कारक

कारक

जिस शब्द रूप या चिह्न या विभक्ति से संज्ञा व सर्वनाम का सम्बंध वाक्य शब्दों से स्थापित होता है, कारक कहलाता है। पहाड़ी में भी हिन्दी आदि भाषाओं की तरह सम्बोधन सहित आठ तरह के कारक हैं।

कर्ता कारक

 संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के करने वाले का बोध हो, उसे जाकारक कहते हैं। कर्ताकारक दो तरह का होता है- अप्रत्यय तथा सप्रत्यय।

(1) बिना प्रत्यय शब्द मूल रूप में रहता है- बाब, मुंडू, कुड़ी, शोहरी,शाशू आदि।

(2) सप्रत्यय कारक ‘ने’ के अर्थ में बदलता है।

पहाड़ी भाषा की सभी बोलियों में कारक रूपों की मूलभूत समानताएं हैं। जहां हिन्दी, पंजाबी आदि आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं में विभिन्न कारकों के स्वतंत्र प्रत्ययों का संचालन हुआ है वहीं पहाड़ी की बोलियों में कुछ संस्कृत के विभक्ति स्वरूप भी परिलक्षित होते हैं। हिन्दी, पंजाबी, डोगरी में कर्ताकारक का प्रत्यय ‘ने’ है, परन्तु पहाड़ी में इसका विभक्ति रूप ‘ए’ है जो अकारान्त, आकारान्त को छोड़कर अन्य स्वरांत प्रातिपदिकों में मूल रूप में जुड़ता है, यथा –

मुंडूए चिट्ठी लिखीयो (कां०)               ‘लड़के ने चिट्ठी लिखी है’

शोहरीए फूल आणीरा (कु०)             ‘लड़की ने फूल लाया है’

बुढीए कताब पढ़ी (चं०)                    ‘बुढ़िया ने किताब पढ़ी’

सियाणीए फसल नी कट्टी (कह०)      ‘बुढ़िया ने फसल नहीं काटी’

मुनुए बजारा ते सौदा लियांदा (मं०)    ‘लड़के ने बाजार से सौदा लाया

अ- आकारान्त तथा व्यंजनान्त प्रातिपादिकों में ‘ए’ मात्रा रूप में प्रयुक्त होता है –

बाबे हत्थ जोड़ी ने गलाया (कां०)          ‘बाप ने हाथ जोड़कर कहा’

बौलदे घा नी खाओ (सि०)                   ‘बैल ने घास नहीं खाया’

घोड़े दलत्ती मारी                                 ‘घोडे ने दुलत्ती मारी’

राजे भूरी सिंह इक अजायब घर           ‘राजा भूरी सिंह ने एक संग्रहालय

बणाया (चं०)                                        बनाया

महासुई तथा सिरमौरी में प्रायः ‘आ’ से भी सप्रत्यय कर्ताकारक बनता है,

यथा –

हाथीआ बीख ढालोॅ (महा०)                   ‘हाथी ने वृक्ष गिराया’

बाबेआ रोटी खाई (महा०)                      ‘बाप ने रोटी खाई’

कर्म कारक

जिस वस्तु या व्यक्ति पर क्रिया के व्यापार का प्रभाव पड़े उसे का कहा जाता है। पहाड़ी भाषा की कांगड़ी, चम्बयाली, मण्डियाली, कहली बोलियों के विस्तृत क्षेत्र में कर्मकारक का प्रत्यय ‘जो’ है। ‘जो’ प्रत्यय लगने आकारान्त संज्ञा शब्द एकारान्त तथा व्यंजनान्त शब्द आकारान्त हो जाते है ईकारान्त शब्दों में ‘या’ जुड़ता है, यथा-

तिनी पुत्रा-जो चिट्ठी लिखी (चं०)                ‘उसने पुत्र को चिट्ठी लिखी’

छिंबे-जो बरखा च बी कपड़े धोणे              ‘धोबी को वर्षा में भी कपड़े धोने पड़े।

पए (कह०)

लोके राजे-जो धन दितेआ (मं०)               ‘लोगों ने राजा को धन दिया’

हरिया डालिया-जो मत बढा (कां०)           ‘हरी डाली को मत काटो’

