हिमाचली पहाड़ी भाषा

इतिहास, स्वरूप तथा 8वीं अनुसूचि का प्रस्ताव
हिमाचली प्रदेश की पहाड़ी भाषा प्राचीनकाल से बोलचाल, साहित्य रचना, लेन-देन तथा व्यवहार की भाषा रही है।

पहाड़ी भाषा की प्राचीन लिपियाँ

पहाड़ी भाषा टाकरी, खरोष्ठी, शारदा, भट्टाक्षरी, पाबुची, पंडवाणी, चंदवाणी आदि लिपियों में लिखी जाती रही है। पहाड़ी की वर्तमान लिपि हिन्दी देवनागरी है।

पहाड़ी में उपलब्ध शिलालेख

पहाड़ी भाषा में अनेक प्राचीन शिलालेख, ताम्रपत्र तथा सनदें आदि उपलब्ध हैं।

पहाड़ी भाषा का इतिहास, विकास तथा बोलियां

पहाड़ी भाषा का उद्भव ऋग्वेदकालीन वैदिक संस्कृत से हुआ है। कालक्रम से लौकिक संस्कत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं की विकास यात्रा में अपभ्रंश से शोरसेनी, मागधी, पैशाची आदि भाषाओं में से आधुनिक आर्य भाषाएं जन्मीं। भारतीय आर्य भाषा परिवार की भीतरी उपशाखा के अंतर्गत पश्चिमी पहाड़ी भाषा का उद्भव एवं विकास हुआ जिसमें सिरमौरी, बघाटी, कुल्लवी, मंडयाली, महासवी, गादी, पंगवाली, चंबयाली, कहलूरी, कांगड़ी, चिनाली, चामड़, हंडूरी, क्योंथली आदि बोलियां पहाड़ी ( हिमाचली ) भाषा के नाम से प्रचलित हैं।

पहाड़ी भाषा का व्याकरण और शब्दकोश

हिमाचली भाषा का व्याकरण तथा हिमाचल प्रदेश के कारक, डिस्क्रपटिव वोकब्युलरी ऑफ चिनाली, डिक्शनरी ऑफ पहाड़ी डायलैक्टस, कांगड़ी सैन्ट्रल सब सिस्टम और डिक्शनरी ऑफ कनावरी आदि पुस्तकें हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी द्वारा प्रकाशित की गई हैं। पं. टीकाराम जोशी द्वारा तैयार किया गया पहाड़ी भाषा का पहाड़ी अंग्रेजी शब्दकोश 1933 में एशियाटिक सोसायटी बंगाल द्वारा छापा गया था जिसे हिमाचल अकादमी द्वारा रीप्रिंट किया गया है।

पहाड़ी भाषा के राष्ट्रीय सेमिनार

पहाड़ी भाषा के स्वरूप मानकीकरण तथा भाषा वैज्ञानिक अध्ययन तथा एकरूपता आदि विषयों पर भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला, भाषा संस्थान बडोदरा तथा केन्द्रीय साहित्य अकादेमी दिल्ली के सहयोग से हिमाचल अकादमी द्वारा विगत वर्षों में अनेक सफल सम्मेलनों का आयोजन किया गया है।

हिमाचली पहाड़ी भाषा को केन्द्रीय साहित्य अकादमी की मान्यता

केन्द्रीय साहित्य अकादेमी दिल्ली द्वारा हिमाचल प्रदेश के लेखकों डॉ. गौतम शर्मा, श्री एम आर ठाकुर, डॉ. प्रत्यूष गुलेरी, डॉ. प्रेम लाल भारद्वाज आदि विद्वानों द्वारा लिखित तथा संपादित पुस्तकें हिमाचली पहाड़ी में प्रकाशित की गई हैं तथा साहित्य अकादेमी दिल्ली द्वारा हिमाचल के इन विद्वानों को सम्मानित भी किया गया है।

पहाड़ी भाषा एवं साहित्य पुरस्कार

हमाचल अकादमी द्वारा पहाड़ी साहित्य पुरस्कार रु.51000/- प्रतिवर्ष पहाड़ी भाषा की उत्कृष्ट पुस्तक के लिए एक पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

पहाड़ी भाषा का प्रकाशित साहित्य

हिमाचल अकादमी, भाषा संस्कृति विभाग तथा हिमाचल प्रदेश के लेखकों द्वारा पहाडी काव्य, कहानी, नाटक, निबंध, शोध समीक्षा आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अब तक लगभग 1500 पुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी हैं।

हिमाचली पहाड़ी भाषा की बोलियों के क्षेत्र तथा भाषाभाषी जनसंख्या का अनुमानित विवरण

बोली का नाम

बोली के प्रचलन का क्षेत्र

जनसंख्या 2011

पंगवाली

पांगी तहसील का क्षेत्र

18866

सिरमौरी

सिरमौर जिला

529855

बघाटी

सोलन की बघाट रियासत का क्षेत्र

356556

कुल्लवी

कुल्लू जिला

437903

मंडयाली

मण्डी जिला

999777

महासवी

शिमला जिला

814010

गादी

भरमौर तहसील

539108

पंगवाली

पांगी तहसील

18868

चंबयाली

चंबा जिला

519080

कहलूरी

बिलासपुर जिला

381956

कांगड़ी

कांगड़ा हमीरपुर जिला

2000000

चिनाली

लाहुल का जाहलमा गांव

1500

चामंग

किन्नौर का चामंग समुदाय

1000

हंडूरी

सोलन जिला का नालागढ़ क्षेत्र

20000

क्योंथली

क्योंथल रियासत का क्षेत्र

20000

हिमाचली पहाड़ी भाषा भाषीजनों की कुल जनसंख्या

67499917

संस्कृत मूलक पहाड़ी भाषाएं

हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र लाहुल स्पिति के जाहलमा गांव में बोली जाने वाली चिनाली, किन्नौर की चामंग भाषा और पांगी में पंगवाली तथा भरमौर की गादी भाषाएं पूर्णतया संस्कृत मूलक हैं। इसके अतिरिक्त हिमाचल की अन्य भाषाओं में भी अधिकांश शब्द और वाक्य संरचना संस्कृत पर आधारित है।

पहाड़ी भाषा में उपलब्ध पांडुलिपियां

इंदिरा गांधी कला केन्द्र, दिल्ली राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन द्वारा हिमाचल अकादमी में स्थापित पांडुलिपि रिसोर्स सैंटर के माध्यम से किए गए सर्वेक्षण में हिमाचल प्रदेश के राज्य संग्रहालयों, अकादमी पुस्तकालय, सार्वजनिक पुस्तकालयों तथा निजी संग्रहों में पहाड़ी भाषा की टांकरी, पाबुची, पंडवाणी, चंदवाणी, भट्टाक्षरी, भोटी आदि लिपियों में असंख्य प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियां उपलब्ध है।

पहाड़ी भाषा को 8 वीं अनुसूचि में शामिल करने का प्रस्ताव

अत: पहाड़ी भाषा में प्रकाशित पत्र पत्रिकाओं, पुस्तकों, प्राचीन पांडुलिपियों और बोलचाल के आधार पर हिमाचली भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूचि में शामिल किए जाने का प्रस्ताव है।

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