अव्यय

व्याकरण में अव्यय वे शब्द हैं जो किसी वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम के लिंग, वचन या पुरुष के आधार पर कोई विकार ग्रहण नहीं करते प्रत्युत् सर्वदा एकसमान रहते हैं। इस आधार पर अव्यय शब्दों की चार श्रेणियां हैं –

  1. क्रियाविशेषण
  2. सम्बंधबोधक
  3. समुच्चयबोधक
  4. विस्मयादिबोधक

         1.क्रियाविशेषण

                      जो अविकारी शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, उन्हें क्रियाविशेषण कहते हैं। क्रियाविशेषण को पुनः चार श्रेणियों में विभक्त किया जाता है –

                     (1) स्थानवाचक, (2) कालवाचक, (3) रीतिवाचक, (4) परिमाणवाचक

                    (क) स्थानवाचक क्रियाविशेषण : जो क्रिया की स्थान सम्बंधी विशेषतः बताएं, यथा –

                     (क) यहाँ – ऑखें, इठी, इत्ते, इत्थु, इत्थी, एथी, एती

                             इधर – इसेॅ, ओरेॅ, इतांह्, इदी, इतखा, इनकेखे

                     (ख) वहाँ – तोॅखेॅ, तिढ़ी-तैढ़ी, ओत्थु, उत्थी, तेथी, तेहे।

                             उधर – तिसेॅ, पोरेॅ-रू, ओतांह्, उदी, उतखा, उत्ते, उतांह

                      (ग) कहाँ – कोॅ खेॅ, कठी, कुत्थु, कुत्ते, किती-कुती, केथी

                                      किधर – किसेॅ, कुतांह्, कुदी, कितखा-कुतखा

                      (घ) जहाँ – ज़ोॅ खेॅ, जढी-जठी, जिते, जेथी, जित्थु, जित्थी

                              जिधर – जिसेॅ, जितांह, जिदी, जितखा

                      (ङ) नीचे -हेटेॅ, हेठ, झिक, जुक, बुन्ह, थालेॅ, थल्ले 

                      (च) बीच – मोंझे, मांझ, मंझा, बिच, गभे, मंझ, मंझाटे 

                      (छ) पीछे – पीछे़ॅ, पिचोॅ रे, पिछेॅ, पिच्चु, पाछेॅ, पिच्छे 

                      (ज) अन्दर – आन्दरै, अन्दर, भीतर 

                      (झ) आगे-पीछे – गांह-पचांह, गुआड़े-पछवाड़े, अग्गे-पिच्छे

                       () आस-पास – अन्ने-बन्ने, आलेॅ़-दुआलेॅ़, अक्खें-बक्खें, नेड़े-तेड़े 

                      (ट) ऊपर – पांदेॅ, उप्पर, उबेॅ

ओरू दे भाभीए मेरी दाची (कु०)                                   ‘इधर दे भाभी मेरी दांती’ 

तिढ़ी ता बड़ी रौली है (चं०)                                            ‘वहाँ तो बड़ा शोर है’ । 

छेर देउआ छेर, ओरें-पोरें बी हेर (कु०)                           खेल देवता खेल इधर-उधर भी देख’ 

जित्थी जाणा ओत्थी खाणा, खारे                                      ‘जहां जाना वहीं खाना, अपना दाना

च रखणा अपणा दाणा (को०)                                        खार में रखना’ 

जित्थी जे पया खाह-फाह                                               ‘जहां लड़ाई हो वहां से भागने में ही 

तित्थी ते नठदेयां ही लाह (मं०)                                       फायदा है’

जेत्थी देखी तवा परात                                                     ‘जहां देखी तवा-परात वहीं काटी सारी 

तेत्थी कट्टी सारी रात (मं०)                                              रात’ 

ज़ोंखें पोइ रात तोंखें हुआ थाच (कु०)                             ‘जहां रात हो वहीं ठहरना’ ‘

 ज़ोंखें बाजू ढोलकू, तोंखें मियां मोलकू‘                           हर जगह विराजमान रहना’

काणी देवी काणा पज़ियारा                                             ‘कानी देवी काना पुजारी 

जिसे जाणा तिसे निहारा (कु०)                                       जिधर जाना उधर अंधेरा’

