विशेषण

जो शब्द संज्ञा की विशेषता बतलाएं उन्हें विशेषण कहते हैं। पहाड़ी में चार प्रकार के विशेषण होते हैं-

  1. गुणवाचक
  2. संख्या वाचक
  3. परिमाण वाचक
  4. सार्वनामिक विशेषण   

1.गुणवाचक विशेषण

ये विशेषण संज्ञा या सर्वनामों की विशेषता या गुण दिखाते हैं। ये छह । प्रकार के होते हैं-

(1) कालवाचक : जो काल या समय दर्शित करते हैं, जैसे- अबका, कदका, कधाड़का, अजका, फौरज़का, कलका, कदूंदा, जदूंदा, ताहलूदा, इभका, नपरारका, काहलका, ताहलका, पेहलका, पौरका, परारका, संझका, पंजौथेरा, एजका, कले़लेरा ‘शाम का’, पाछ़का ‘प्राचीन समय का’, जध्याड़का, रातका, तड़केदा, भ्याकणा, परोका, हैकी कल की’, हिज़का, दोथका ‘सुबह का’, सोंझका, ब्यालका, एशका, रातीदा, परसोका, चौथका, चनाहरका, तरकालारा, ध्याड़का, झीशका, कलारीरा, बतौहरीरा, परारकेरा, भौलखीरा, हुणेदा आदि, प्रयोग –

ए रोटी हैकी हा (चं०)                               ‘यह रोटी कल की है’

कलेदा छोहरू गलां बनांदा एँ (ह०)          ‘कल का छोकरा बातें बनाता है’

सोंझ़का गाश सोंझका पाहुणा जांदे           ‘शाम की वर्षा, शाम का मेहमान जाते

नी (कु०-लो०)                                          नहीं’

परका गईरा अजें नी आया (कह०)          पिछले वर्ष का गया हुआ अभी नहीं आया’

परारेदा गुआचेया अजे तक नी                  ‘पिछले से पिछले वर्ष का गुम हुआ

आया (कां०)                                             अभी तक नहीं आया’

झीशों रा डेओदा एबी ताईं नी                    ‘सबेरे का गया अभी नहीं आया’

आजा (महा०)

संझका पराउणा, सनीचरी बरखा, लगी     ‘शाम का मेहमान, शनिवार की वर्षा

पौआ सेवा, चुकी देओ चरखा (लो०)          की सेवा में लगो चरखा उठा दो’

यह उल्लेखनीय है कि कालवाचक क्रियाविशेषण संज्ञा शब्दों में ‘का’ प्रत्यय जोड़ने से प्रायः कालवाचक विशेषण बनते हैं, जैसे ‘अज’ क्रियाविशेषण है और उसमें ‘का’ लगाने से ‘अजका’ कालवाचक विशेषण बना। इसी तरह हिज (सं० ह्यस) से हिजका ‘पिछले दिन का’, कद से कदका ‘कब का’, संझ से संझका ‘सायं का’ आदि। यहां ‘का’ शब्द कालवाचक विशेषण का प्रत्यय है और क्योंकि यह आकारान्त है इसलिए विशेष्य शब्द के लिंग और वचन के आधार पर इसमें विकार आता है, यथा- संझका पराउणा, संझके पराउणे, संझकी पराउणी आदि। यहां ‘का’ शब्द संस्कृत ‘काल’ (समय) से व्युत्पन्न हुआ है- सं० काल > काल – काअ > का। जहां ‘का’ प्रत्यय का प्रयोग नहीं होता वहां सम्बंधकारक के प्रत्यय रा-रे-री या दा-दे-दी के योग से इस विशेषण की अभिव्यक्ति होती हैकलेदा छोहरू-कले दे छोहरे- कले दी छोहरी। इसी तरह झीशोरा, सोंझारा आदि। ऐसी अवस्था में मूल शब्द विकारी रूप धारण करते हैं। कालवाचक विशेषण दोनों रूप से प्रचलित हैं- ‘संझ’ से ‘का’ प्रत्यय लगाकर ‘संझका’, तथा ‘रा’ प्रत्यय लगाने से ‘संझ’ का विकारी रूप ‘संझे’ तथा ‘संझेरा’ आदि।

