सर्वनाम

संज्ञा शब्दों के स्थान पर जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, वे सर्वनाम कहलाते हैं। पहाड़ी में छह प्रकार के सर्वनाम हैं –

         (1) पुरुषवाचक (2) निजवाचक (3) निश्चयवाचक

         (4) अनिश्चयवाचक (5) सम्बंधवाचक (6) प्रश्नवाचक

  1. पुरुषवाचक

                  पुरुषवाचक सर्वनाम तीन हैं– उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष तथा अन्य पुरुष।

        उत्तम पुरुष

                  सभी बोलियों में पुरुषवाचक उत्तम पुरुष एकवचन कर्तृकारक रूप ‘हऊं’ है जो किंचित् स्थानीय ध्वनि भेद से सभी बोलियों में समान रूप से प्रचलित है। यह उत्तम पुरुष एकवचन का विभक्ति रहित अविकारी रूप है। ‘हऊं’ का विभक्ति रूप ‘मैं’ है, परन्तु इसका उच्चारण हिन्दी ‘मैं’ से कुछ भिन्न है और मूलत: पहाड़ी के स्वर ‘ऍ’ के संयोग से व्युत्पन्न हुआ है, यथा ‘मैं’। जब यह सविभक्ति में’ अन्य कारक-प्रत्ययों से मिलता है तो इसका विकारी रूप मि, मुं (या मूं), मां आदि हा जाता है, यथा- कर्मकारक का प्रत्यय लगने पर इसके चम्बयाली में मिंजो, गादी म मुंजो, कांगड़ी और कहलूरी के आधे क्षेत्र में मुंजो शेष क्षेत्र में मिंजो, सिरमौरा , मिखें, महासुई में मुंखें, बघाटी में मांखें और कुलुई में मूं. आदि, शिमला क्षेत्र, भी कहीं माखें रूप प्रचलित है। वहां यह कहावत है- ‘माखें खणी खुह तिदा पर तु’ ‘मेरे लिए कुआं खोदा उसमें तू स्वयं पड़ा’। ये सारे रूप एक ही संस्कृत शब्द ‘माम्’ से व्युत्पन्न हुए हैं- माम् > मां > मों > मुं, मू आदि।

                  उत्तमपुरुष बहुवचन में दो रूप प्रचलित हैं – ‘असे’ और ‘हामे’। कांगड़ा चम्बयाली, मण्डियाली और बिलासपुरी आदि पहाड़ी की बाहरी शाखा की बोलियों में असे’ या ‘आसे’ शब्द प्रचलित है। इस शब्द का ‘ने’ के अर्थ में सविभक्ति रूप असे है तथा अन्य कारक-प्रत्ययों के लगने से पूर्व ‘असां’ (या आसा) रूप में सिकार ग्रहण करता है- ‘असे बेले हन असां-जो कम देआ’ (हम बेकार हैं हमको दो), ‘असे रोटी नी खादी, असां-जो भुक्ख लगोरी।’ कुलुई में मूल शब्द ‘आसेॅ’ है तथा इसका विकारी रूप ‘आसा’ है जिसके साथ कारकों के सभी प्रत्यय जड जाते हैं, आसा बे, आसा न्, आसा ताई आदि। पीछे लिखा जा चुका है कि पहाडी में श स > ह में बदलने की प्रवृत्ति है। इसलिए ‘असां’ से ‘अहां’ रूप भी, विशेषतया कांगड़ी बोली में प्रचलित है, असां-जो > अहां-जो।

                 सिरमौरी, बघाटी और महासुई आदि पहाड़ी की भीतरी शाखा की बोलियों में ‘हामे’ रूप प्रचलित है। यह ‘ने’ के अर्थ में ‘हामें’ तथा अन्य कारक प्रत्ययों से पहले ‘हामों’ का विकार धारण करता है, यथा- ‘हामें ओंस्कली बणा रखा, हामों-खे घीऊ दे’ (हमने असकली बना रखी है, हमको घी दो)। सम्बंधकारक में ‘असे’ से ‘आसारे-रा-री’ तथा ‘हामे’ से ‘म्हारे-म्हारा-म्हारी’ रूप सभी बोलियों में समान रूप से प्रचलित हैं।

भिन्न बोलियों में इनके प्रयोग देखे जा सकते हैं, उदाहरण 

मैं बमार हां। मिंजो तंग मत करा (कां०)                                                      ‘मैं बीमार हूं। मुझे तंग मत करो’ ।

अऊं राती सुतुरा थू, मैंई सुपने मंझ नार सिंह हेरु (चं०)                                   ‘मैं रात को सोया था, मैंने सपने में नारसिंह (देवता) देखा’

हऊ सुतीरा था, मिंजो कुछ पता नी (कह०)                                                 ‘मैं सोया था, मुझे कुछ पता नहीं’

हाऊं चौलू स्कूला बें, मुंबें रोटी देआ(कु०)                                                    ‘मैं स्कूल जा रहा हूँ, मुझे रोटी दो’

मूं चीठी लिखणी, मिंजों कागज  देआ (चं०)                                 ‘मैं पत्र लिखूगा, मुझे कागज दो’

हामे भूखाइ, हामू रोटी देओ (महा०)                                                            ‘हम भूखे हैं, हमारे लिए खाना दो’

हामे काम कौरदेॅ, हामो-खे पैसे  देओ (सि०)                                हम काम करते हैं, हमें पैसे दो’

आसा बेॅ कुण लागीरा तोपदा, आसेॅ सी ऑखेॅ (कु०) हम को कौन ढूंढ रहा है, हम यहां हैं’

असां आये बी कन्ने असां ते कम्म बी नी होया (कां०)               ‘हम आये भी और हमसे काम भी नहीं हुआ

 

मध्यम पुरुष

            मध्यम-पुरुष एकवचन कर्तवाचक विभक्तिरहित रूप सभी ब तू है। इसका सविभक्ति तिर्यक रूप ‘ते’ है, जो ‘मैं’ की भाति कारक प्रत्यय लगने से पूर्व विभिन्न रूप में विकृत हो जाता है। ऐसा बोली नहीं स्थान भेद के कारण है। एक ही बोली में दो या अधिक जैसे- कांगड़ी, कहलूरी, मण्डियाली, चम्बयाली में यह । बदलता है, यथा– तिजो, तिज्जो, तुजी, तुज्जो, तुःजो। बघाटी, महासुई में तां या ताई तथा कुलई में ‘ता’ में बदल जाता है। सभी बोलियों में यह तेरा-तेरे-तेरी रूप में प्रचलित है। संस्कृत ‘त्वम् ‘ से हुई है- त्वम् > तुहुँ , तू । मध्यम-परु: सिरमौरी, महासुई तथा बघाटी में ‘तुम-तुमे’ और अन्य शेष सी ‘तसां-तसे’ है। ध्वनि-परिवर्तन की प्रवृत्ति के कारण स्थान-स्थान तुमें, तुम्हें, तुहें, तुएं तथा तुसां से तुसे, तुसे, तुसा, तुसी, तहां भी, परिवर्तित होते हैं उदाहरण :

