सारी रात सोंदी ही –                 लड़की सारी रात सोती है

तोते उड़दे हन तां चिड़ियां उड़दियां हन – तोते उड़ते हैं और चिड़ियां उड़ती हैं

          भूतकालिक स्थिति में भीतरी शाखा की बोलियों में भी थिया, थिए, थी के योग से बाहरी शाखा की था, थे, थी की तरह अभिव्यक्ति होती है –

         बगेर सूले हांडोॅ थिया (था)-                  बच्चा धीरे चलता था

         लड़की सूले हांडोॅ थी –                        लड़की धीरे चलती थी

         पंछी उडोॅ थिए –                                 पक्षी उड़ते थे

         बांदर दौड़ोॅ थिए –                               बंदर दौड़ते थे

(4) सकर्मक क्रिया से गठित वाक्य

           सकर्मक क्रिया वाले वाक्यों में प्रायः कर्म का होना ज़रूरी है। इनमें प्रमुखता उन वाक्यों की है जिनमें एक कर्म रहता है। ऐसे वाक्यों में कर्ता के रूप में संज्ञा या संज्ञा-वाक्यांश या तो मूल रूप में रहता है या विकारी रूप में। इनमें क्रिया या क्रियावाक्यांश दो प्रकार से विकार ग्रहण करता है- कर्ता से समता या कर्म से समता।

          (क) कर्ता से समता – यदि रचना सामान्य वर्तमान, अपूर्ण भूत, संदिग्ध वर्तमान या सामान्य भविष्य हो तो सकर्मक क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष के आधार पर यथास्थिति रूप बदलती है, यथा- घोड़ा घा खांदा है, घोड़े घा खांदे हन, घोड़ी घा खांदी है, घोड़ियां घा खांदियां हन आदि। इसी तरह छोहरू पत्र/चिट्ठी लिखगा, छोहरे पत्र/चिट्ठी लिखगे, छोहरी पत्र/चिट्ठी लिखगी आदि। राम कताब पढ़ा आं, गीता कताब पढ़ा ईं, मठे कताब पढ़ा एं, मठियां कताब पढ़ा ईं। इन सारे उदाहरणों में क्रियाएं कर्ता के अनुसार बदली हैं। यहां पढ़ा’ सभी स्थितियों में समान है क्योंकि यह तिङन्त श्रेणी की क्रिया है। कुछ और उदाहरण देखे जा सकते हैं-

श्यामु रोटी खाओॅ था –                                     श्यामू रोटी खाता था

रामी रोटी खाओॅ थी –                                       रामी रोटी खाती थी

मेरी गणाखी ए कम करने जो न बलंदी –           मेरी आत्मा यह काम करने को नहीं

                                                                      कहती (बोलती)

मेरा मन ए कम करने जो न बलंदा –                 मेरा मन यह काम करने को नहीं कहता

                                                                      (बोलता)

तेरा चाचा ल्योंदा चा, चाची ल्योंदी पाणी-         तेरा चाचा लाता है चाय, चाची लाती है

                                                                     पानी

        (ख) कर्म से समता- यदि वाक्य-रचना ऊपर (क) के अन्तर्गत दर्शाए कालों से भिन्न कालों (विशेष कर भूतकालिक कृदन्त) से संबंधित हो तो सकर्मक क्रिया या क्रियावाक्यांश कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुरूप होगा, यथा-दादूए कताब पढ़ी, दादीए ग्रन्थ पढ़या, नानूए परार्ण पत्र पढ़े; वास्तव में भूतकालिक कृदन्त से रचित सारे कालों (सामान्य भूत, आसन्न भूत, पूर्ण भूत, सम्भाव्य भूत, संदिग्ध श्रत) की कर्तवाच्य स्थिति में मूल क्रिया और संयोजक क्रिया कर्म के लिंग-वचन के अनुसार परिवर्तित होती है, यथा- मैं/आसे//तुसे/तिनी/तिन्हें/मुंडुए/मुन्नीए पत्र लिखया/चिट्ठी लिखी/ग्रंथ लिखे। यहां क्रिया का कर्ता से संबंध नहीं है, सीधा कर्म से है। इसी तरह