पहाड़ी भाषा की भीतरी शाखा की बोलियों में से कुलुई का कर्मकारक

प्रत्यय बेॅ है, तथा अन्य बोलियों का यह प्रत्यय ‘केॅ’ तथा ‘खेॅ’ है—

आसा एबेॅ जाणा घौरा बेॅ (कु०)                  ‘हम अब जाएंगे घर को’

बाबेआ छोहरू-खें किताब आणे (महा०)   ‘बाप ने लड़के को किताब लाई’

गुरुजीए मुखें कताब देई राखी                   ‘गुरुजी ने मुझे किताब दे रखी है पढ़ने

पढ़नोॅ-खेॅ (सि०)                                        को’

भाभी तेस के बड़ी नराज ओई (महा०)      ‘भाभी उसको बहुत नाराज़ हुई’

करण कारक

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के साधन का बोध हो, उसे करण कारक कहते हैं। कर्ताकारक की विभक्ति ‘ए’ पहाड़ी भाषा में करणकारक का विभक्ति रूप भी है। पहाड़ी भाषा में कर्तृकारक के ‘ने’ सम्बंधी अर्थ को करण भिव्यक्त करना एक विशेषता है। ‘भाऊऍ रोटी खादी’ का पहाड़ी भाषा में भाव बच्चे द्वारा (या से) रोटी खाई गई है। इस तरह सभी बोलियों में कर्ताकारक करणकारक का प्रत्यय ‘ए’ ही है, यथा- कलमे लिख ‘कलम से लिख’ तलुआरीए काट ‘तलवार से काट’, रमाले नक्क पुंज ‘रूमाल से नाक साफ कर’ हौछुऍ भोॅ रुआ फाढ़ा ‘आंसुओं से भर गई गोद’, हात्थे कितिरा काम आदि। हां, कई अधिक स्पष्टता के लिए चम्बयाली, मंडियाली, कांगड़ी, कहलूरी, बघाटी में ने ‘कन्ने’, ‘सिते-साई-साथे’ का प्रयोग होता है और अन्य बोलियों में ‘लई लोये-लाइये’, ‘सूंगे-संगे-सोँ गे’ आदि प्रत्यय भी प्रयुक्त होते हैं। यह केवल अधिक स्पष्टता के कारण है, अन्यथा ‘ए’ का ही प्रचलन है –

अमें फुल्लां-ने देवी-देवता सजाए  थे (कह०)    ‘हमने फूलों से देवी-देवता सजाए थे’

ठंडू-ने सरीर कंबणा लगा (कां०)                     ‘ठण्ड से शरीर कांपने लगा’

तिनी पत्थरा-कन्ने पंछी मारेया (चं०)                 ‘उसने पत्थर से पक्षी मारा’

जिमीदार कुदालू-कन्ने आलू खोदेया करां था (मं०)    ‘कृषक कुदाल से आलू खोद रहा था’

कानो-लई सुणा कर आखी-लई देखी  कर (सि०)     ‘कान से सुना कर आंख से देखा कर’

तेईए लौते-लाइये मारू (कु०)            उसने लात से मारा’

मज़दूर कुराड़ी-कु बीख काटदो  लागेदोॅ (महा०)        मज़दूर कुल्हाड़ी से वृक्ष काट रहा है’

पडै़त्री-सिते शाग चीर (चं०)             ‘पडै़त्री से (के साथ) साग चीर’ –

आंगण द्वार बच्चेया रिया किलकारिया  साई भरी गिया (बघा०)  ‘आंगन द्वार बच्चों की किलकारियों से  भर गया’

 

सम्प्रदान कारक

कर्ता जिसके लिए क्रिया करता है, उसे सम्प्रदान कारक कहते हैं। यह लखनीय है कि पहाड़ी भाषा में कर्मकारक तथा सम्प्रदान कारक दोनों के समान प्रत्यय हैं। पहाड़ी की बाहरी शाखा की बोलियों में कर्म तथा सम्प्रदान कारकों का परत्यय जो’ है। कुलुई में यह प्रत्यय ‘बेॅ’ है तथा पहाड़ी भाषा की भीतरी शाखा की तयों में कर्मकारक तथा सम्प्रदान का प्रत्यय ‘खे’ है। यह ध्यातव्य है कि प्रदान कर्म याकारक के प्रत्यय ‘जो’, ‘खे’ या ‘बे’ जोड़ने से पहले प्रातिपदिक विकारी रूप धारण करते हैं और ऐसा विकार नियमबद्ध है- आकारान्त शब्द एकारान्त हो जाते हैं, छिंबा से छिंबे, बाबा से बाबे, राजा से राजे आदि शब्द आकारान्त हो जाते हैं- घर से घरा, पुत्र से पुत्रा, धन से धना आदि शब्दों के साथ ‘या’ अधिक जुड़ जाता है- हरी से हरीया, डाली से – से देरीया, मुनी से मुनीया आदि। शेष प्रकार के शब्द विकार धारण छोहटु, छोहरू आदि उसी रूप में रहते हैं।