       पहाड़ी भाषा में ‘नीचे’ के लिए हेठ (हेवें), थल्ले, बुन्ह (बुन्हे) तीन शब्द हैं। इनमें ‘थल्ले’ स्थिति-वाचक है और ‘बुन्हे’ दिशावाचक। दोनों एक दूसरे का स्थान नहीं ले सकते। ‘मेरे थल्ले चंटाई ही’ की जगह ‘मेरे बुन्हे चटाई ही कहना अधिक उचित नहीं है। इसी तरह ‘घड़ी-भर बुन्ह जा’ के लिए ‘घड़ी भर थल्ले जा’ कहना भी अधिक ठीक नहीं है। ‘थल्ले’ हिन्दी शब्द ‘तले’ का पर्यायवाची है। ‘हेठ’ शब्द दोनों का स्थान ले सकता है।एथी, जेथी, केथी, तेथी स्थितिवाचक सर्वनामिक क्रियाविशेषण हैं जो क्रमशः ए, जे, कुण और से सर्वनामों से व्युत्पन्न हुए हैं, यथा- ए + स्थिति > एथी, जे + स्थिति > जेथी आदि। उकारान्त हो जाने पर ये इत्थु, जित्थु, कित्थु, तित्थु रूप में बदल जाते हैं। पूर्व अक्षर गुरु ‘ए’ से इस्व ‘इ’ हो जाने पर इनका रूप द्वित्वाक्षर *इत्थ’ का हो गया है। इनके विपरीत इसेॅ, जिसेॅ, किसेॅ और तिसेॅ दिशावाचक सार्वनामिक क्रियाविशेषण हैं। इनके पर्यायवाची इतांह् , जितांह् , कितांह् ? उतांह् शब्द है।

(2) कालवाचक क्रियाविशेषण : ये क्रिया के समय का बोध कराते हैं,

यथा –

          अब — अबै, अब्बे, एबें, एब्बे, हुण

          कब – कखणी, कणै, कदी, कालू, केबें, कैखणीयां, कोबे, कौबे, कधाडी, कध्याड़ी

           आज – अजे, अज्ज, आज, आज़, औज, औज़

           पिछला कल – कल, काल, हिज़, हिज़ों

           अगला कल – शूई

           गुजरा परसों – फरज, फोॅरज़ोॅ

           परसों – परसू, परसू, परसों, परशूई, पौरशी

           इस वर्ष – एशु, ऐंशु

           पिछला वर्ष – पर, परूं, परू, पौर, प्रोही

           पिछले से पिछला वर्ष – परार

          गत तीसरा वर्ष – नपरार, चनाह्र

         सुबह – तड़का, दोंतां, दोती, दोथी, झीश, भ्यागा, भौलखी

         शाम – कलेल, तरकाल, तरकाला, सांझे, सोंझ

         तब – तधाड़ी, तध्याड़ी, ताह्लू, ताली, तेबेॅ, तोबे, तौबेॅ

         जब – जधाड़ी, जाह्लू, जाहली, जेबेॅ, जोबे, जौबेॅ,

         अभी – एबी, एबेॅ, एब्बैही, हुणई, हेबी, हाले

        अभी तक – हाज़ी ताईं

मूता भ्यागा धुंदी उठणा (चं०)                                         ‘मैं प्रातः होते ही उठूंगा’

बागड़ी हाले अल्ली हिन. (चं०)                                        खेत अभी गीले हैं

हाज़ी ताईं नी सो आऊ (कु०)                                         ‘अभी तक नहीं वह आया’

               कालवाचक क्रियाविशेषण अधिकतः सीधे संस्कृत से प्राप्त हुए हैं। इनका मूलाधार संस्कृत भाषा है, यथा- सं० अद्य > अज्ज > आज, सं० ह्यस् > हिज़ पिछला कल’, पर + ह्यस् > फरज़ ‘गुज़रा परसों’, सं० श्वस् > श्वः > शूई ‘अगला कल’, सं० परश्वस् > परश्वः > पौरशी > परशूई > परसों । इसी तरह वर्षों का समय भी संस्कृत से प्राप्त हुआ है, यथा- सं० एषम् > एशु इस वर्ष’, सं० परुत > पर > . पोंर > पलं ‘पिछला वर्ष’, सं० परारि > परार ‘पिछले से पिछला वर्ष’, सं० चतुः + पर > चुनाह्र इस वर्ष सहित पिछला चौथा वर्ष’ । जब इन शब्दों के साथ ‘का’ प्रत्यय जोड़ा जाए तो ये क्रियाविशेषण अपने से सम्बंधित विशेषण या क्रियाविशेषण शब्द बनाते हैं, यथा- एशु से एशका, पोॅर से पोॅरका, परार से परारका, चुनाह्र से चु़नाह्रका। इसी तरह ओंज से ओंजका, हिज़ से हिज़का, फरज़ से फरज़का आदि।

ऐसी स्थिति में ये आकारान्त विशेषण शब्दों की तरह विशेष्य के लिंग-वचन के आधार पर परिवर्तित होते हैं। | 

          कालवाचक क्रियाविशेषण में से जाली, जाहलू, तालू आदि शब्द-रूप सं० पल (समय का लघुतम भाग) के संयोग से व्युत्पन्न हुए हैं –

          जिस + पल > जपल > जाह्ली > जाह्लु (जब)

          तिस + पल > तह्पल > ताह्ली > ताह्लु (तब)

          किस + पल > कह्पल > काह्ली > काह्लु (कब)

          इस + पल > इह्पल > हाली > हाले (अभी)