त ओॅ खेॅ बेश, तोॅ बेॅ कताबा आणनी(कु०)                                                         ‘तू यहां बैठ, तुझे पुस्तकें ला

तेँ मिंजो खाणे जो क्या दित्ता (कां०)                                                                   ‘तूने मुझे खाने को क्या दिया

तू बड़ा पढ़दा, तिजो इनाम मिलणा(कह०)                                                        ‘तू बड़ा पढ़ता है, तुझे इनाम मिल

तांखे जो मिलो ए तू सेई खा (बघा०)                                                                  ‘तुझे जो मिलता है तू वही खा’।

तू तां बेशरम असोॅ, तां शरम केई (महा०)                                                         ‘तू तो बेशर्म है, तुझे शर्म कहां’

 तू शरारती हा, तुज्जो डंडे पोॅ णे (मं०)                                                               ‘तू शरारती है, तुझे डंडे पडेंगे’

तू लड़ाका हे, तुजो सिते मूं न   खेडणा (चं०)                                  ‘तू लड़ाका है, तेरे साथ मैं नहीं खेलंगा’

तू बुढी न ठेरी, कैंह करदी                                                                                  ‘तू बुढ़िया तो नहीं है फिर क्यों हेरा

हेरा-फेरी (कां०-लो०)                                                                                        फेरी करती है’

तुसे रोज बजारा जांदे, तुसां जो के  कम पूंदा (चं०)                              तुम रोज बाजार जाते हो, तुम्हें क्या  काम पड़ता है’

तुसें किती ते आए, तुसां जो क्या  चांहिदा (कह०)               ‘तुम कहां से आए, तुम्हें क्या चाहिए’

तुएं घोॅ रोॅ खे जाओं, तुआरे बौइचें  भूखेॅ ओॅ सोॅ(सि०)     ‘तुम घर को जाओ, तुम्हारे पशु भूखे

हैं

 

अन्य पुरुष

          पहाड़ी में पुरुष वाचक उत्तम पुरुष व मध्यम पुरुष के पुंल्लिंग व स्त्रीलिंग समान रूप रहते हैं, लेकिन अन्य पुरुष ‘वह’ के रूप स्त्रीलिंग व पुंल्लिंग में देवल एक वचन में भिन्न हैं, जबकि बहुवचन में दोनों लिङ्गों में रूप एक जैसे रहते हैं। लिङ्ग सम्बंधी विवेचन आगे निश्चयवाचक सर्वनाम के अधीन प्रस्तुत किया जाएगा क्योंकि पुरुषवाचक अन्यपुरुष का प्रतिपादन ‘सो, सी या सः’ प्रकृति और प्रवत्ति में वही है जो निश्चयवाचक का भी है। यहां केवल वचन से सम्बंधित विवेचन करना ज़रूरी है।

           पुरुषवाचक अन्य पुरुष तथा निश्चयवाचक दूरवर्ती सर्वनाम का रूप सभी बोलियों में समान है, मात्र स्थानीय ध्वनि भेद के कारण तनिक भिन्नता है, यथा – एक वचन में कांगड़ी, चम्बयाली, बिलासपुरी में ‘से’ या ‘सः’, सिरमौरी, बघाटी, महासुई में ‘सी’ या ‘से’ तथा कुलुई और गादी में ‘सो’ है। इनमें से ‘सः’ संस्कृत का तत्सम रूप है, हालांकि उच्चारण किंचित् भिन्न है। ‘से’ और ‘सो’ प्राकृत में भी थे और उन्हीं के माध्यम से पहाड़ी तक पहुंचे हैं। इनका कारकीय रूप कुलुई में ‘तेई’, गादी में ‘तेह’ और शेष बोलियों में ‘तिस’ या ‘तेस’ है, यथा –

सो शोहरू सा, तेईबे मता मारदे (कु०)                                                                      ‘वह लड़का है, उसे मत मारो’

सः इतणा दुबला हा जे तिस पर बोजा                                                                         वह इतना कमज़ोर है कि उस पर बोझ

नी लदी सकदे (कह०)                                                                                               नहीं लाद सकते’

से लांगड़ा ओॅ सोॅ तेस खेॅ डींगा   देओं (महा०)                              ‘वह लंगड़ा है उसे लाठी दो’

 

सः ईमानदार नी ए तिसदे हत्थ किछ मत घलदा (कां०)             ‘वह ईमानदार नहीं है उसके हाथ कुछ मत भेजना’

                  सम्बंध कारक में इनका रूप इस प्रकार बनता है- तेसरा-रे-री, तिसरा-रे-री, तिसदा-दे-दी, तेईरा-रे-री आदि।

             बहुवचन की स्थिति में कर्ताकारक का कारकरहित रूप कुलुई, मण्डियाली और बिलासपुरी को छोड़कर अन्य बोलियों में मूलतः वही है जो एकवचन का रूप है । कुलुई में एकवचन का ‘सो’ बहुवचन में ‘ते’ बनता है- सो शोहरू कों हाला, होरा ते ता सेभ आँखे सी ‘वह लड़का कहां होगा, शेष वे तो सब यहां हैं। यहा ‘ते’ ठीक संस्कृत का तत्सम शब्द ‘ते’ है। बिलासपुरी और मण्डियाला मे कारकरहित बहुवचन ‘स्यों’ है- स्यों मंगते हे, तिन्हां जो आटा देओ वे भिखारी हैं उनको आटा

                 सभी बोलियों में कर्ताकारक ‘ने’ के अर्थ में सविभक्ति रूप “तिन्हें’। बघाटी में महाप्राणत्व क्षीण होने के कारण यह ‘तिने’ है और कुछ क्षेत्रों में ‘तिन्हें’ प्रायः ‘तिन्हां’ बन जाता है, यथा- बघाटी में ‘सी एकी ठें रओ, तिने कुछ नी खाया’। जहां तक कारकीय रूप का सम्बंध बोलियों में कारक प्रत्यय लगने से पूर्व एक ही रूप ‘तिन्हां’ का प्रचलन बोलियों के कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं –

ते शोखुइरे, तिन्हां बेॅ पाणी देआ (कु०)                                   ‘वे प्यासे हैं, उनको पानी दो

से लांगड़े ओॅ सोॅ, तिन्हों दो हाण्डुदा  नी (महा०)                     ‘वे लंगड़े हैं, उनसे चला नहीं

सः चलाक ऐं, तिन्हां ते दूर रओ (कह०)                                    ‘वे चालाक हैं, उनसे दूर रहो।

 सः हंसेया कराऐं, तिन्हां रे मुंह बंद    करो (कह०)                   ‘वे हंसते हैं, उनके मुंह बंद करो