चाचीए रोटी पकाई, परौंठे नी पकाए –         चाची ने रोटी पकाई, परौंठे नहीं पकाए

नानए पत्र लिखया, चिट्ठी नहीं लिखी –          नाना ने पत्र लिखा, चिट्ठी नहीं लिखी

मठेयां सब डाल टुक्के –                              लड़कों ने सब पेड़ काटे

मठीए सारी डालियां टुक्कियां –                    लड़की ने सारी टहनियां कार्टी

(5)  द्विकर्मक क्रियाओं की स्थिति

    सकर्मक क्रिया में कर्म का होना प्रायः जरूरी होता है- नोकराणीऍ झुड़कें धोएँ ऑसों ‘नौकरानी ने कपड़े धोए हैं’। यहां ‘धोएँ’ क्रिया का सम्बंध ‘झुड़कें’ कर्म से है, ‘नोकराणी’ कर्ता से नहीं। इसलिए ‘धोणा’ सकर्मक क्रिया है। परन्तु अनेक बार वाक्य में एक कर्म के होते हुए भी सकर्मक क्रिया स्पष्ट अर्थ नहीं देती। अपना भाव स्पष्ट करने के लिए उसे कुछ और शब्दों की आवश्यकता होती है। असे. प्रधान चुणेया’ में कर्ता (असे) है, कर्म (प्रधान) भी है तथा क्रिया (चुणेया) भी है, परन्तु अर्थ स्पष्ट नहीं है। अर्थ या भाव स्पष्ट करने के लिए एक और शब्द या कर्म की आवश्यकता है, जैसे ‘मोहन’। तब अर्थ स्पष्ट हुआ ‘असे मोहन प्रधान चुणेया’। इस दूसरे शब्द ‘मोहन’ को हम विधेयार्थ कहते हैं अर्थात् विधेय को पूरा अर्थ देने वाला, तथा इस वाक्य में यह दूसरा ‘कर्म’ है। द्विकर्मक क्रियाएं भी कुछ स्थितियों में कर्ता से साम्यता रखती हैं और अन्य स्थितियों में कर्म से, परन्तु नियम वही हैं जिनका ऊपर 4 (क) और (ख) में विस्तार से उल्लेख किया गया है। यहां मात्र यह देखना शेष है कि दो कर्मों की स्थिति में क्रिया किस कर्म के साथ समरूपता रखती है अर्थात् मूल कर्म के साथ या विधेयार्थ कर्म के साथ। दूसरे शब्दों में क्या ऊपर के उदाहरण में क्रिया ‘मोहन’ विधेयार्थ कर्म के अनुकूल या ‘प्रधान’ मूल कर्म कलिंग, वचन और पुरुष के अनुरूप बदलती है। इसके लिए कुछ और उदाहरण देखे जाने ज़रूरी हैं-

बब्बे बेटे जो दुध दित्ता –                           बाप ने बेटे को दूध दिया

बब्बे बेटे जो चाय दित्ती –                          बाप ने बेटे को चाय दी

भाईए भैणी री ताई कताबा खरीदियां –     भाई ने बहिन के लिए पुस्तकें खरीदी

भाईए भैणी री ताई कोट खरीदे –             भाई ने बहिन के लिए कोट खरीदे

आसें रामदासी प्रधानण चुणी –                हम ने रामदासी प्रधानण चुनी

मज़दूरेॅ पेड़ोॅ दु आम चोड़ेॅ थिए –              मज़दूर ने पेड़ से आम तोड़े थे

सीते बेटे रे खातरे टाले दोए थिए –           सीता ने बेटे के लिए कपड़े धोए थे

श्यामुए बगेरा खे कताब दित्ती –              श्यामू ने लड़कों को पुस्तक दी

              उक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि क्रिया या क्रियावाक्यांश अपने से निकट प्रत्यक्ष या मूल कर्म के साथ साम्यता रखते हैं तथा पहले आने वाले कर्म अर्थात् विधेयार्थ या परोक्ष कर्म के साथ नहीं। विधेयार्थ या परोक्ष कर्म विकार ग्रहण करता है अर्थात् उसमें विभक्ति-प्रत्यय लगता है तथा मूल या प्रत्यक्ष कर्म मूल अवस्था में रहता है।

मिश्रित वाक्य

       पहाड़ी बड़ी सरल भाषा है। इसमें सामान्य वाक्यों की ही प्रधानता रहती है। सामान्य बोल-चाल में वक्ता प्रायः एक वाक्यांश में अपनी बात करता है जिसमें एक ही क्रिया रहती है। मिश्रित वाक्य में प्राय: एक से अधिक वाक्य रहते हैं जो एक दूसरे पर आश्रित होते हैं। मूल में एक मुख्य वाक्य होता है, शेष वाक्य उसके उप-वाक्य कहे जा सकते हैं- ‘तू जा नी ता हाऊं जाऊँ’ प्रायः एक ही वाक्य का द्योतक है, परन्तु दो क्रियाएं दो भाव दर्शाती हुईं दो उप वाक्यों का मिश्रण है- तू जा, नहीं तो मैं जाता हूं। ‘तू जा’ उप वाक्य या वाक्यांश मूल है तथा ‘नी ता हाऊं जाऊँ’ उप-वाक्य प्राय: पहले उप वाक्य पर आश्रित है। इस तरह के आश्रित उप-वाक्यों की धारणा ही मिश्रित वाक्य का स्वरूप है। अध्ययन की दृष्टि से ये तीन प्रकार के होते हैं –