          इनके अंतिम रूप का जालु , ता:लु , का:लु उच्चारण अधिक उपयुक्त है। क्योंकि ‘ह’ जैसा महाप्राणत्व तो नहीं होता, परन्तु संघर्षत्व अधिक रहता है और वायु झटके से बाहर निकलती है।

                 (3) रीतिवाचक क्रियाविशेषण : ये क्रिया होने की विधि या रीति बतलाते हैं, जैसे –

                                  ऐसा – इशा, इयां, अदेहा, एंडा, एढ़ा

                                  कैसा – कदेहा, कियां, किशा, केंडा, केढ़ा

                                 धीरे – मठे, बल्लेॅ, सूले, सूलेॅ, होॅ लेॅ

                                 अचानक – अजगी, चाणक, चाणचक, चानक

                                 क्यों – कजो, किजो, कि, कीबेॅ, केईं, कैं, कैले, क्यों, कऊं, कणिखे, कँहजे ‘क्योंकि’, कोए

                                 जैसा – जिणो, जिशा, जदेहा, जेहरा, जेंडा, जेढ़ा, जेशो

                                 वैसा – तिणो, तिशा, तदेहा, तेहरा, तेंडा, तेढ़ा, तेशो

                                 जेढ़ा खाइए अन्न तेढ़ा हुआ मन (लो०)

                                रीतिवाचक क्रियाविशेषणों को निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा जा सकता है  –

                         (1) प्रकारवाचक – एढ़ा, जेढ़ा, केढ़ा, तेढ़ा, हॉ लेॅ, तोॅ लेॅ, सूलेॅ आदि।

                         (2) निश्चयवाचक – ज़रूर, ठीक, सची-मुची, पक्का, निंहचे़ ‘निश्चय’

                         आदि

                          (3) अनिश्चयवाचक – शायद, कोंडचेॅ ‘कदाचित्’, आइंचे़ ‘संभवतः’,

                                                          चाणचक, चानक, अजगा। 

                           (4) कारणवाचक – करी, करीके, ताईं, खातर, बजह आदि। 

                            (5) स्वीकृतिबोधक- हांजी, अच्छा, मनेया आदि। 

                            (6) निषेधबोधक – नी, नां, नाईं, मत आदि।

               (4) परिमाणवाचक क्रियाविशेषण : जिन शब्दों से क्रिया के काम या व्यापार के परिमाण का ज्ञान होता है, यथा-

                              बहुत – बोहू, बौहत, बड्डा, बड़ा, बोडा, भतेरा, भरी, भौता, मता 

                             सौकणी दे भाण्डे च मता ई सुझदा (लो०) ‘दूसरे की वस्तु अधिक दिखाई देती है। 

                              थोड़ा – चीं, मीं, उशी, थोड़ा, ज़रा, धक्ख, धक्कजा ‘थोड़ा सा’, तुणक

                                         ‘ज़रा सा’, धिख 

                              धिख अँह पीऊ दुध ‘जरा सा पीया दूध’ 

                              भारी – गरका, गिरका, भारा, भारी, निग्गर, जैला ‘सख्त’ 

                             बिल्कुले – निरा, निरा नांढा कॉखें न आऊ ‘बिल्कुल गुंगा कहां से आया 

                            बहुत ही- बख, बख बांका माण्डू बहुत ही अच्छा आदमी’ 

                               छोटा – निक्का, लौका, लौहकड़ा, होछा, छोटा

                                           निक्के नबाले रैही-गै ‘छोटे नाबालिग रह गए 

                           काफी – रज़, रज़ बोहू खाऊ ‘काफी अधिक खाया’

                           एतरा ‘इतना’, एतड़ा ‘इतना’, तेतरा ‘उतना’ आदि शब्द विशेषण भी हैं, परन्तु यदि ये शब्द प्रयोग में किसी अन्य विशेषण की विशेषता दर्शाते हों तो ये क्रियाविशेषण होते हैं, यथा- एतरा गरका इतना भारी’, एतड़े मते ‘इतने अधिक आदि। .

 

विकारी-अविकारी

             इस अध्याय के आरंभ में यह कहा गया है कि अव्यय शब्द वे हैं जो संज्ञा या सर्वनामों में लिंग, वचन और पुरुष के आधार पर किसी प्रकार का विकार ग्रहण नहीं करते। परन्तु यह देखने में आ रहा है कि क्रियाविशेषण में ऐसी स्थिति नहीं है। अनेक ऐसे शब्द आए हैं जो परिवर्तनशील हैं और लिंग-वचन के आधार पर उनमें विकार आता है। इस बिना पर क्रियाविशेषण शब्दों की दो श्रेणियां हैं- विकारी, अविकारी।