(2) स्थानवाचक : ये विशेषण स्थान का बोध कराते हैं, जैसेबाहरला, अन्दरला, बुन्हला, हेठला, झिकला ‘नीचे का’, ऊपरला, बिचला, मंझाटला ‘बीच का’, गभला ‘बीच का’, मंझाटरा ‘बीच का’, नेडारा, दूरारा, परदेशारा, गासला ‘ऊपर का’, उआरला, पारला, थलेदा, सामणेदा, औखला, तौखला, पिच्छेरा।

उदाहरण –

बाहरला दरुआज़ा हुड़ (कु०)                            ‘बाहर का दरवाज़ा बंद कर’

बुन्हला गांव पुरोहतारा हा (कह०)                      ‘नीचे का गांव पुरोहितों का है’

मंझली कुड़ी मती लायक ऍ (कां०)                    ‘बीच की लड़की बहुत लायक है’

यहां स्थानवाचक विशेषण का प्रत्यय प्रमुखतः ‘ला’ है, जो संस्कृत ‘लग्’ का विकसित रूप है जिसका एक अर्थ सम्बद्ध करना’ है। किसी स्थान से सम्बंधित करने के कारण यह स्थानवाचक विशेषण के लिए ‘ला’ प्रत्यय के रूप में प्रयुक्त होता है. जैसे ‘बुन्ह’ से बुन्हला। यह भी लिंग, वचन के आधार पर ला-ले-ली में बदल जाता है- मंझला कमरा, मंझली मंजिल, मंझले खेतर, हेठला ग्रां, हेठले कमरे, देठती बस्ती आदि। स्थानवाचक विशेषण भी प्रमुखतः स्थानवाचक क्रियाविशेषण से बनते हैं।

(3) आकार वाचक : जिनसे आकार का ज्ञान होता है, जैसे – सांगड़ा, चौड़ा, न्हीठा, चकूणा, चौरस, त्रिकूणा, घरोटली, चूंचरा, फिचना ‘चपटा’, फित्था, फनेकड़ा, गोल, बाकला ‘मोटा’, लम्मा, निक्का, बड्डा आदि।

गोल दायरे च बैठो (कां०)                                       ‘गोल दायरे में बैठो’

फित्थे नक कन्ने निक्की अक्खां वाल़ा                       ‘चपटे नाक व छोटी आंखों वाला कौन

कुण था (कां०)                                                       था

सांगड़े पुले पर पार लंगणा कठण हा                       ‘तंग पुल पर पार चलना कठिन है’

(4) वर्णवाचक : जो रंग के द्योतक हों, जैसे- काला, गोरा, पीउंला, चिट्टा, शेता, हरा, कोहड़ा ‘भूरा’, नीला, लाल, धूड़ा, धूईंशलू, धुम्र, समानी, जामणी, संतरी, कासणी, धौला, हरमुंजी, सुआ, भूषला आदि। कासणी दपट्टा मनें मोही लेंदा (कां०) ‘हलके गुलाबी रंग का दुपट्टा मन मोह लेता है’

  (5) दशावाचक : जो दशा या स्थिति बताए, जैसे- नमौलु ‘बिना मालिक का’, नर्म, करड़ा, सिन्ना ‘गीला’, शुक्का, सेठ, गरीब, चीशा, भूखा, नरोगा, खापरा, कुंगला ‘बहुत नर्म’, कौचला ‘नर्म’, करडा, जिरड़ा ‘सख्त’, कुराड़ा ‘फल आदि  सख्त’, पोलो ‘खोखला’ आदि।

बुढ़ा बड़ा जिरड़ा ऍ (कां०)                                      ‘बूढ़ा बड़ा सख्त है’

खीरा बडा कराडा ऍ (कां०)                                   ‘खीरा बडा सख्त है’

काणी देवी काणा पजियारा जिसें                            ‘अंधी देवी अंधा पुजारी जिधर जाए

जाणा तिसेॅ निहारा (कु०-लो०)                                उधर अंधेरा’

काणा मूशा पोलो धान (महा०-लो०)                     ‘अंधा चूहा थोथा धान’