 सः सुतेयो, तिन्हां जो व्वाली देया (कां०)                                                                         वे सोये हैं, उन्हें जगा दो’

सः चली बी गये, तिन्हां जो दिखेया   ई नी (कां०)               ‘वे चले भी गए, उनको देखा ही नही

 सो बड़े जोरे वाले हन्, तिएं सिते मत लड़ा (चं०)                ‘वे बड़े जोर वाले हैं, उनके साथ मत

लड़ो’

  1. निजवाचक

पहाड़ी में निजवाचक सर्वनाम आपु, आपी तथा अप्यूं हैं। क्योंकि इनमें अपने आप या स्वयं का भाव लक्षित है, इसलिए ये निजवाचक हैं। आपु या आपी शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत ‘आत्मन्’ से हुई है। सं० ‘आत्मन्’ के लिए प्राकृत में ‘अप्प’ या ‘अत्त’ रूप प्रचलित थे। इनमें से ‘अप्प’ रूप आगे प्रचलित रहा और इसने हिन्दी आदि भाषा में ‘आप’ का रूप धारण किया और ‘आप’ शब्द ने सम्मान या आदर की भावना अपना ली। पहाड़ी की किसी भी बोली में हिन्दी की तरह आदरसूचक निजवाचक सर्वनाम ‘आप’ नहीं है, परन्तु मध्यम-पुरुष बहुवचन के ‘तुसेॅ’ शब्द में वे सभा गुण हैं जो आदर दर्शाने के लिए हिन्दी के ‘आप’ में विद्यमान हैं, प्रयोग में तुसे शाम ‘तुसां, तुसे, तुसी’ आदि रूप धारण कर लेता है- तुसां कुत्थु ते आए आप कहा आए’, तुसां जो कै चाहिदा ‘आपको क्या चाहिए’, तुसें खाणा खाऊ की ना खाना खाया या नहीं’ आदि। निजवाचक आपु , आपी या अप्पं में बिना विकार सभी कारक प्रत्यय जुड़ जाते हैं। उदाहरणार्थ –

 

सर्वनाम

आपणा काम आपी कर            ‘अपना काम आपी करो’ 

होरी बेॅ गुरु-ज्ञान, आपु बेॅ गोशटेॅ- (कु०-लो०)     दूसरों को नसीहत खुद मियां फज़ीहत ‘

अप्पूं व मत लड़ा                     ‘आपस में मत लड़ो’

अप्पूं जो तां गोह बी सरांहांई- लो०  ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू’

 

3.निश्चयवाचक सर्वनाम

              पहाड़ी भाषा की सर्वनाम के क्षेत्र में अनेक विशिष्टताएं हैं और ये शब्द या नोट के कारण नहीं वरन् मूलाधार के कारण हैं। इनमें से एक निश्रयतान नाम से संबंधित है। हिन्दी, पंजाबी आदि अनेक आधुनिक आर्य-भाषाओं में निश्चयवाचक सर्वनाम दो हैं- ‘यह’ तथा ‘वह’ और इनमें भेद समीपता के कारण है. जो निकटवर्ती है वह ‘यह’ है और जो दूरवर्ती है वह ‘वह’ है। परन्तु पहाडी भोला में निश्चयवाचक सर्वनाम तीन हैं- (1) ‘ए’ जो हिन्दी के निकटवर्ती ‘यह’ का समकक्ष है, (2) ‘ओ’ (या ‘ओह’) दूरवर्ती परन्तु प्रत्यक्ष है, तथा (3) ‘सो’ (या सः, से या सी) जो दूर परोक्षवर्ती है। उदाहरणार्थ ‘ए खेतर मेरा हा’, ‘ओ सामने रा खेतर तेरा है’, पर ‘पिछला सः खेतर कुसरा था। प्रत्यक्षवर्ती ‘ओ’ पहाड़ी की भीतरी शाखा की बोलियों में नहीं है, परन्तु बाहरी शाखा की बोलियों में इसका व्यापक प्रयोग है। भले ही समय के बीतते प्रत्यक्ष और परोक्ष के बीच भेदक-अंतर उतना स्पष्ट नहीं रहा है परंतु ‘सः’ और ‘ओ’ का एक ही समाज या क्षेत्र में साथ-साथ प्रयोग इनके भिन्न होने का प्रमाण है। प्रयोग में भेद स्वतः स्पष्ट होता है, यथा कांगड़ी बोली में इसके उदाहरण हैं- ओ मेरा चाचू था, उस जो कुत्थु भेजया। गादी में ऐसा भेद आम बोलचाल में है- ओह रुख ता बड़ा भारी अजगर हा (प्रत्यक्षवर्ती), सो कोड़ा ता अजगर थु (परोक्षवर्ती), ओ ता हाखीरा अधा हा (प्रत्यक्ष), सो बाहर न इंदा तेहा जो अंद्रोल हा (परोक्ष) आदि।

             प्रत्यक्ष ‘ओ’ और परोक्ष ‘सो’ के कर्ताकारक सविभक्ति रूप तथा कारकीय  रूप भी भिन्न प्रकार के हैं। ‘ओ’ का एकवचन में सविभक्ति कर्ताकारक रूप उने है तथा भिन्न कारक प्रत्ययों के प्रयोग से पहले यह ‘उस’ में बदल जाता है- 

उसजो उस-कन्ने, उस सौगी , उसने आदि। यह उल्लेखनीय है कि प्रयोग की दृष्टि से इसका विकार हिन्दी के समकक्ष है, जैसे हिन्दी में ‘वह’ मूलतः उसने उसको  उसपर आदि रूप में बदल जाता है वैसे ‘ओ’ भी उने, उसजो, उस कन्ने रूप में बदल जाता है। परन्तु पहाड़ी भाषा का परोक्ष निश्चयवाचक (तथा पुरूष वाचक अन्य  पुरूष) स: (से या सो) हिन्दी के अनुरूप नहीं वरन् संस्कृत के अनुरूप विकार ग्रहण कर उसका कारकीय रूप त-युक्त हो जाता है, यथा- तेसे (या तिसे) ‘उसने तेस-खे (तिसजो), तेसदो आदि। संस्कृत में ‘सः’ भी तौ, ते, तम्, तौ. तान विभक्ति रूप ग्रहण करता है। 