(1) संज्ञा उप-वाक्य आश्रित

(2) सार्वनामिक उप-वाक्य आश्रित

(3) क्रियाविशेषण उप-वाक्य आश्रित

(1) संज्ञा उप-वाक्य आश्रित

     (क) इस स्थिति में दोनों उप-वाक्य प्रायः स्वतंत्र होते हैं परन्तु दूसरा उप-वाक्य पहले उप-वाक्य के उद्देश्य की प्रतिपूर्ति करता है। हिन्दी में इन दो उप वाक्यों को ‘कि’ प्रत्यय द्वारा जोड़ा जाता है। पहाड़ी में ‘कि’ का कोई पर्यायवाची शब्द नहीं है, अतः इसे शून्य संयोजक कहा जा सकता है –

तिनी गलाया               मैं अज नी आई सकदा

मोहने देखेया              परीक्षा शुरू होई गईरी थी

फिर भी कुछ बोलियों में ‘जे’ का प्रयोग होने लगा है –

तिनी गलाया जे हाऊं भूखा हा

भाईए बोलेया जे तेस जाणा –         भाई ने कहा कि वह जाएगा

मैं सोचू जे गाश एला –                   मैंने सोचा कि वर्षा आएगी

(ख) दूसरी स्थिति में आश्रित उप वाक्य होर, अर, कने, ता आदि योजक प्रत्ययों द्वारा मूल उपवाक्य से जुड़ता है तथा इस तरह दो उप-वाक्यों के जड़ने से कार्य की निरन्तरता या पूर्णता स्पष्ट हो जाती है –

से मंदरोॅ खेॅ डेआ होर प्रशाद आणा –                  वह मंदिर गया और प्रसाद लाया

मैं घरे जांगा कने से हट्टी जांगा –                          मैं धर जाऊंगा और वह दुकान पर जाएगा

मुन्नू खेड़दा भी ए कने कम्म भी करदा ए –          लड़का खेलता भी है और काम भी

                                                                        करता है

मैं कताब पौढ़ी ता अलमारी न डाही –                  मैंने पुस्तक पढ़ी और अलमारी में रख दी

मौएं रोटी खाई अर सुत गोआ –                           मैंने रोटी खाई और सो गया

दकानि खे आओं जाऊ अर गरा खे तू जा-          दुकान को मैं जाता हूं और घर को तू जा

(2) सार्वनामिक उप-वाक्य आश्रित

      सार्वनामिक उप-वाक्य आश्रित वह मिश्रित वाक्य है जिसका प्रधान उपवाक्य बाद में आता है और आश्रित उप-वाक्य सम्बंधवाचक सर्वनाम ‘जे’ या ‘जो’ (कारकीय रूप सहित) से आरंभ होकर पहले आता है और वह संज्ञा-वाक्यांश की तरह प्रयुक्त होता है-

जे हीज़ोॅ आजा था से बाह्मण था –                       जो कल आया था वह ब्राह्मण था

ज़ो कोम केरा सा सो कमोआ सा –                    जो काम करता है वह कमाता है

जेस मांछोॅ रे घोरै शादी थी, से मोॅ  ज़े                  जिस व्यक्ति के घर शादी थी, वह मौज

रा सुतरा था –                                                    से सो रहा था

जिनी घर बसाणा, तिनी कम्म करना –                 जिसने घर बसाना हो वह काम करेगा

जिसा री ते प्रशंसा कीतीओ से मेरी                     जिसकी तूने प्रशंसा की है वह मेरी

चाची ऐ –                                                          चाची है

जू़णी शोहरूए आसा-बेॅ रस्ता दसू सो                जिस लड़के ने हमको मार्ग बताया वह