(6) गुणवाचक : जो संज्ञा या सर्वनाम के गुण व्यक्त करें, जैसे- भला, खरा, बुरा, अठरा, चंदरा, चोखा, छैल, बांका, पांपा ‘प्यारा’, सलोंका ‘सभ्य’, . बढ़िया, बांठ-बांठण, बांठिया-बांठड़ा ‘सुन्दर’, तरयाया ‘प्यासा’, सुःणा ‘अच्छा’, सनौखा, कोरा ‘नया’ आदि, प्रयोग

तरयाया माण्हु सई नी सकदा (कह०)                      ‘प्यासा आदमी सो नहीं सकता’

मौस्तो री छेउड़ो बिगओ सनौखी                             ‘मस्तु की पत्नी बहुत सुन्दर/चतुर है’

ओॅसो (महा०)

ए कोरा घड़ा एँ                                                       ‘यह नया घड़ा है’

  1. संख्यावाचक विशेषण

जो विशेषण व्यक्ति अथवा वस्तु की संख्या सम्बंधी विशेषताएं बतला संख्यावाचक विशेषण कहे जाते हैं, इन विशेषणों को मुख्यतः दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है –

(1) निश्चित संख्यावाचक

(2) अनिश्चित संख्यावाचक

     (1) निश्चित संख्यावाचक विशेषण : जिनसे निश्चित संख्या का बोध होता है। इसके चार भेद होते हैं- गणनावाचक, क्रमवाचक, आवृत्तिवाचक तथा समुदायवाचक।

 (क) गणनावाचक : इसके दो उपभेद हैं – पूर्णांकवाचक तथा अपूर्णांकवाचक।

  (i) पूर्णांकवाचक : जैसे- इक-एक, दो-दूई, चीन-चौन-चीई-त्राई, चऊ-चाउ, छौ, अट्ठ, नौ, दस-दश, पन्दरा, सोला, सौ-शौ, हज़ार-ज़्हार, लाख, करोड़, अरब, खरब आदि।

इक थुको हिक सुको सौ थुकन तला                                           ‘एक थूकेगा, हृदय सूख जाएगा, सौ

भरी हुन्दा (लो०)                                                                        थूकेंगे ताल भर जाता है’

एक एखोली, दूई रो साथ, चीई रे                                              “एक अकेला, दो का साथ, तीन में

चौकड़े, चाउरी जमात (लो०)                                                    आशंका, चार की श्रेणी होती है’

चऊ ठिण्डे डेरा, एकसिए छेवड़ीए                                            चार मरदों का डेरा (ही रहेगा), एक

बसेरा (लो०)                                                                            स्त्री से बसेरा (घर) बस जाएगा’

दसे बुद्धिये ताणो-ताणे इको बुद्धिये                                          ‘दस विवेक हों तो मतभेद रहेगा, एक

बचन प्राणे (लो०)                                                                    विवेक से स्थिर वचन होंगे अर्थात्

अस्थिर बुद्धि से अनेक उलझनें पैदा

होती हैं’

दसां रे डण्डे इकी रा भार, चौंह                                               ‘दस के डण्डे और एक का भार, चार

चौकड़ेंया दित्ती मार (लो०)                                                      व्यक्ति किसी को भी हरा सकते हैं।

अर्थात् एकता में बल है’

चन्दरे रे पन्दरा भोले रे सोला (लो०)                                        ‘चालाकों की पन्द्रह और भोले की

सोलह अर्थात् भगवान् चालाकों की

मदद नहीं करता’

नौ मण रिझे पहियां, सौ मण ननिहाल,                                   ‘अपने सगे सम्बंधियों के घर में चाहे

अपणे घरें नी होए तां चौहीं पासेयां काल                                 कितना भी धन क्यों न हो पर यदि

अपने घर में कुछ न हो तो कोई नहीं

देता, तब चारों दिशाओं में अकाल ही

दिखाई पड़ता है’

 (ii) अपूर्णांकवाचक : जैसे- अधा-अद्धा-औधा, देउड़-देढ, ढाई, पौणा, पा-पौ-पउआ-पाव, स्वाया-सवा आदि।

मूल रोग मूली, अद्धा रोग खट्टा, सेर                                          ‘मूली, खट्टा, ककड़ी एवं बैंगन स्वास्थ्य