                         इसी तरह बहुवचन में भी ‘ओ’ हिन्दी की तरह ‘उन्हां’ में बदल जाता और उसके साथ सभी कारक प्रत्यय जुड़ जाते हैं- उन्हां किछ कम नी किन उन्हां जो कोई मजूरी नी मिली। इस तरह पहाड़ी भाषा के दूरवर्ती अन्यपुरुष ओ और उसके एकवचन में विकारी रूप ‘उस’ तथा उसके बहुवचन में ‘उन्हां’ । हिन्दी भाषा के वह, उस, उन तथा उन्हों का प्रभाव है। इसके विपरीत परोक्ष को तथा उसके एकवचन तथा बहुवचन के रूप संस्कृत से प्रसूत हुए हैं। कुलुई बोली में ‘सो’ बहुवचन में ‘ते’ बनता है। यह ‘ते’ संस्कृत का बहुवचन का विशुद्ध तत्सम शब्द है। इस ‘ते’ से विकारी रूप ‘तिन्हां’ बना जो सभी बोलियों में प्रचलित है। – पहाड़ी भाषा में पुरुषवाचक अन्य-पुरुष तथा निश्चयवाचक सर्वनामों संबंधी एक और विशेषता लिंग के आधार पर है। हिन्दी में निश्चयवाचक निकटवर्ती ‘यह’ तथा इसका तिर्यक रूप ‘इस’ दोनों स्त्रीलिंग और पुंल्लिंग के लिए एक ही रूप में प्रयुक्त होते हैं। इनके लिंग भेद के कारण अलग-अलग रूप नहीं होते। इसी तरह ‘वह’ और ‘उस’ पुंल्लिंग के लिए जिस रूप में प्रयुक्त होते हैं, स्त्रीलिंग के लिए भी उसी रूप में प्रयोग में आते हैं अर्थात् हिन्दी, पंजाबी आदि अनेक भारतीय आधुनिक आर्य भाषाओं में निश्चयवाचक सर्वनाम और अन्य पुरुष पुरुषवाचक में लिंग के आधार पर कोई भेद नहीं है, परन्तु पहाड़ी भाषा में ऐसा भेद है जो उसे सीधा संस्कृत से प्राप्त हुआ है। पहाड़ी की बोलियों में इनके विकारी रूप पुंल्लिंग और स्त्रीलिंग में अलग-अलग होते हैं, जैसे कुलुई में एई शोहरू-बेॅ, ‘इस लड़के को’ परंतु एसा शोहरी-बें ‘इस लड़की को’, इसी तरह तेई मरदा-बेॅ, परन्तु तेसा बेटड़ी-बें। स्पष्ट है कि ‘इस’ का विकारी रूप पुंल्लिंग में ‘एई’ तथा स्त्रीलिंग में “एसा’ है तथा ‘उस’ का पुंल्लिंग में ‘तेई’ तथा स्त्रीलिंग में ‘तेसा’ अलग-अलग रूप हैं। अन्य बोलियों में ‘ए’ का पुंल्लिंग में विकारी रूप प्रायः इस, एस है तथा स्त्रीलिंग में इसा, एसा है। ‘से’ का पुंल्लिंग में तिस और तेस है तथा स्त्रीलिंग में तिसा और तेसा है।

          उक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक बोली में कर्ताकारक विभक्तिरहित रूप दोनों लिंगों के लिए समान रहता है- ए माठा-ए माठी, ए छ़ोह्टु-ए छ़ोह्टी, सः मुन्नु-सः मुन्नी, से मठा प्यासा हा तथा से मठी प्यासी ही, से मेरा बटा ऑ सो-से मेरी बेटी ऑ सो आदि। इसी तरह बहुवचन भी दोनों स्त्रीलिंग तथा पुंल्लिंग के लिए समान रहते हैं- ‘इन्हां मठयां जो मत मारा तथा इन्हां मठियां जो मत मारा आदि। पंल्लिंग और स्त्रीलिंग का भेद केवल एकवचन विकारी रूप में ही  प्रदर्शित होता है।

 

  1. अनिश्चयवाचक सर्वनाम

            जिस सर्वनाम से किसी पुरुष या वस्तु के बारे में कोई निश्चित जानकारी व नहीं होती है, उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। पहाड़ी में अनिश्चयवाचक र्वनाम दो हैं- कोई और किछ (या किच्छ)। ‘कोई’ प्रायः जीव-प्राणियों के लिए योग में आता है, यथा- मैं कोई नी मारेया, मेरे दुखे-जो सुणने आला कोई नी हा, छों कोई नी था आदि। यह बहुधा एकवचन में ही प्रयुक्त होता है। कोई’ शब्द संस्कृत ‘को+अपि’ से विकसित हुआ है। प्राकृत में इसका रूप ‘कोबि’ था– को-अपि > कोपि > कोबि > कोवी > कोई रूप में यह पहाड़ी भाषा में पहुंचा है। सभी बोलियों में कोई रूप प्रचलित है, केवल शिमला क्षेत्र में ‘कुण्है’ और सिरमौरी में ‘कुणीए’ भिन्न रूप प्रचलित है, यथा- घोंरे कुणीए ना आथी ‘घर में कोई नहीं है’ सिरमौरी में तथा तैथा कुण्है नाथा ‘वहां कोई नहीं था’ शिमला क्षेत्र में ।

        कोई’ का सहज प्रयोग कुलुई में प्राप्य है। वहां यह न कारकीय स्थिति में और न ही सविभक्ति रूप में कोई विकार ग्रहण करता है। सभी स्थितियों में मूल रूप में रहता है- कोईऍ तो बोलू होला ‘किसी ने तो कहा होगा’, कोई बेॅ लिखू कलमेॅ कोई बैॅ कदालेॅ किसी को लिखा कलम से किसी को कुदाल से’ आदि। अन्य बोलियों में से कांगड़ी और चम्बयाली में इसका कारकीय रूप ‘कुसी’ तथा शेष बोलियों में किसी’, ‘केसी’ या ‘कोॅ सी’ है यथा- मैं कुसी-ते नी डरदा (को०), किसी-खे गाली मत देओ (बघा०), ग्रावां रा माहौल केसी मेले ते घट नीहा (मं०), मीं कोंसी-खे बुरा नी बोलदा (सि०) आदि। साधारण बोल-चाल में अनेक बार ‘कोई’ के साथ ‘की’ जोड़ने की सामान्य प्रवृत्ति है। तब इसके अर्थ में दृढ़ता आ जाती है- तुसां-जो तोपणे कोईकी आया था ‘आपको तलाश करने कोई विशेष आदमी आया था’, कोईकी लेरां मारने लगोरा था ‘कोई चीखें मारने लगा था’ आदि। ‘ने’ के अर्थ में अनेक बार इसका रूप भिन्न हो जाता है ‘किनी (या कन्नी)’- चोरी किनी नई कित्ती (को०) चोरी किसी ने नहीं की’, किनी किछ नी दसेया ‘किसी ने कुछ नहीं बताया’ आदि।