           (1) विकारी वे क्रियाविशेषण हैं जो संज्ञा के लिंग, वचन के आधार पर परिवर्तन ग्रहण करते हैं, यथा- चोरे कदेहा तोड़या जंदरा ‘चोर ने कैसा तोड़ा ताला’, तिनी कदेहे चोरे भांडे ‘उसने कैसे चोरे बर्तन’, तिनी कदेही खादी मार ‘उसने कैसी खाई मार’। इन वाक्यों में ‘कदेहा’ रीतिवाचक क्रियाविशेषण कर्म और क्रिया के अनुकूल कदेही, कदेहे और कदेही रूप में बदला। इसी तरह एक लोक गीत की पंक्ति है, ‘जेढी नाची म्हारी बुढली तेढी नाईं कोई’ जैसी नाची हमारी बुढ़िया, वैसी नहीं कोई’, यहां ‘बुढली’ कर्ता के साथ जेढ़ा और तेढ़ा रीतिवाचक क्रियाविशेषण ‘जेढी’ और ‘तेढी’ में बदले। एकवचन पुंल्लिंग ‘बुढला’ के साथ ये रूप ‘जेढ़ा’ और ‘तेढ़ा’ तथा बहुवचन ‘बुढले’ के साथ ‘जेढ़े’ तथा ‘तेढ़े’ में बदलते हैं। विभिन्न क्रियाविशेषणों में से प्रायः निम्नलिखित क्रियाविशेषण विकारी होते हैं –

         (क) आ-अन्त होने वाले परिमाणवाचक क्रियाविशेषण- इतणा, कितणा, एतरा,तेतरा आदि, यथा- इतणा भारी बस्ती,

                  इतणे भारी बोझ, इतणी हलकी गठडी आदि। 

          (ख) आ-अन्त रीतिवाचक क्रियाविशेषण – एढा, तेढा, एंडा, तेंडा, तदेहा आदि।

          (ग) कालवाचक क्रियाविशेषण जो ‘का’ प्रत्यय जोड़ने से विशेषण या क्रियाविशेषण बनाते हैं, यथा- पौरका बकरा ‘पिछले वर्ष का बकरा’, परारकी गाई ‘पिछले से पिछले वर्ष की जन्मी गाय’ आदि में ये विशेषण हैं, परन्तु कलका गइरा हाले नी आया, फरज का रखिरा भत्त सढ़ी गइरा, संझका चलया गभरू अज्ज पुंजया आदि वाक्यों में ये क्रियाविशेषण हैं।

         (2) अविकारी वे क्रियाविशेषण हैं जो किसी भी स्थिति में विकार ग्रहण नहीं करते । वास्तव में ‘आ’ से अन्त होने वाले क्रियाविशेषण शब्दों के अतिरिक्त शेष सभी प्रकार के क्रियाविशेषण अविकारी होते हैं और सही शब्दों में वे अव्यय हैं। इयां, जियां, कियां आदि शब्द ‘आ’ से अन्त होने वाले नहीं हैं, अनुस्वार से अन्त होने वाले हैं। इसलिए ये भी अविकारी हैं- इयां कियां किता हूँ ए कम्म ‘ऐसा कैसा किया तूने यह काम’, इयां कियां किते ते ए कम्म ‘ऐसे कैसे किए तूने ये काम’, इयां कियां सुटी तें अपणी कताब “ऐसी कैसी फेंकी तूने अपनी पुस्तक’ आदि। 

  1. सम्बंधबोधक

           वे अव्यय जो संज्ञा अथवा सर्वनाम के साथ जुड़कर वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उसका सम्बंध स्थापित करते हैं, सम्बंधबोधक कहलाते हैं, जैसे –

           तक – तईं, ताईं, तिकर

          बिना – बाझी, बगैर, घटी

          साथ – सणे, समेत, साथ, साथी, साउगी, सोंगै, सौगी, सौगला, कन्ने, लाइया

          सदृश – सेंई, साही, सांही, ढेई, बराबर, बरोबर

          आगे – अग्गे, आगे, गांह

          बाद में – भीरी, फिर, फिरी, तां

         ऊपर – प्रवाल्हे, प्राले, उप्पर, उबे

         पास – कछे, गच्छे, नेड़े, बाहर, अन्दर, दूर, भीतर, उआर-पार। कुछ प्रयोग द्रष्टव्य हैं –

आगे न रोटी खाई भीरी पाणी पीऊ (कु०)               ‘पहले रोटी खाई बाद में पानी पीया’

तुद्ध बाझी ए काम कियां हुणा (मं०)                        ‘तेरे बिना यह काम कैसे होगा’

रामे सौगी सीता बी बणे जो गई (मं०)                     ‘राम के साथ सीता भी वन को गई’

तुहे एह कोटलु गच्छ बशां कर (चं०)                      ‘आप इस चबूतरे के पास आराम करें

           सम्बंधबोधक शब्द यद्यपि अव्यय हैं और वे कोई विकार ग्रहण नहीं करते, परन्तु इनकी अपनी प्रवृत्ति और प्रकृति है जिनके आधार पर इन्हें निम्नलिखित दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है –