रोग काकड़ी, पाव रोग भट्ठा (लो०)                                          के लिए हानिकारक हैं’

ढाई टोटरू मियां बागें (लो०)                                                 ‘घर में चाहे कुछ न हो मियां बाग की

बात करता है’

सेर नी स्वायी मैं तेरी दाई (लो०)                                             ‘मेरा तेरे से कोई रिश्ता नहीं, फिर भी

दाई का रिश्ता दिखाती है’

यह उल्लेखनीय है कि निश्चित संख्यावाचक विशेषण अपने कर्ताकारकअविभक्ति रूप में मूल स्थिति में रहते हैं, उनमें कोई विकार नहीं आता- एक ठिण्ड, अट्ठ पूर्वीए, नौ मण आदि। परन्तु कारकीय स्थिति में वे अपने विशेष्य के अनुकूल रूप बदलते हैं- एकसिए छेवड़ीए ‘एक छेवड़ी से’, दसे बुद्धिये ‘दस बुद्धियों द्वारा’, दसां रे डंडे ‘दस के डंडे’ आदि। इस तरह पहाड़ी में हिन्दी से भिन्न स्थिति है। हिन्दी में संख्यावाचक विशेषण में विकार नहीं आता। अनेक बार ‘विशेष्य’ शब्द गुप्त होता है, मात्र वाक्य से उसकी उपस्थिति प्रकट होती है, यथादसां रे डंडे का भाव है ‘दस (आदमियों) के डंडे,’ चंदरे रे पंदरा भोले रे सोला वाक्य में ‘चन्दरे’ और ‘भोले’ विशेषण किन्हीं व्यक्तियों की विशेषता बता रहे हैं जो वाक्य में अनुपस्थित हैं। शिमला क्षेत्र की एक लोकोक्ति का विश्लेषण करना उचित रहेगा –

ओ री चानमानणीए!

का बोलो महाराज?

सातोॅ सिहो रोज़ खाओ थिए,

एकी सिहे क्या क़ौरी आज।

यहां सातोॅ सिहो’ का हिन्दी रूप ‘सात शेरों (को)’ है। ‘सात’ संख्यावाचक शब्द ‘सातोॅ’ में बदला। अन्य बोलियों में यह ‘साता’ रूप है, महासुई में अन्तिम ‘आ’ प्रत्यय ‘ओॅ’ में बदलता है। ‘एक शेर’ भी महासुई में ‘एकी शेर’ हुआ। पहाड़ी में पूर्णांक संख्यावाचक एक से तीन तक शब्द विकार में ईकारान्त हो जाते हैं, एक से एकी, दो से दूई, त्रा से त्राई (या चीई)। तत्पश्चात् अंकों का विकारी रूपमा में ‘आ’ जोड़ने से बनता है- चार से चारा, पंज से पंजा, छे से छेआ आदि. या नोटी एकी आदमीए बरोली ले जाओ ‘एक जोड़ी आदमी बरोली को जाए’ (चैती लोक गीत में), दुई रो साथ, चीई रे चौकड़े, दसा री लकड़ी एकी रा बोझ आदि।

  (ख) क्रमवाचक : पहला, दुजा-दुजौ-दुआ, त्रीया-तिजा-चिजो, चौथा पंजुआं, आठुआं, नौवां, बीहुआं आदि। क्रमवाचक संख्याएं प्रायः तीन प्रकार की होती हैं। (1) दो तथा तीन अंकों में ‘जा’ जुड़ता है- दूई से दुजा- दुजोॅ तथा ‘ज’ को श्रुति के कारण दुआ, त्राई से त्रिजा-तिजा-चिजो, (2) एक और चार अपवाद हैं. एक से पहला, चार से चौथा, (3) पांच और पांच से आगे ‘वां’ जोड़ने से क्रमांक बनते हैं। ‘वां’ श्रुति के कारण ‘उआं’ भी हो जाता है। ‘वां’ या ‘उआं’ विशेष्य के लिंग-वचन के आधार पर पुंल्लिंग बहुवचन में वें/उएं तथा स्त्रीलिंग में वीं/उईं रूप में बदल जाते हैं- अज ते सतवें ध्याड़े या सतवीं तिथि जो जरूर आनेयो।