अनेक बार सम्प्रदान की कर्मकारक से स्पष्टता दशनि के लिए ताईं, तांइये, वास्ते, खातर आदि प्रत्ययों का भी प्रयोग होता है। ऐसे प्रत्ययों  में ताँई का सर्वाधिक प्रयोग होता है। मूल रूप में यह परसर्ग है जो ‘के लिए’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है। यथा- कुड़ी री ताईं पैसे रखोरे। मूल रूप में यह हिन्दी अव्यय । उर्दू शब्द ‘वास्ते’ का समानार्थक है, और प्रयोग भी ठीक इसी प्रकार होता हैं। कुछ और उदाहरण देखे जा सकते हैं –

मुंऍ तेसीखेॅ खाणो-खेॅ रोटी दी (सि०)             ‘मैंने उसे खाने के लिए रोटी दी

कुत्ते जो मारणे-ताईं सोठी अण (चं०)            ‘कुत्ते को मारने के लिए डंडा ला

बेटे री-तांइये में ऋण बी लेणा (कु०)              बेटे के लिए मैं ऋण भी लंगा’

देरीया-वास्ते जुआब देओ (कां०)                 ‘देरी के लिए जवाब दें

बुढ़े जो मुंडुए-खातर कताबा लिऔणे            ‘बाप को लड़के के लिए पुस्तकें लान

पई (कह०)                                                  पड़ीं

तेस जो पहणने-कठे कपड़े देओ (मं०)          ‘उसको पहनने के लिए कपड़े दो’

छोटी मुनीया खे पीणे वास्ते दुध ‘                   छोटी बच्ची को पीने के लिए दूध दिया

दित्तेया था (बघा०)                                        था

अपादान कारक

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से पृथक् होने का अर्थ प्रकट हो, उसे । अपादान कारक कहते हैं। इसके भिन्न बोलियों में भिन्न प्रत्यय हैं- न, का, दू-दा-दो-दोॅ, ले-ते-थे-थऊँ आदि।

चम्बयाली बोली में अपादान कारक का प्रत्यय ‘का’ है- पत्थरों का पता नी चलदा ‘पत्थर से पता नहीं चलता’। यदि मूल शब्द आकारान्त हो तो अपादान कारक का प्रत्यय ‘का’ लगने पर आकारान्त शब्द एकारान्त में बदल जाता है। जमणा’ से विकारी रूप ‘जमणे’ तथा जमणे का लेई करी मरन चम्बयाली की उप-बोली गादी में यह प्रत्यय ‘थऊं’ है- हत्या थॐ भी छुटीगो ‘हाथ से बर्तन गिर गया। पहाड़ी भाषा की सभी बोलियों में यद्य प्रत्यय भिन्न हैं, परन्तु मूल शब्दों के रूप-परिवर्तन के नियम प्रायः चम्बयालाी समान हैं। कांगडी अपादान का प्रत्यय ‘ते’ है तथा इसके प्रयोग में प्रातिपदिक एकारान्त हो जाता है, यथा- ‘चाचा’ से चाचे – चाचे ते अपणा नां पुच्छी ने मण्डियाली बोली में अपादान का प्रत्यय ‘थे’ है। यहां व्यंजनान्त शब्द आकारान्त हो जाते हैं- तू घरा थे कधियाड़ी आया। सिरमौरी और जौनसारी में अपादान का प्रत्यय ‘दू’ या ‘दो’ है – धुओॅ छ़ापरा दू आहे लागो था ‘धुआं छत दा था’। यही प्रत्यय बघाटी और महासुई में प्रचलित है परन्तु यहां ‘दू’ योग अधिक है- मेरे काना-दू लोहू लागा निकलदा ‘मेरे कान से लहू रहा है’। विष्णु जी तपस्येॅ दू उठेॅ ‘विष्णु जी तपस्या से उठे’। महाराज दू आगू डेवे ‘महाराज आगे से आगे गए’ आदि।