                   (1) कारक या विभक्ति सहित

                   (2) बिना कारक या विभक्ति-रहित | 

                   (1) कारक या विभक्ति-सहित सम्बंधबोधक : सम्बंधबोधक वास्तव में सम्बंधकारक से सम्बंधित हैं। इसलिए ये मूलतः सम्बंधकारक के प्रत्ययों का-के की या रा-रे-री या णा-णे-णी के सहयोग से ही अभिव्यक्त होते हैं। प्रकृति की * दृष्टि से ये पुनः दो उपश्रेणियों में विभाजित किए जा सकते हैं–

                  (क) जो प्रकृति में पुंल्लिंग बहुवचन हैं तथा अपने साथ सम्बंधकारक के बहुवचन सूचक प्रत्यय अर्थात् के, रे, णे का योग रखते हैं, यथा- मेरा खेतर घरा रे नेड़े ई ए, सीता रे अग्गे राम थे, तेसरे प्रवाल्हे हिंऊं था उसके ऊपर बर्फ था’ आदि वाक्यों में नेड़े, अग्गे, प्रवाल्हे सम्बंधसूचक शब्द पुंल्लिंग बहुवचन हैं  क्योंकि इनसे पहले ‘रे’ प्रत्यय लगा है।

                  कुछ सम्बंधसूचक अव्यययों के साथ ‘२’ के स्थान पर अपादान का प्रत्यय ‘ते, थे या दो’ आदि का प्रयोग मिलता है, परन्तु अर्थ में कोई भेद नहीं होता, यथाघरे ते बाहर जा, तेस थे ता ए काम नी हुणा, सै सभ दो आगे थिया आदि।

                (ख) जो स्त्रीलिंग-एकवचन हैं तथा सम्बंधकारक का एकवचन-स्त्रीलिंग सूचक प्रत्यय की, री, णी के साथ अभिव्यक्त होते हैं, तेरी खातर खाणा बताया, छोटुआ री ताईं बस्ता लई आ, तिसरी बदौलत हाऊं खुश हा, राणा री भांति वीर बणा आदि वाक्यों में खातर, ताईं, बदौलत, भांति सम्बंधबोधक शब्द स्त्रीलिंग हैं।

             (2) बिना कारक या विभक्ति-रहित सम्बंधबोधक : अनेक सम्बंधबोधक शब्द कर्ता, कर्म और क्रिया के साथ सीधा सम्बंध स्थापित करते हैं, उन्हें सम्बंध या सम्प्रदानकारक के प्रत्ययों की आवश्यकता नहीं पड़ती। नदी उआर घर मेरा सजना नदी पार घर तेरा हो, गांधी साही सच्चे माण्डु चाहिदे, बूटा ढेंई लोमा हुआ तू ता ‘वृक्ष जैसा लंबा हो गया तू तो’, धने बाझी गजारा नी हुंदा आदि वाक्यों में उआर, पार, साही, ढेई, बाझी कारक प्रत्यय रहित सम्बंधसूचक शब्द हैं। जो, खेॅ, बेॅ, सौगी, कन्ने, दो, दु, दा, ते, थे आदि कारकीय प्रत्यय मूल रूप से सम्बंधबोधक हैं जो सभी विभक्तिरहित सम्बंधसूचक शब्द माने जाते हैं।

         यह ध्यातव्य है कि अनेक शब्द ऐसे हैं जो क्रियाविशेषण भी हैं और सम्बंधबोधक भी। आगे, पीछे, उआर, पार, पहले, उप्पर, पांधे, बुन्ह, थल्ले, नेड़े आदि अनेक शब्द ऐसे हैं जो स्थानवाचक, समयवाचक क्रियाविशेषण भी हैं और सम्बंधबोधक भी हैं। वास्तव में वाक्य विशेष में इनका प्रयोग या इनकी स्थिति ही निर्णायक है कि उस वाक्य में ऐसा शब्द-विशेष क्रियाविशेषण है अथवा सम्बंधबोधक। यदि ऐसा शब्द किसी क्रिया की विशेषता दर्शाता हो तो वह क्रियाविशेषण है। इसके विपरीत यदि वह संज्ञा और क्रिया के बीच सम्पर्क स्थापित करता है तो वह सम्बंधबोधक है –

क्रियाविशेषण                                      सम्बंधबोधक 

कुण पहले आया                                  तिस ते पहले कोई नी आया था 

ते सौगी-सौगी चलदे रहे                          तिन्हां सौगी होर कुण था?