तिजा रलेया ता घर गलेया (बघा०)                                         ‘तीसरा मिला तो घर उजड़ गया’

शाहुरा घोर चौथा जॉर (कु०)                                                 ‘ससुराल घर चौथे (दिन का) ज्वर’

  (ग) आवृत्तिवाचक : दूणा-दुगणा, तिगणा-त्रिगणा, चौगणा, नौ गुणा, दस गुणा, कोहरा-कूहरा, दोहरा-दुहरा, चौहरा, तरेहरा-त्रिहरा, दुपड़ौ, चिपड़ी आदि। संख्याओं का आवृत्तिवाचक रूप प्रायः गणनावाचक संख्याओं में ‘गुणा’ प्रत्यय जोड़ने से बनता है। एक से चार तक के शब्द ‘गुणा’ लगने से पहले कुछ विकार ग्रहण करते हैं, परन्तु उससे आगे के अंकों में कोई परिवर्तन नहीं आता। एक से चार तक की संख्याओं के आवृत्तिमूलक रूप ‘हरा’ प्रत्यय जोड़ने से भी बनते हैं, यथा-

अकुहरा धागा ले (चं०)                                       ‘इकहरा धागा लो’

दोहरी गोहरा आगे बेठादा थी (कु०)                    ‘जहां दो रास्ते हैं, के पास बैठा था’

 (घ) समुदायवाचक : दूहे, त्राहे, चारे, पांजे, छेहे, साते, औठेॅ, एकेॅ, पोंजें, सौतेॅ, दुइने, तिने (सि०), दुईं, तिऊ (बघा०) आदि।

(2) अनिश्चित संख्यावाचक विशेषणः जिनसे निश्चित संख्या का बोध नहीं होता, जैसे- किछ, किंएँ ‘कुछ’, बोहू, कुछ, धख, कम, ज़्यादा, थोड़ा, थोडु, होंखड़ो ‘बहुत थोड़ा’, चूंभर ‘थोड़ा सा’, मीक ‘तिलभर’, दूई-एक, त्राई-एक, चार-एक, दस-ग्यारह, दस-पन्द्रह , पौज़-छौह, ज़रा-एक, दणीक ‘थोड़ा सा’, तुर्णाक ‘थोड़ा सा’, बैज़ाए ‘बहुत सा’, भौरीक ‘भरा सा’, भौरी ‘बहुत’, मता सारा, उशीजे ‘थोड़ा सा’, धख ‘थोड़ा’ आदि।

धख घीऊ दे (महा०)                                                       ‘ज़रा सा घी दे’

हाॅखड़ोॅ मौ देओं                                                              ‘थोड़ा सा शहद दे दो’

मते-सारे लोग आए थे (कां०)                                           ‘बहुत सारे लोग आए थे’

किछ पीशण गीला किछ घोर्छ ढीला                               ‘कुछ आटा गीला कुछ घराट ढीला’

(कु०-लो०)

किंऍ कुणकेॅ शिलेॅ किंऍ घोॅ ठड़ू ढीलेॅ                                 ‘कुछ दाने गीले कुछ घराट ढीले’

(महा०-लो०)

धख हाण भाली लिंदे (चं०)                                               थोड़ी देर प्रतीक्षा कर लेते हैं’

अनिश्चित संख्यावाचक का प्रयोग उसी स्थिति में होता है जब पूरी संख्या या मात्रा ज्ञात न हो। धख, दर्णी, थोड़ाजें, कम, बोहु, किछ आदि शब्द इसी अनिश्चितता के द्योतक हैं। अनेक बार निश्चित संख्यावाचक से भी अनिश्चित संख्यावाचक शब्द बन जाते हैं। किसी निश्चित संख्या में ‘एक’ जोड़ने से यह भाव प्रकट होता है, यथा- चार-एक पुस्तकां मिंजो देआ, दस-एक माण्हू थिए .. आदि उदाहरणों में चार-एक’ या ‘दस-एक’ का भाव है चार के लग-भग, दस के आस-पास । इस तरह पूर्णांक में एक जोड़ने से अनिश्चित व्याख्या हो जाती है। कई बार एक-साथ के दो अंकों को साथ-साथ कहने से भी ऐसे अनिश्चित संख्यावाचक शब्द बन जाते हैं- ‘तेई आठ-नौ दिनां बाद एणा’ अर्थात् वह आठ-नौ दिनों के बाद आएगा।