        अनिश्चयवाचक सर्वनाम ‘कोई’ का बहुवचन का प्रयोग प्रायः नहीं है। डयाली और बिलासपुरी सम्भवतः दो बोलियां हैं जिनमें बहुवचन का प्रयोग मलता है। मूल ‘कोई’ तो एकवचन और बहुवचन में समान रहता है। परन्तु ईनके विकारी रूप प्रचलित हैं। कर्ताकारक ‘ने’ अर्थ में मण्डियाली का शब्द ‘किन्हें है और बलासपुरी का ‘किन्हीएं’, यथा- किन्हीएं (या किन्हें) तां गलाया  हुंगा किन्हियों ने तो कहा ही होगा। विभिन्न कारकों के सहयोग पर इनका कारकीय कर में ‘किन्हीं’ तथा बिलासपुरी में ‘किन्हीयां’ है, यथा- किन्हीयां (किनी री ज़रूरत नी ही ‘किन्हियों को बुलाने की ज़रूरत नहीं है’, ए कम किन्दी । ते नी होणा ‘यह काम किन्हियों से नहीं होगा’ आदि। आम बोलचाल में ऐसा । कम ही सुनने में आता है। ये भाव एकवचन से ही दर्शाए जाते हैं।

                 ‘किछ’ का प्रयोग निर्जीव वस्तुओं के लिए होता है- बकसे . नी है, अज्ज तिनी किछ बी नी खादेया आदि। इसकी उत्पत्ति संस्कृत किया हई है जो प्राकृत में ‘किंचि’ रूप में प्रयुक्त होता रहा है। किंचित् के अनस्वार होने पर ‘किचि’ बाद में ‘किछ’ में बदल गया है। ‘किछ’ में कोई कारक नहीं जुड़ सकते। यह सभी स्थिति में अविकारी रहता है- मिंजो किछ खास देआ, तुसां की किछ मंगेया? आदि। परन्तु यदि ‘किछ’ के साथ ‘की’ का संयोग तो ‘किछकी’ में सभी प्रत्यय जुड़ जाते हैं- पाणी जो किछकी ने ल्हाई देआ ‘पानी को किसी चीज़ से हिला दो’, ए दवाई किछकी-न डाह ‘यह दवाई किसी वस्त में रख दे’, मुनुए किछकीए सर्प मारेया ‘लड़के ने किसी चीज़ से सांप मारा’ आदि। अनेक बार ‘किछ’ का प्रयोग विशेषण की तरह होता है। तब यह निर्जीव वस्तओं से सम्बंधित होने पर भी जीव प्राणियों को भी विशेषित करता है- किछ लोग सोणे लगोरे थिए किछ खड़े थिए, किछ छोहटु बीमार थिए आदि।

  1. सम्बंधवाचक सर्वनाम

                  पुरुष अथवा वस्तुओं के सम्बंधों को प्रकट करने वाले सर्वनाम सम्बंधवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।

                  पहाड़ी की विभिन्न बोलियों में सम्बंधवाचक सर्वनाम के प्रमुख रूप इस प्रकार हैं 

बोली    पुंल्लिंग एकवचन        पुंल्लिंग बहुवचन        स्त्रीलिंग केवल    एकवचन

            मूल/विकारी    कारकीय  मूल/विकारी  कारकीय   मूल/विकारी   कारकीय

चम्बयाली   जो/जिनी  जेस         जा/जिएं        जिआं     जा/जेसी       जेसा

कांगड़ी      जे/जिनी    जिस        जे/जिन्हां    जिन्हां        जे/जेसी       जिसा

मण्डियाली जे/जिने    जेस       जियों/जिन्हें  जिन्हां        जे/जेसे        जेसा

कुलुई       ज़ो/जुणीए   जु़णी      जु़णा            जु़णी             —               —

सिरमौरी  जो-जू/जेणीए जेस     जू/जिन्हों      जिन्हों        जू/जिए       जिओं

बघाटी          जो/जेणीए  जेस    जो/जिन्हों     जिनों            जो/जिए       जिओं

कहलूरी        जे/जिने      जिस    जो/जिन्हें     जिन्हां            जो/जिसा    जिसा

महासई        जो/जिने     जेस    जो/जिन्हों     जिन्हों            जो/जेसो     जेसो

             उक्त विवरणी से स्पष्ट है कि सम्बंधकारक के स्वरूप में सभी बोलियों में पूण्र समानता है‍ भीतरी शाखा की बोलियों में यह ‘जो’ है और बाहरी शापवा की लियों में ‘जे’ है, परन्तु इनमें अदला-बदली भी सम्भव है। कांगड़ा क्षेत्र में ही नों रूप प्रचलित हैं- जो घोड़ा चिट्टा था, सः मरी गया में ‘जो’ का प्रयोग है, तथा जे बांहगे, सो बढगे जो बोएंगे वे काटेंगे’ में ‘जे’ का प्रयोग है। ‘जो’ की व्युत्पत्ति संस्कत ‘यः’ से हुई है। यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि पहाड़ी भाषा में ‘य’ पाय. ‘ज’ में बदल जाता है और विसर्ग (:) ‘आ’ या ‘ओ’ का रूप धारण करता है। अतः यः > जः > जो होना स्पष्ट है तथा ‘जो’ के स्थान पर ‘जे’ एक विकल्प है। इस मूल शब्द ‘जो’ या ‘जे’ में लिंग के आधार पर कोई परिवर्तन नहीं होता- जे लडका आया था या जे लड़की आई थी में लड़का’.या ‘लड़की के साथ दोनों स्थितियों में ‘जे’ समान रूप से प्रचलित है। अन्य कारकों के प्रत्यय जुड़ने पर जो प्रायः ‘जेस’ में तथा ‘जे’ शब्द ‘जिस’ में बदलता है, यथा- जेस माणछोगे मकोंदमा किया ‘जिस आदमी पर मुकद्दमा किया’ महासुई के इस वाक्य का सम्बंध जो से है। इसी का रूप कांगड़ी में जहां प्रत्यय ‘जे’ है यों होगा- जिस आदमीए पर मकदमा कित्ता था। इस तरह के कारकीय रूप में लिंग के आधार पर भिन्नता प्रकट होती है। पुंल्लिंग ‘जिस’ या ‘जेस’ स्त्रीलिंग में ‘जिसा’ या ‘जेसा’ बनता है, यथा- जेस मठे रा ब्याह हो तेसरी क्या उम्बर ही (मं०) का स्त्रीलिंग रूप इस प्रकार होता हैजेसा मठिया रा ब्याह हा तेसारी उम्बर क्या ही। सिरमौरी और बघाटी में स्त्रीलिंग एकवचन का रूप ‘जिओ’ है- जेस भखारी-खे पोंसे दिए (पुंल्लिंग) परन्तु ‘जिओं भखारणी-खे पोॅसे दिए’ (स्त्रीलिंग)। सभी बोलियों में बहुवचन के दो रूप हैंजिन्हां तथा जिन्हों।