बड़ा खरा थी –                                                  ‘बहुत अच्छा था

(3) क्रिया-विशेषण उप-वाक्य आश्रित

        क्रियाविशेषण ऐसे संयोजक हैं जो अकेले या अन्य प्रत्ययों से जुड़ कर दो या दो से अधिक उप-वाक्यों का क्रियाविशेषण वाक्यांश बनाते हैं और मिश्रित सय का गठन करते हैं। ऐसी वाक्य-रचना प्रायःसमुच्चयबोधक प्रत्ययों द्वारा गठित होती है जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं-

          (क) विरोधसूचक समुच्चय में दो ऐसे उप-वाक्यों का मेल है जिसके प्रथम मूल उपवाक्य का दूसरा आश्रित उप-वाक्य विरोध भाव दर्शाता है। पहाड़ी में इस श्रेणी के समुच्चयबोधक पर, अपण प्रचलित हैं –

मैं पढ़ेया तां नी पर कढ़ेया तां हां –                    मैं पढ़ा-लिखा तो नहीं हूं परन्तु अनुभवी

                                                                      तो हूं

भतेरा बोलेया पर से नी मनेया –                      बहुत कहा परन्तु वह माना नहीं

हदबन्दी बी हुंदी पर से हुंदी कम्मा                  हदबंदी तो होती है परन्तु वह होती है

करने जो –                                                     काम करने के लिए

से सवेरे ता उठदा अपण कम्म नी करदा-      वह सवेरे तो उठता है परन्तु काम नहीं

                                                                    करता

घोड़ा दाणा तोॅ खाओॅ पर बोझा नेई ढोंदा-       घोड़ा दाना तो खाता है परन्तु बोझा नहीं

                                                                   ढोता

      (ख) विकल्पात्मक ऐसा समुच्चय है जो दो उप-वाक्यों को मिलाकर ऐसा मिश्रित वाक्य बनाता है जिसमें दूसरा उप-वाक्य पहले मूल वाक्य के लिए विकल्प दर्शाता है। इसे वियोजक भी कहते हैं। इसके अनेक अव्यय हैं, यथा- की (या), के (या), नतरी-नी ता (नहीं तो), चाहे, न …. न, किता (या तो), बीणी (चाहे)

तू कोम केरा सा की सोआ सा –                      तू काम करता है या सोता है

श्यामु जाओं घरा खे के आऊं जाऊ –             श्यामु जाता है घर या मैं जाऊँ

जे तेरे खाणी रोटी तो खा, नतरी                      यदि तूने रोटी खानी है तो खा ले, नहीं

आओं खाऊ –                                                 तो मैं खाऊंगा

तू पढ़ नी ता मार खांगा –                               तू पढ़ नहीं तो मार खाएगा

थोड़ा जेॅ़आ बोॅचा नेॅई तोॅ मुंड फूटौॅ था –          जरा सा बच गया नहीं तो सिर फट

                                                                    गया था

चाहे तू ढाबे दे चाहे अन्न दे –                         चाहे तू पैसे दे, चाहे अन्न दे

से न हाँसदा न होसणे देंदा –                          वह न हंसता न हंसने देता है

रोटी पका किता छेता-बें जा –                       रोटी पका या तो खेत को जा

                (ग) परिणामवाचक अव्यय किसी कारण या कारण के परिणाम या प्रभाव को दर्शाते हैं। इसमें एक उप-वाक्य कारण का द्योतक होता है और दूसरे उप-वाक्य में उसका परिणाम निहित होता है –

          क्योंकि – कैं-जे, किबेॅ-जे़, क्यांकि

तिसजो दौड़ना पेया कैं-जे गड्डी             उसको दौड़ना पड़ा क्योंकि गाड़ी छूटने

छूटणे आली़ थी                                    वाली थी

रामु फेल होई गिया कैं-जे से                  रामू फेल हो गया क्योंकि वह पढ़ता ही

पढ़दा ही नी था –                                  नहीं था

हाऊं छे़के आऊ किबेॅ-जेॅ़ सो घौरा         मैं शीघ्र ही आ गया क्योंकि वह घर में

नी थी ऑ थी –                                        नहीं था

मैं तिस बल नी गेया क्यांकि तैं नी            मैं उसके पास नहीं  गया क्योंकि तूने

था गलाया –                                           नहीं कहा था

         इसलिए – तौबेॅ ई, करिकेॅ

हिजोॅ होॅद बारीश थे तौबेॅ ई नैई                कल बहुत बारिश थी इसलिए मैं नहीं

आज़ सौके –                                           आ सकी

ऐसरेॅ घोॅरेॅ छो़ह्टा ओंआ तौबेंई ए             इसके घर लड़का हुआ है, इसीलिए

लाडु बांडदा लाग रा ओॅसोॅ –                     यह लड्ड बांट रहा है

मैं बमार था इस करिके जलसे च              मैं बीमार था इसलिए जलसे में न आ

नी आई सकेया –                                     सका

         (घ) प्रतिबंधात्मक समुच्चय से रचित मिश्रित वाक्य – यह ऐसे दो या अधिक उप-वाक्यों का संयोग होता है जिसमें प्रायः पूर्व वाक्य शर्त दर्शाता है तथा दूसरा उसकी प्रतिपूर्ति करता है –