  1. परिमाणवाचक विशेषण : –

जो विशेषण नाप, तोल, मात्रा का बोध कराएं, वे परिमाणवाचक कहलाते हैं। इन्हें भी निश्चित और अनिश्चित दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहाड़ी समाज में माप, तोल और मात्रा को दर्शाने के लिए अपने साधन रहे हैं और उन साधनों को प्रदर्शित करने के लिए अपने परिमाणवाचक विशेषण शब्द हैं। ये विशेषण शब्द तथा इनका नाप हिन्दी में प्रायः नहीं मिलता।

माप– पुराने समय में जब इंच, फुट, गज़ या मीट्रिक पैमाने नहीं थे, लोग सबसे छोटे माप को सूत कहते थे। एक धागे की जो मोटाई हो वह सूत होती थी। कुछ सूतों को जोड़ कर अगला माप आंगल कहलाता था, अर्थात् एक उंगली की चौड़ाई के बराबर नाप। जब यह नाप पांच उंगलियों के बराबर हो जाए तो उसे पैंदल कहते है। उससे अगली लंबाई गरेंठ कहलाती है जो अंगूठे के सिरे से तर्जनी के सिरे तक का माप है। गरेंठ से अधिक लम्बाई या चौड़ाई को बेंथ कहते हैं। इसका अन्तर कसकर चौड़े किए हाथ के अंगूठे के सिरे से लेकर कनिष्ठिका के सिरे तक का नाप है। अतिम लंबाई हाथ कहलाती है जिसका अन्तर कफोणि से लेकर मध्यमा के सिरे तक का होता है।

तोल-(1) छुरु भर अन्न के दाने =1½ तोला ।

(2) मुट्ठी भर अन्न। इसे दुकटू भी कहते हैं

(3) नोला़                         = एक अंजलि

(4) पत्था/पाथा                = लगभग 1½ किलो का वज़न; इसे लकड़ी

या धातु के बने पात्र से मापा जाता है जिसे

बसाजू कहते हैं –

(5) जूण या भार                  =   16 पत्थे

(6) खार या लाख                =   20 जूण

(7) खारशू                          =   20 खार

परिमाणवाचक विशेषण की दो श्रेणियां हैं-

(1) निश्चित परिमाणवाचक

(2) अनिश्चित परिमाणवाचक

   (1) निश्चित परिमाणवाचक विशेषण : जिससे निश्चित मात्रा अभिव्यक्त

हो, यथा- दस हाथ लंबा पट्टू, एक पैंदल चौड़ा, चार पत्था अन्न। इसी तरह –

मोण बासला खार बशार (लो०)                       ‘मन भर हींग खार भर हल्दी’

पाथोॅ पूरु चौलठो ओरु (लो०)                         ‘प्रस्थ भर उधर चार प्रस्थ अपनी ओर’

एवे लागणो पोतोॅ केती पाथोॅ रा                       अब लगेगा पता कितने पत्थे का होता

हुओॅ जून (लो०)                                              है जून अर्थात् ‘आटे दाल का भाव मालूम

होना’

पाथोॅ गो भोॅ रे शिए गो डोॅ रे                             ‘प्रस्थ भर तो दे दिया अब थोड़े और से

डर रहा है’

कोह चली नी, बाबा तिहाई                               ‘कोस भर चली नहीं और प्यास लग

गई’

(2) अनिश्चित परिमाणवाचक : जहां माप या तोल की मात्रा निश्चित नहीं होती है, जैसे- किछ किलो आम, बोहू मीटर कपड़ा, धिख ‘थोड़ा जैसा’ आटा, दुई-चार मीटर रॉशी, मूठेक ‘लगभग एक मुट्ठी भर’ दाणे देआ, थोड़ा होर दुध पिआ आदि।