से आगे चलया हाऊं पीछे                       मेरे आगे से था, मेरे पीछे कोई नी था 

3.समुच्चयबोधक

         वे अव्यय शब्द जो दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को परस्पर जोड़े, समुच्चयबोधक कहलाते हैं, जैसे

अगर, जे, जेबे, जे, जेकर-जेकरी, पर, जेणी ‘यानी कि’, ज्याणी, अजेः, अते, होर, और, कन्ने, ते, ज्यां, या, जिआं-तिआं, तौंई, अपण, पर, अण, पोर, अपर, अपणता, जेबेॅ, जां, जाहलू , जहणे, जौबेॅ, या, बीणी, चाहे, जां, के, नीता, नईंता, नत, नां ता, नी तो, यदि, जे….. तां, जेबा ‘यदि’, जेबेॅ…. तेबेॅ।

                 पहाड़ी भाषा के समुच्चयबोधक शब्दों को निम्नलिखित रूप से श्रेणीबद्ध किया जा सकता है-

              (1) संयोजक समुच्चयबोधक : ये ऐसे शब्द हैं जो दो या दो से अधिक शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ते हैं, जैसे- अर, ता, कने, होर शब्द मूल रूप से हिन्दी और, तथा, व का अर्थ देते हैं- राम ता मोहन, तू कने मैं, नाना अर नानी। ‘होर’ शब्द ‘अन्य’ का भी पर्यायवाची है- तेरे कन्ने होर कुण हा ‘तेरे साथ अन्य कौन है’। इस दिशा में दूसरे शब्द इसके सहयोगी नहीं हैं, अन्यथा ये सभी शब्द पर्यायवाची हैं और एक दूसरे का स्थान ले सकते हैं। ‘भी’ का पहाड़ी रूप ‘बी’ है। इसका बहुधा दोहरा प्रयोग होता है- कम्म बी मुकया संझ बी हुई; एकल प्रयोग भी होता है- रोटी खा, पाणी बी पी; दूसरे संयोजक शब्दों के साथ मिलकर भी इसका प्रयोग होता है- तू होर बी मेहनत कर, फेरी बी ते ओही कम्म कित्ताः इन दो वाक्यों में यह ‘होर’ तथा फेरी ‘फिर’ अन्य संयोजकों के साथ प्रयुक्त हुआ।

              (2) विरोध-सूचक : ये दो उप-वाक्यों को जोड़ कर पूरा वाक्य बनाते हैं। इनमें से एक उप-वाक्य प्रायः दूसरे पर निर्भर होता है। पहाड़ी में केवल एक ही विरोध-सूचक शब्द है ‘पर’ अथवा ‘अपर’ जो हिन्दी-उर्दू के परन्तु, किन्तु, लेकिन, मगर, अपितु, बल्कि आदि अनेक शब्दों का काम देता है- भतेरा बोलेया पर से नी मनेया; किती ता बड़ी कोस्त थी, अपर कम्म नी बणेया आदि।

             (3) विकल्पात्मक समुच्चयबोधक : इस प्रकार के शब्दों द्वारा विवेक, पसंद या विकल्प की भावना अभिव्यक्त होती है। हिन्दी के ‘या’ (अथवा) शब्द का पहाड़ी में आम प्रचलन हो गया है, यों इसका पहाड़ी रूप ‘जा’ का प्रयोग भी सभी क्षेत्रों में मिलता है- ए काम या तू कर जा हाऊं करूं, पत्र जा तू लिख जा हाऊं लिखु आदि। ‘की’, ‘कीता’, ‘कीता…. नीता’ आदि शब्दों द्वारा भी विकल्प दर्शाया जाता है- ए कोम तौ केरनी की बूं केरना ‘यह काम तू करेगा या मैं करूं’, तू कीता पढ़ नीता सो ‘तू या तो पढ़ नहीं तो सो जा’। ‘नी ता’ मूल रूप में क्रियाविशेषण है परन्तु यह अधिकतः विकल्पात्मक समुच्चयबोधक के रूप में प्रयोग में आता है- तू जाणा ता जा नी ता हाऊं जाहां। इस श्रेणी का ‘भाएं’ अव्यय बहुप्रचलित है। यह हिन्दी ‘चाहे’ शब्द का पर्यायवाची है- मिंजो भाएं पैसे दो भाएं कताब दो, भाएं किछ होइ जाए मैं उत्थु जाणा ही जाणा। | 

             (4) संकेतवाचक : संकेतवाचक अव्यय में शर्त, प्रतिबंध, संकेत, अपेक्षा आदि की भावना रहती है। पहाड़ी में ‘जे’ शब्द हिन्दी ‘यदि’ का समकक्ष है- जे तू मेहनत करगा तां तू पास होई जाणा। ‘जे’ के साथ ‘ता’ का संयुक्त रूप भी प्रचलित है- जेता जाणा ता जाई आ । अनेक बार यह दो उप-वाक्यों में प्रयुक्त होकर पूर्ण वाक्य बनाते हैं- जे एढ़ा बोलां ता हाऊं नी जांदा, ज़े राम हुआ ता दुआई मत खांदा, जे पाप करगा तो नरके च जांगा आदि। ‘यदि’ का भाव दर्शाता दूसरा . शब्द ‘जेकर’ है- जेकर तू समय पुर आया तो कम्म बणी जाणा।