              यह उल्लेखनीय है कि लगभग सभी बोलियों में कर्ताकारक सप्रत्यय या विकारी रूप जुणीए, जेणीए या जिनी है जब इसमें ‘ने’ का अर्थ जुड़ता है। यह ‘जो’ या ‘जे’ या कारकीय रूप ‘जिस’ या ‘जेस’ से अधिक भिन्न है। इसकी व्युत्पत्ति सं० यः+पुनः से मानी जाती है- यः+पुनः > जोपुन > जपुण > जउण > जुण आदि। विशेष रूप से कुलुई में इसका प्रचलन है जहां अन्य कारकों के प्रत्यय भी इसी रूप में संयोग करते हैं- जुणी-बें, जुणी-न, जुणी- आदि। अन्य बोलियों में भी इसका प्रचलन देखा जा सकता है, यथा– जिनी आदमीए ऋण लेया था, उनी चुकाइतेया (को०), जिन्हां जे चढ़नी क्वाली, तिन्हां जो क्या सुखाली (लोकोक्ति)। बहुवचन स्त्रीलिंग और पुंल्लिंग समान हैं, यथा- जिन्हों या जिन्हों।

          इस सर्वनाम को इसलिए सम्बंध वाचक कहते हैं क्योंकि यह एक ही वाक्य के दो खण्ड-वाक्यों या दो उप-वाक्यों को जोड़ता है या दोनों  सम्बंध स्थपित करता है वाक्य में आश्रित खण्ड-वाक्य प्राय: पहले आता है तथा मुख्य खण्ड वाक्य बाद में, यथा– जो छोहटु हिज आजो थियो, से डेवी गोवा (मदा वाक्य में ‘से डेवी गोवा’ मूल खण्ड-वाक्य है तथा ‘जो छोटु हिज आजो शिर मूल खण्ड-वाक्य का आश्रित खण्ड-वाक्य है तथा सम्बंधवाचक सर्वनाम ‘जो दोनों को जोड़ रहा है। इसी तरह जो शोहरू एला, तेई झैं बशाई (कु०) ‘जो लट आएगा उसको बिठा देना’, ‘जो टसु गच्छु करदा, से बड़ा अमीर हा (चं०), जित मणहु बलें धन हा, तिआं बलें दिल नी हा (चं०) आदि। भिन्न बोलियों के कुछ उदाहरण देना उचित रहेगा–

से जे लड़का आया था तिसरा नाओं                                                              ‘वह जो लड़का आया था उसका नाम

क्या था (कह०)                                                                                            क्या था’

जिस मण्डए ते स्वाल पुच्छेया तिनी – जुआब दित्तेया (कह०)                                                    ‘जिस लड़के से प्रश्न पूछा उसने उत्तर दिया’

जु़णी बौल्दा-बेॅ घाह देइरा थी,  तिन्हां-बेॅ बोन्हा (कु०)                                                               ‘जिन बैलों को घास दिया था, उनको बांध दो’

जिन्हों मीछो समान लेआऊ तिन्होंखे   पोॅ से देओ (सि०)                                                             जिन आदमियों ने सामान लाया उन्हें पैसे दो’

जु़णी लोकेॅ बुरा केरी रा थी तिन्हां  बेॅ पाप लागा (कु०                                                             ‘जिन लोगों ने बुरा किया था उन्हें पाप लग गया’

जिसा कुड़ीया जो दुआई दित्तुरी थी  तिसारा नाओं क्या था (कह०)                                               ‘जिस लड़की को दवाई दी थी उसका नाम क्या था’

जिसा जणासा जो पूजा खरी लगदी   ओ सुखी रैंह्दी (कां०)                                                          ‘जिस औरत को पूजा अच्छी लगती है वह सुखी रहती है

जेसो छोटीओ बुखार थिया से  डेॅवी गोॅए (महा०)                                                                       ‘जिस लड़की को बुखार था वह चली गई

जिसा बले धन हा तिसा  बले दिल नी ऐ (ह०)                                                            ‘

पास धन है उसके पास दिल नहीं है’

 

6.प्रश्नवाचक सर्वनाम

जिस सर्वनाम से किसी प्रश्न पूछने या कुछ जानने का ज्ञान होता है, उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम सर्वनाम कहते हैं। पहाड़ी में प्रश्नवाचक सर्वनाम ‘कुण’ (कौन और क्या’ हैं। इनमें से ‘कुण’ सजीव प्राणियों से सम्बंधित है तथा क्या (या ‘कि’) निर्जीव वस्तुओं के लिए प्रयुक्त होता है, यथा- घोॅरे कुण ओॅसो ‘घर में कौन है। पन्त सन्दूका च क्या हा ‘सन्दूक में क्या है’। जिस प्रकार सम्बंधवाचक के “जण’ की व्यत्पत्ति ‘यः+पुनः’ से हुई है उसी प्रकार ‘कुण’ भी ‘क:+पन: – कण’ रूप में विकसित हुआ है। अपभ्रंश में इसका रूप कवण था- सं० क:+पुन: – क:+उन । कवण , कुण। इसका सरलतम प्रयोग कुलुई में उपलब्ध है जहां ‘कण’ शब्द ‘कणी’ में बदलता है और सभी कारक प्रत्यय इसमें जुड़ जाते हैं — कुणी ‘किसने’, कुणी-बें ‘किसको’, कुणीन् ‘किससे’, कुणीरा ‘किसका’ आदि। अन्य बोलियों में से बिलासपुरी में यह हिन्दी की तरह ‘किस’, कांगड़ी और चम्बयाली में ‘कस’, मण्डी में ‘केस’ तथा महासुई और सिरमौरी में ‘कौस’ रूप में बदलता है। यह पंल्लिंग एकवचन की कारकीय स्थिति है। स्त्रीलिंग में ये आकारान्त हो जाते हैं अर्थात् पुंल्लिंग किस, कुस, केस, कौस रूप स्त्रीलिंग में क्रमशः किसा, कुसा, केसा, कौसा में बदल जाते हैं, यथा ‘तू कुस मरदा सौगी आया’ परन्तु ‘तू कुसा जणासा सौगी आया’, ‘किस बलदा जो घा दितेया’ परन्तु ‘किसा गाय जो घा दितेया’, ‘मास्टरें कुस डंडे ने मारेया’ परन्तु ‘मास्टरें कुसा सोठीया ने मारेया’ आदि।

           केवल कुलुई में मूल ‘कुण’ शब्द बहुवचन में ‘कुणा’ बनता है- कुण लागीरा होॅसदा ‘कौन हंस रहा है’ बहुवचन में कुणा लागीरे हाॅसदे बन जाता है। शेष किसी भी बोली में विभक्ति रहित ‘कुण’ का बहुवचन रूप नहीं है, परन्तु सविभक्ति कारकीय बहुवचन कुलुई को छोड़ कर शेष सभी बोलियों में पाया जाता है। यह कारकीय बहुवचन किन्हां या कुन्हां है जो पुंल्लिंग और स्त्रीलिंग के लिए समान रहता है- कुन्हां मुण्डुआं फुल्ल तोड़े (कां०) ‘किन लड़कों ने फूल तोड़े’, किन्हां गाइयां जो घा दितेया (कह०) ‘किन गौओं को घास दिया’, सेऊ कुन्हां टस्सुआं मंझ बंडणे (चं०) ‘सेब किन बच्चों में बांटने हैं’ आदि।