(4) सार्वनामिक विशेषण

जो विशेषण सर्वनामों से बनते हैं, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। सर्वनाम सम्बंधी अध्याय में यह देखा जा चुका है कि कुछ सर्वनाम विशेषण का भी काम करते हैं। ए, से, जो, कुण मूल रूप में विशेषण हैं । जब वे स्वतंत्र हैं और किसी से संबंधित नहीं हैं तब वे सर्वनाम हैं, यथा– ए रोंदी रहंदी, से हसदा रहंदा, जो करणा कर लें, कुण रोंदा लगोरा। इन वाक्यों में ये सभी सर्वनाम हैं, क्योंकि इनका प्रयोग स्वतंत्र है। परन्तु जब ये किसी संज्ञा को निर्दिष्ट करते हैं तो . ये विशेषण रूप धारण करते हैं। ए कुड़ी भूखी ही, से मुण्डु शरारती हा, जो माण्हु कम नी करदा उसदी इजित नी हुंदी, कुण घड़ा खाली हा आदि वाक्यों में वही सर्वनाम विशेषण हैं। यहां ए, से, जो और कुण क्रमशः कुड़ी, मुण्डु, माण्हु तथा घड़ा संज्ञाओं की विशेषता दर्शा रहे हैं। इन्हें सार्वनामिक विशेषण या निर्देशक विशेषण कहते हैं।

ये चार (ए, से, जो, कुण) भूल सार्वनामिक विशेषण पुनः और प्रकार के सर्वनामीय विशेषण बनाते हैं:

(1) परिमाणवाचक : ये विशेषण विशेष्य वस्तु की मात्रा बताते हैं, अर्थात् थोड़ा या बहुत का भाव दर्शाते हैं, जैसे’

ए’ से (सि०) एतणा, (कु०) एतरा, शेष बोलियों में इतपा;

‘से’ से (सि०) तेतणा, (कु०) तेतरा, शेष बोलियों में तितणा;

‘जो’ से (सि०) जेतणा, (कु०) जेतरा, शेष जितणा;

‘कुण’ से (सि०) केतणा, (कु०.) केतरा, शेष कितणा।

    (2) प्रकारवाचकः विशेष्य किस प्रकार का है, कैसा रूप है, यह तथ्य इस विशेषण से प्रकट होता है, जैसे’-

ए’ से (सि०) इशा, (कु०) एण्डा, (महा०) एशो, (चं०) इदेहा, शेष एढ़ा;

‘से’ से (सि०) तिशा, (कु०) तेण्डा, (महा०) तेशो, (चं०) तदेहा, शेष तेढ़ा;

‘जो’ से (सि०) जिशा, (कु०) जेण्डा, (महा०) जेशो, (चं०) जदेहा, शेष जेढ़ा;

‘कुण’ से (सि०) किशा, (कु०) केण्डा, (महा०) केशो, (चं०) कदेहा, शेष केढ़ा;

(3) संख्यावाचक : ये संख्या के बारे में सूचना देते हैं’ –

ए’ से (सि०) एती, (कु०) एती, (महा०) एती, (चं०) एता;

“से’ से (सि०) तेती, (कु०) तेती, (महा०) तेती (चं०) तेता;

‘जो’ से (सि०) जेती, (कु०) जेती, (महा०) जेती, (चं०) जेता;

‘कुण’ से (सि०) केती, (कु०) केती, (महा०) केती, (चं०) केता;

(4) आकारवाचक : आकार से संबंधित है; इतना बड़ा, उतना बड़ा, जितना बड़ा, कितना बड़ा, कुलुई में इसके रूप इस प्रकार हैं- एबड़ा, तेबड़ा, जेबड़ा, केबड़ा।

विशेषणों की तुलनात्मक श्रेणियां

तुलना की दृष्टि से पहाड़ी भाषा के विशेषण हिन्दी के समान हैं, संस्कत या अंग्रेजी की तरह नहीं हैं। संस्कृत या अंग्रेजी में प्रत्ययों के सहयोग से विशेषण की स्थिति अभिव्यक्त होती है। हिन्दी या पहाड़ी में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं है। जब दो या अधिक व्यक्तियों, स्थितियों या वस्तुओं की तुलना की जाती है तो विशेषण की तीन श्रेणियां होती हैं –