             (5) उद्देश्यवाचक : उद्देश्यवाचक समुच्चयबोधक प्राय: दो उप-वाक्यों को मिलाते हैं। दूसरा उपवाक्य प्रायः पहले उप-वाक्य के उद्देश्य को स्पष्ट कर देता है। पहाड़ी का प्रमुख उद्देश्यवाचक अव्यय ‘तांजे’ है जो हिन्दी शब्द ‘ताकि’ का समानार्थक है। तौले-तौले चल तांजे बरखा न आई जाए; जबरा लाठी लई ने चलदा हा, तांजे गिरी न पौए। ‘तांजे’ शब्द न केवल ‘ताकि’ का पर्यायवाची है बल्कि यह “ऐसा न हो कि’ का भी अर्थ देता है, परन्तु जहां हिन्दी का वाक्यांश नकारात्मक है। पहाड़ी में यह भावना उप-वाक्य में ही स्पष्ट होती है।

             ‘ता’ और ‘तां’ पीछे कई बार प्रयोग में आए हैं। इनका भाव और अर्थ स्पष्ट हो जाना चाहिए। ‘ता’ का मूल अर्थ ‘तो’ है। इस अर्थ में यह विकल्पात्मक और संकेतात्मक दोनों समुच्चयबोधों का शब्द है। इसी अर्थ में यह ‘की’ तथा ‘नी’ के साथ जुड़ता है- की ता > या तो, नी ती > नहीं तो। ‘तां’ का मूल अर्थ ‘तब’ हैतां ताईं > तब तक। इस दृष्टि से ‘तां’ कालवाचक क्रियाविशेषण है। ‘जे’ का अर्थ ‘कि’ भी है यथा- तिने गलाया जे से कल घर नी हुंगा। अतः तांजे का भाव ‘तबकि’ > ताकि हुआ।

              उक्त विवेचन इसलिए किया गया क्योंकि उद्देश्यवाचक समुच्चयबोधक का दूसरा अव्यय कैंहजे है जो तांजे के समकक्ष है। तिने खूब परिश्रम कित्ता कँहजे से इनाम लेणा चाहंदा ए। ‘कैंह’ या ‘क्यों’ शब्द का अर्थ ‘किस लिए है। इस दृष्टि से ‘कैंह’ अव्यय रीतिवाचक क्रियाविशेषण है; परन्तु जब ‘कैंह’ के साथ ‘जे’ या ‘क्यों’ के साथ ‘कि’ जोड़ा जाए तो कैंहजे’ या ‘क्योंकि’ का अर्थ ‘इसलिए’ हो जाता है और उस स्थिति में ‘कैंहजे’ उद्देश्यवाचक समुच्चयबोधक है- रौं घरे अंदर कैंह थुकया? कैंहजे ए मेरा घर हा अर्थात् ‘तूने घर के अन्दर क्यों थूका? इसलिए कि यह मेरा घर है।’ इस स्थिति में कैंहजे का भाव इस उद्देश्य से है- सारा सामान सांभी ने लेई चला कैंहजे सांजो दोबारा न आणा पए। 

 

4.विस्मयादिबोधक

            जिनसे विस्मय, भय, शोक, क्रोध, स्वीकृति, घृणा आदि प्रकट हो, वे विस्मयादिबोधक कहे जाते हैं, जैसे –

          अरे, हरे, अहा, आहा, उश्श, वाह, बल्ले, बा, हाय, हाई, हा, ओहो, बलै-बलै, हाकटे, औ, हो, ओहो, हैं, क्या, हला।

         विस्मयादिबोधक ऐसे शब्द होते हैं जिनका किसी वाक्य के किसी शब्द के साथ वैयाकरणिक सम्बंध नहीं होता। वाक्य के साथ वे केवल भावना से जुड़े होते हैं तथा मूल में ये वक्ता की भावना, आवेग तथा विचारों का प्रतिपादन करते हैं। किसी दुखद घटना से क्षुब्ध या हर्षप्रद घटना से प्रफुल्लित हृदय से जो अकस्मात् शब्द मुंह से निकलता है वह प्रायः विस्मय उत्पन्न करता है और उसी अर्थ का द्योतक होता है। पहाड़ों में बिना मुंह खोले एक ही ध्वनि ‘हूँ’ के माध्यम से कहने वाला अनेकों भाव प्रकट कर देता है। मुख से निकली हुई वह ध्वनि उसके भावों की अभिव्यक्ति करती है। उसी से क्रोध, प्रसन्नता, स्वीकृति, हां, ना, घुड़की और धमकी देता है। पहाड़ी में प्रयुक्त कुछ विस्मयादिबोधक अव्ययों का विवरण नीचे प्रस्तुत किया जाता है –

(1) प्रसन्नता – आहिला बोआह भई बोआह ‘वाह भई वाह’, शाबशीए, हा कटे, मेरी मौज़ीए, धन मेरीए कमाईए, मौज़ा मार ‘अच्छी कमाई हुई, मज़ा ले’। 

(2) विस्मय – हला! एढ़ी गले ही ऐसी बात है’, अरे ! अज्ज इदी कियां टपके ‘आज यहां कैसे पधारे’ तुम्हें तो हैराण करा! 