          ‘कुण’ के कर्ताकारक सविभक्ति रूप में भी सभी बोलियों में मूल समानता हा सिरमोरी, बघाटी और कुलुई में इसका रूप कुणीए है- शोहरू कुणीए शाधू लड़का किसने बुलाया’, तू कुणीए ढिसो ‘तुझे किसने मारा’। बिलासपुरी और माण्डयाली में ‘कुण’ से ‘किने’ विभक्ति रूप बनता है- मेरी कताब किने चकी ने अदा मरी पुस्तक किसने उठा के लाई’। बहुवचन में सभी बोलियों में एक ही रूप प्रचलित है ‘किन्हें’- किन्हें दसेया जे हऊं बमार हा ‘किन्होंने बताया कि हू, किन्हें लड़कीये ऐजी स्लेट तोड़ी ‘किन लड़कियों ने यह स्लट बहुवचन में लिंग के आधार पर कोई भेद नहीं होता। जा वही स्त्रीलिंग के लिए भी प्रयुक्त होते हैं।                         निर्जीवमूलक प्रश्नवाचक सर्वनाम अधिकतः ‘क्या’ रूप में विद्यमान हिन्दी के समान है, परन्तु प्रदेश के कुछ भागों में ‘की’ या ‘का’ रूप में भी प्रचलन है, यथा शिमला क्षेत्र में ‘का बोलोॅ महाराज’ तथा कुलुई में की महाराज’, अन्यत्र ‘क्या बोला महाराज’। ये सभी संस्कृत ‘किं’ के प्रतिरूप अपभ्रंश में ‘कीआ’ रूप में प्रचलित रहा है। ‘क्या’, ‘की’ अथवा ‘का’ को कर्ताकारक अस्तित्व सूचक में समान रहता है और लिंग तथा वचन के आधार कोई अन्तर नहीं आता। अनिश्चयवाचक के ‘कोई’ और ‘किछ’ में जो सम्म । वही सम्बंध प्रश्नवाचक में ‘कुण’ और ‘क्या’ के बीच है। जहां ‘कण’ का प्रत्ययों के साथ किस-कुस-केस रूप में बदल कर बहुवचन भी बना लेता वहीं ‘क्या’ या ‘की’ पर लिंग और वचन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और हर स्थितियों में समान रहता है। इसका प्रयोग अधिकतः विभक्तिरहित कर्ताकारण और कर्मकारक में ही मिलता है, यथा- ‘क्या सोचादा’ तथा ‘इस च क्या है। आदि। यद्यपि ‘की’ या ‘क्या’ केवल निर्जीव वस्तुओं के लिए प्रयुक्त होता है परन्तु तिरस्कार, अपमान या अभिमान दर्शाने के लिए इसका सजीव प्राणियों के लिए भी प्रयोग होता है, यथा- तू क्या है, तू अपणे जो क्या समझदा, स: क्या है बकादा आदि।

           यहां विभिन्न बोलियों के सर्वनाम शब्दों की रूपावली दी जा रही है

पुरुषवाचक-उत्तम पुरुष

असां

कांगड़ी                               हाऊं

कारक                             एकवचन     बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)   हाऊं             असां

(सविभक्ति)                   मैं                 असे

कर्म                  मिंजो, मुंजो, मिकी         असां जो, सांजो, साकी

करण              मिंजो कन्ने , मेरे कन्ने,   असां कन्ने, ते

                       मेते, मिंजो ते

सम्प्रदान      मिंजो, मेकी, मिकी, मुंजो        असां जो, साकी, अहां जो

अपादान       मिंजो ते, मेते                          असां ते, अहां ते

सम्बंध               मेरा, रे, री,         असांरा, रे, री, दा,

                                              दे, दी, साड़ा, साड़े, साड़ी

अधिकरण        मिंजो पर, च         असां पर, च

 

मण्डियाली                                                      हाऊं

कारक                              एकवचन       बहुवचन 

कर्ता (विभक्ति रहित)     हाऊं              आसे   

         (सविभक्ति)           मैं                 आसे     

कर्म                              मंजो               आसा जो

करण              मात्थे             आसा थे    

सम्प्रदान                  मंजो                 आसा जो

अपादान                मात्थे                 आसा थे 

सम्बंध                मेरा, रे, री            आसारा, रे, री

अधिकरण         मह मंझा              आसा मंझा     

 

बघाटी                                आओं

कारक                              एकवचन     बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)      आओं         हामे

         (सविभक्ति)            मोएं            हामें

कर्म                               मांखे             हामो, हामो खे

करण                  मां साई, साथी, दे     हामो साई, साथी, दे

सम्पदान          मांखे, मेरे खातर          हामो खे, म्हारे खातर

अपादान            मां दा                         हामो दा

सम्बंध             मेरा, रे, री                   म्हारा, रे, री

अधिकरण        मां पांय, बिचे            हामो पाय, बिचे

 

पुरुषवाचक-मध्यम पुरुष

चम्बयाली                        तू (पुंल्लिंग/स्त्रीलिंग)

कारक                             एकवचन        बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)    तू                    तुसां

          (सविभक्ति)          तैंई, तेँ            तुसे

कर्म                        तुज्जो, तिज्जो       तुसु जो, तुसां जो                         

करण               तुज्जो सिते, तेरे का    तुसु जो, तुसां  का              

सम्प्रदान        तेरे ताई, तुज्जो ताईं     तुसु ताई, तुन्धे ताई, तुसां ताई   

अपादान       तुज्जो  थऊं  तेरे का   तुसु थऊं, तुसां का

सम्बंध        तेरा, रे, री                       तुन्धा, धे, धी, तुसां रा, रे,री

अधिकरण     तुज्जो पुठी, उप्पर, मंझ      तुसु पुठी, उप्पर, मंझ

                        तेरे बिच, पर                 तुसां बिच, पर

पुरुषवाचक-अन्य पुरुष

तइब

तेई.