(1) मूलावस्था, (2) उत्तरावस्था, (3) उत्तमावस्था।

सभी विशेषण अपनी सामान्य स्थिति में मूलावस्था में होते हैं, किसी से तुलना नहीं होती- कमला बांकी कुड़ी हा, मेरी कताब छोटी ए, यहां बांकी और छोटी विशेषण मूलावस्था में हैं। उत्तरावस्था में दो व्यक्तियों या वस्तुओं आदि में तुलना होती है- मेरी कताब तेरी कताबा ते छोटी ए। ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति या वस्तु को दूसरे व्यक्ति या वस्तु से अधिक छोटा या बड़ा, अच्छा या बुरा, लघु या गुरु दिखाना हो उसे अपादान कारक की स्थिति में लाया जाता है तथा दूसरी वस्तु को मूलावस्था में रखा जाता है, यथा- बिमला ते कमला बांकी ए, ट्रका थे कार सस्ती ही, छोहटुआ दू छोटी लांबी ऑसो। इन उदाहरणों में बिमला, ट्रक तथा छोहटु से अन्यों को सुन्दर, सस्ता तथा लंबा दिखाया गया है, अतः इनके साथ अपादान कारक के प्रत्यय ते, थे और दू जोड़े गए हैं तथा कमला, कार और छोटी अपनी मूलावस्था में हैं। कई बार विशेषण के साथ एक दूसरा विशेषण ‘ज़्यादा’, ‘भोता’, ‘बोहू’ भी प्रयुक्त होता है, यथा- बिमला ते कमला ज़्यादा बांकी ए। यदि अधिकता न हो कर न्यूनता का बोध हो तो थोड़ा’ या ‘कम’ आदि अन्य विशेषणों का प्रयोग होता है।

उत्तमावस्था में जब किसी को सबसे अच्छा या सबसे बुरा आदि दिखाना हो तो उस व्यक्ति या वस्तु के साथ ‘सबसे’, ‘सभना-ते’, ‘सबदूं’ आदि का प्रयोग होता है, अर्थात् ‘सब’ का द्योतक बोली विशेष के शब्द के साथ अपादान के प्रत्यय का प्रयोग होता है, यथा- सभते बांकी, सभ-थे सस्ती, सौ.-दों लंबी आदि। कांगड़ी, बिलासपुरी तथा मण्डियाली बोलियों में ‘सभ’ के साथ ‘ना’ या ‘नी’ का प्रायः संयोग होता है- अजकल सभनी-ते बड्डा नेता कुण आ। ना-नी का यहां भाव ‘में’ है।

विशेषण शब्दों का निर्माण

कुछ शब्द अपने आप में विशेषण होते हैं, यथा- खरा, बुरा, लाल, नीला, माठा ‘छोटा’, उच्चा, निच्चा आदि। परंतु कुछ विशेषण शब्द ऐसे होते हैं, जो दूसरे संज्ञा, सर्वनाम तथा क्रिया आदि प्रातिपदिकों से बनते हैं, जैसे –

(1) संज्ञा शब्द के अन्त में ‘आ’ जोड़ने से व्युत्पन्न विशेषण –

संज्ञा                                      विशेषण

शोख                                      शोखा

भूख                                       भूखा

ठांड                                       ठांडा

नौख ‘अनोखापन’                   नौखा ‘अनोखा’

खोट                                      खोटा

बादल                                   बादला़

लूण                                       लूणा

झूठ                                      झूठा

काठ                                   काठा

सच                                    सचा

चीश ‘प्यास’                          चीशा/चीशों

ध्या ‘प्यास’                            ध्याया ‘प्यासा’

तरह्याय ‘प्यास’                      तरह्याया

(2) संज्ञा शब्द के अन्त में ‘ई’ जोड़ने से-

शकीन                                  शकीनी

पाप                                       पापी

लोभ                                     लोभी

नाक                                    नाकी

दोंद                                    दोंदी

दोष                                    दोषी

जोग                                   जोगी

क्रोध                                  क्रोधी

शराब                                शराबी

फीम                                 फीमी

लालच                             लालची

ऊन                                 ऊनी

सूत                                  सूती

(3) संज्ञा शब्द के अन्त में ‘ला’ या ‘ला’ प्रत्यय जोड़ने से-

शोभ                                शोभला

रेत                                   रेतला

ताओ                              ताओल़ा

ऊन                               नुआल़ा

गाद                               गादल़ा

गुड़                               गुडल़ा

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