जे इजता ने रहणा तां कमाई करी                     यदि सम्मान से रहना हो तो कमा कर

खाओ –                                                           खाओ

जे बारिश लागोॅ तोॅ खेचोॅ होरेॅ-भोॅरेॅ                     यदि वर्षा हुई तो खेत हरे-भरे हो जाएंगे

लागोलेॅ –

जे बडेयां रा केहणा मनेया तां सुखी.                   यदि बड़ों का कहना मानोगे तो सुखी

रहणा –                                                             रहोगे

जे़ पौढ़ीरा हुंदा ता नोकरी लागदी –                     यदि पढ़ा होता तो नौकरी लगती

जे़ दोॅ लागोॅ लेॅ तोॅ फोॅसोॅल शुक जांदेॅ ओॅ-             यदि धूप लगेगी तो फसल सूख जाएगी

जे़ मोंए से पाकड़ा नेॅई था तोॅ से ऊदा                  यदि मैंने उसे पकड़ा न होता तो वह

पोॅड़ोॅ था –                                                         नीचे गिर गया था

         (ङ) उपबंधात्मक मिश्रित वाक्य – इस श्रेणी के वाक्य में पहला उपवाक्य कोई उपबंध दिखाता है और यदि वह उपबन्ध न हुआ तो नहीं ता, नी ता, नाई ता’ प्रत्यय द्वारा उसका परिणाम दिखाया जाता है-

छे़के जा नाई ता निहारा होणा –                            शीघ्र जा नहीं तो अंधेरा हो जाएगा

छोह्टु खे रोटी देओं नेई तों रुओॅला –                   बच्चे को रोटी दो अन्यथा रोएगा

मठे जो ढब्बे देआ नी ता रुस्सी जाणा –                बच्चे को पैसे दो नहीं तो रूठ जाएगा

तू अपणा कम्म मुका नी ता इत्थु                          तू अपना काम समाप्त कर अन्यथा यहीं

रहणा पोॅणा —                                                    रहना पड़ेगा

          (च) कालवाचक-क्रियाविशेषण आश्रित अव्यय – कालवाचक क्रियाविशेषण का समय प्रदर्शक शब्द ‘जब’ (जे, जाहलू, जोंबे) सर्वदा आश्रित उप वाक्य बनाता है। पूर्ण वाक्य के लिए उसे दूसरे उप-वाक्य की आवश्यकता होती है। तब दोनों मिलकर मिश्रित एक वाक्य बनाते हैं, यथा

जाहलू से घर गेया तिसजो बड़ी                               जब वह घर गया, उसको बड़ी मार

मार पेई –                                                                पड़ी

जाह्लू मैं उठेया भ्याग होई गई थी –                          जब मैं उठा, सवेरा हो गया था

जेबे हाऊं पढ़ेया करां था, तू केत्थी था –                     ‘जब मैं पढ़ रहा था, तू कहां था

ज़ेबे गाश लागा, लोका खुश हुए –                              जब वर्षा लगी, लोग प्रसन्न हो गए

जॉबेॅ रोटी चाणी, सेभ खाणे लागों –                            जब रोटी पकी, सब खाने लगे

जब्बे बसन्ती एस्सी घरे आई, घर                               जब बसन्ती इस घर में आई, घर बदल

बदली गोआ –                                                           गया

      (छ) यही स्थिति स्थानवाचक-क्रियाविशेषण के स्थिति प्रदर्शक अव्यय ‘जहां’ (जेथी, जोखें, जित्थु, जित्थी) की है। इसका वाक्य भी अपने-आप में पूरा नहीं होता। इसे मूल वाक्यांश की आवश्यकता होती है-

जित्थु से जांदा, झगड़ा करि ने आंदा –                             जहां वह जाता है, झगड़ा करके आता है

जेथी मैं भत्त खादेया, तेथी बड़ी भीड़ थी-                         जहां मैंने भात खाया वहां बड़ी भीड़ थी

ज़ोॅखेॅ मंदर सा, देऊ बी होणा –                                       जहां मंदिर है, देवता भी होगा

 

 

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