कुलुई                                                सो (पुंल्लिंग)

कारक                             एकवचन         बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)      सो

(सविभक्ति)                    तेईएँ                तिन्हें

कर्म                               तेईबेॅ              तिन्हांबेॅ                                                           

करण                तेईऍ, तेई सोंगेॅ           तिन्हें, तिन्हां सोंगेॅ

सम्प्रदान         तेईबेॅ                           तिन्हांबेॅ     

अपादान          तेई न                          तिन्हां न 

सम्बंध             तेईरा, रे, री             तिन्हांरा, रे, री

अधिकरण       तई न, पांधेॅ        तिन्हां न , पांधेॅ   

 

निश्चयवाचक निकटवर्ती 

चम्बयाली                        (स्त्रीलिंग)

कारक                              एकवचन          बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)    ए                    इन्हां

          (सविभक्ति)           इस                  इन्हां 

कर्म                             इसा जो               इन्हां जो

करण                         इसा कन्ने           इन्हां कन्ने  

सम्प्रदान                इसा जो                  इन्हां जो

अपादान                इसा का                   इन्हां का

सम्बंध                  इसा रा, रे, री,        इसा रा, रे, री,   

अधिकरण                  इसा पर             इन्हां  पर      

 

   

दूरवर्ती प्रत्यक्ष

कहलूरी                        ओह (पुंल्लिंग)

 कारक                           एकवचन               बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)  ओह                       ओह

        (सविभक्ति)          उने                       उन्हां

कर्म                             उस जो                   उन्हां जो

करण                     उस कन्ने, ने, ते           उन्हां कन्ने, ने, ते

सम्प्रदान           उस वास्ते, खातर, तईं,          उन्हां वास्ते, खातर,                                                     

                              ताईं, गठे                      ताईं, गठे

अपादान              उस ते                              उन्हां ते

सम्बंध             उसरा, रे, री, दा, दे, दी         उन्हांरा, रे, री, दा, दे, दी

अधिकरण      उस च, पर, मांझ, गास          उन्हां च, पर, मांझ, गास

 

 

 कारक                           एकवचन            बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)   ओह                 ओह

       (सविभक्ति)           उसा                  उन्हां

कर्म                            उसा जो               उन्हां जो    

करण                    उसा कन्ने, ने, ते,      उन्हां कन्ने, ने, ते,

सम्प्रदान             उसा वास्ते, खातर, तई    उन्हां वास्ते, खातर, तईं,

             ताईं, गठे                         ताईं, गठे

अपादान             उसा ते                      उन्हां ते

सम्बंध              उसा रा, रे, री            उन्हांरा, रे, री

अधिकरण       उसा च, पर               उन्हां च, पर

 

निश्चयवाचक दूरवर्ती परोक्ष

महासुई                            से (पुंल्लिंग)

कारक                             एकवचन         बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)     से                    से

(सविभक्ति)                    तिनीए              तिने

कर्म                              तेसखेॅ, केॅ       तिन्हों खेॅ, केॅ  

करण                           तेस दा, फा, कु      तिन्हों दा, फा, कु

सम्प्रदान                 तेस खेॅ/तेस री ताईं, केॅ      तिन्हों खेॅ/तिन्हों री ताईं, केॅ  

अपादान                    तेस दा, दू,                     तिन्हों दा, दू

सम्बंध                     तेस रा, रे, री                   तिन्हों रा, रे, री

अधिकरण              तेस दा,दे,दी,गाशै,पांदे        तिन्हों दा, दे, दी, गाशै,पांदे

 

                                           ‘स्त्रीलिंग

कारक                              एकवचन           बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)             से             से  

(सविभक्ति)                   तेसे                      तिने

कर्म                      तेसो खेॅ                   तिन्हों खेॅ

करण                तेसो दा, फा, कु              तिन्हों दा, फा, कु

सम्प्रदान         तेसो खेॅ, री ताईं, केॅ   तिन्हों खेॅ, री ताईं, केॅ

अपादान          तेसो दा, दू                              तिन्हों दा, दू

सम्बंध            तेसो रा, रे, री                          तिन्हों रा, रे, री,

अधिकरण      तेसो दा,दे,दी,गाशै,पांदे             तिन्हों दा, दे, दी, गाशै, पांदे

 

कुलुई                                   सो (स्त्रीलिंग)

कारक                               एकवचन           बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)      सो                    ते, तिउंआ

(सविभक्ति)                    तेसॅ                    तिन्हें

कर्म                            तेसाबॅ                    तिन्हांबॅ

करण                      तेसें, तेसा सोंगें       तिन्हें, तिन्हां सोंगें

सम्प्रदान                  तेसाबेॅ                 तिन्हें बेॅ 

अपादान                  तेसा न                   तिन्हां न  

सम्बंध                   तेसारा, रे, री              तिन्हांरा, रे, री

अधिकरण              तेसा न, पांधेॅ               तिन्हां न, पांधेॅ  

 

 

 

सम्बंधवाचक

बघाटी                           जो (पुंल्लिंग)

कारक                           एकवचन               बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)  जो                        जो

(सविभक्ति)                 जेणीए                   जिने

कर्म                              जेस खे                जिनो खे

करण                     जेसी साई, साथी      जिनो साई, साथी

सम्प्रदान         जेसरे खातर, वास्ते, खे   जिनोरी खातर, वास्ते, खे

अपादान                जेसदे, दू, ते                जिनोदे, दू, ते

सम्बंध               जेसरा, रे, री                 जिनोरा, रे, री    

अधिकरण        जेस पांय, मांय, बिचे    जिनो पांय, मांय, बिचे

 

 

                                                         ‘स्त्रीलिंग

कारक                            एकवचन              बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)    जो                      जो

    (सविभक्ति)               जिए                 जिने

कर्म                        जिओं खे                जिओं खे

करण                  जिओं साई, साथी     जिनो साई, साथी

सम्प्रदान          जिओं खे, खातर,       जिनो खे, रे खातर,

                      वास्ते                       वास्ते

अपादान         जिओं दे, दू, ते                जिनो दे, दू, ते

सम्बंध            जिओरा, रे, री                 जिनोरा, रे, री

अधिकरण      जिओं मांय, पाय, बिचे    जिनो मांय, पाय, बिचे

 

अनिश्चयवाचक

मण्डियाली                        कोई (पुंल्लिंग) 

कारक                            एकवचन        बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)   कोई                कोई

        (सविभक्ति)         किने               किन्हें

कर्म                          केसी जो            किन्हीं जो 

करण                   केसी ने, कन्ने        किन्हीं ने, कन्ने

सम्प्रदान          केसी जो, कठे             किन्हीं जो, कठे

अपादान          केसी थे, ते, ले            किन्हीं थे, ते, ले

सम्बंध              केसीरा, रे, री            किन्हीं रा, रे, री

अधिकरण       केसी मंझा, पर          किन्हीं मंझा, पर

 

प्रश्नवाचक

सिरमौरी                                         कुण (पुंल्लिंग) 

कारक                        एकवचन           बहुवचन 

कर्ता (विभक्ति रहित) कुण               कुण

        (सविभक्ति)        कुणीए            किन्हें

कर्म          कौसी खेॅ, केॅ           किन्हों खेॅ, केॅ

करण      कौसी लोई (लोए), दा    किन्हों लोई (लोए), दा

सम्प्रदान    कौसी खेॅ, खातरी     किन्हों खेॅ, खातरी 

अपादान   कौसी गेदा, दू, दो        किन्हों गेदा, दू, दो 

सम्बंध     कौसी रा, रो, री, रे      किन्हों रा, रो, री, रे 

अधिकरण   कौसी दा,पांदे,मांझा,मेंझ    किन्हों दा, पांदे, मांझा,मेंझ

 

     

 

 

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