(3) घृणा – छि-छि मुआ, तेरा ऐ नुहार, परां हट, थुह, फिट्टे मुंह। 

(4) हर्ष – बाह-बाई-बाह, धन्नै, बलै-बलै, क्या मौज लाई आरा, साबासिया। 

(5) शोक – आया देइया ‘हाए दया’, हाए-माए, हाए बो मेरी जिंदड़ीए, हाये, राम! राम! नर्थ हुआ, गजब होई गया। 

(6) स्वीकृति – हां, ठीक, हां-हां, कैहनी, ठीक ओंसों, खरा ता, ज़रूर, होरका, होडै। 

(7) पीड़ा सूचक – आइया बाबुआ, आइया आमा, आइयो-देइया। 

(8) संबोधन – इसके अनेक रूप हैं। हम उम्र के बीच पुरुष के लिए ‘अड़ेया’ और स्त्री के लिए ‘अड़िए’ कांगड़ा क्षेत्र के आम प्रचलित सम्बोधन हैं। कुल्लू क्षेत्र में इनके लिए क्रमशः ‘एई’ और ‘एऊ’ शब्दों का प्रयोग होता है। अपने से बड़ों को ‘जी’ का प्रयोग होता है। बहू प्रायः सास को ‘क्या जी, ओ जी, नी जी’ द्वारा पुकारती या उत्तर देती है। सास-ससुर अपनी बहू को ‘क्या बो लाड़ीए’ कह कर पुकारते हैं। अपने से छोटों के लिए ‘ओए’, ‘हल्ला’, ‘अबो’, ‘बो’ शब्दों का प्रायः प्रयोग होता है। ‘अरे’ अव्यये प्रायः वाक्य के आरम्भ में आता है- अरे! कुण, हा, अरे! गल सुन जा। स्त्री की स्थिति में अरे प्रायः ‘अरी’ में बदल जाता है- अरी! कुथु चली? इनके विपरीत ‘रे’ या ‘डे’ वाक्य के अन्त में बोले जाते हैं। कोथे चला, रे!, कौथी, ऐं।।

   महासु और सिरमौर क्षेत्रों में युद्ध लोक-नाट्य ‘ठोडा’ खेलते हुए अनेक प्रकार के सम्बोधन सुनने में आते हैं। ठोडा मैदान की प्रशंसा में ‘ए’ का प्रयोग होता है- ‘फूले मेरीए जुबड़ीए, सूईने रे फूले’। इसी तरह ‘शाठी रा खेलटू पाशी री मोड़ी मेरीए’। अपने प्रतिद्वंद्वी को पुकारता हुआ खिलाड़ी आह्वान करता है ‘अट्टे मेरेया ठोडया…. गुरु पूजा मेरेया तेरों जुबड़ी दा; शीगु लाई थोई पाशड़ा, मूंखें सुथिणों थोड़े मालवे के …. हो …. हो …. हो; शिगड़े आओ माण्छो चोंऊ गभरू, चोऊ पटराले, कॉउड़ देखदे …. हो …. हो…. हो । प्रदेश में इस तरह के अनेक अवसर आत है जब अनेक तरह की विस्मयादिबोधक ललकारें और पुकारें सुनने को मिलती हैं।

         इसी तरह अनेक अनुकरण-सूचक विस्मयादिबोधक हर क्षेत्र में अपनी प्रकृति-प्रवृत्ति अनुसार प्रयोग में आते हैं, यथा- बड़-बड़, थौप-धौप, धप-धप, कड़कड़, धाएं-धाएं, भौं-भौं आदि।

         यह उल्लेखनीय है कि भिन्न प्रकार के विस्मयादिबोधक अव्यय ठीक उन्हीं भावनाओं को नहीं दर्शाते जिनके प्रति इनको दिखाया गया है। एक ही अव्यय एक से अधिक भावना के लिए प्रयुक्त हो सकता है। उदाहरणार्थ ‘छि-छि’ घृणा, तिरस्कार, करुणा, दया आदि अभिव्यक्तियां दर्शाता है। इसी तरह ‘राम राम’ न केवल शोक दर्शाता है, अपितु पीड़ा, करुणा, दुख, हताश होने की भी अभिव्यक्ति करता है। ऊपर ‘अरे, र’ आदि अव्यय सम्बोधन के लिए दिखाए गए हैं। परन्तु ये अनेक अन्य भावनाओं से भी जुड़े हैं, यथा- अरे ! ए की होया (विस्मय), अरे! जा तू कुण हा (क्रोध), अरे! परे हट्ट (तिरस्कार), अरे! से तो आई बी गया (सावधान) आदि।

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