कुलुई बोली में अपादान का कोई प्रत्यय नहीं वरन् विभक्ति-चिह्न ‘न्’ है से प्रायः ‘न’ रूप में ही लिखा जाता है। व्यंजनान्त प्रातिपदिकों को छोड़कर . अन्यत्र ‘न’ सर्वदा शब्द के मूल रूप में जुड़ता है। शब्दों में कोई विकार नहीं आता।व्यंजनान्त प्रातिपदिक ‘न्’ विभक्ति जुड़ने से पहले आकारान्त हो जाते हैं, यथाचल्हा न भौस खोज ‘चूल्हे से राख निकालो’, नाका न पाणी निकता ‘नाक से पानी निकला आदि। यह उल्लेखनीय है कि चम्बयाली के अतिरिक्त पहाड़ी की शेष सभी बोलियों के अपादान-प्रत्यय एक ही वर्ग अर्थात् तवर्ग के अक्षर हैं। कांगड़ी और कहलूरी का ‘ते’ इसी कारक की संस्कृत पंचमी विभक्ति ‘त्’ से व्युत्पन्न हुआ है, यथा – ‘तस्मात्’ से ‘तिसते’, रामात् से रामाते, बालकात् से बालका ते आदि। यही ‘ते’ प्रत्यय मण्डियाली में थे’ तथा गादी में ‘थऊ’ बना। आगे चल कर यह ‘थे’ महासुई और बघाटी में ‘दू’ तथा सिरमौरी जौनसारी में ‘दों’ और कुलुई में ‘न्’ बना, हालांकि कुलुई का ‘न्’ संस्कृत की इसी विभक्ति के ‘नः’ या ‘णः’ से प्राप्त हुआ है। संस्कृत में इकारान्त, उकारान्त, नपुंसकलिंग की अपादान विभक्ति ‘नः’ अथवा ‘णः’ है, यथा – सं० आत्मनः कु० आत्मान्, गुणिनः > गुणीन्, कर्मणः > कर्मान् आदि। अपादान के कुछ और उदाहरण देखे जा सकते हैं –

से छत्ता-का रिड़की करी मरी गिया(चं०)                                  ‘वह छत से गिर कर मर गया’

शिमलो दोॅ ठियोग केतणो दूर ओॅसो (महा०)                         ‘शिमला से ठियोग कितनी दूर है’

पेड़ो दोॅ पाचटी झोड़ी (सि०)                                                     ‘पेड़ से पत्ते गिरे’

डाक्टरोॅ दोॅ दवाई लैओं (सि०)                                                  ‘डाक्टर से दवाई ले लो

इथी ले ते थे मण्डी कितणी दूर ही (मं०)                                    ‘यहां से मण्डी कितनी दूर है’

सम्बन्ध कारक

संज्ञा और सर्वनाम का अन्य वस्तुओं से सम्बंध प्रकट करने । संम्बंध कारक कहलाते हैं।

पहाड़ी में सम्बंधकारक के चार श्रेणियों के प्रत्यय प्रचलित हैं दा-दे-दी, णा-णे-णी तथा का-के-की। इनमें से दा-दे-दी प्रत्यय पंजाब के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रयोग में आते हैं। ये डोगरी के भी प्रत्यय हैं। पहाडी रे-री का प्रयोग सर्वाधिक है और चाहे बोलियां भीतरी शाखा की हों या शाखा की, सभी में रा-रे-री का प्रयोग प्रचलित है। हिन्दी भाषा में भी प्रचलन है, परन्तु वहां ये मात्र पुरुषवाचक उत्तम और मध्यम पुरुष सर्वनाम सीमित हैं- मेरा-हमारा, तेरा-तुम्हारा। पहाड़ी में ये प्रत्यय सभी सर्वनामों , संज्ञा-नामों के साथ प्रयुक्त होते हैं। णा-णे-णी केवल निजवाचक सर्वनाम के रहता है- अपणा-अपणे-अपणी। का-के-की सम्बंधकारक प्रत्यय हिन्दी भाषा हैं। पहाड़ी में इनका प्रयोग बड़ा सीमित है और विशेषतः कुछ बोलियों में केवल कालवाचक क्रियाविशेषण की स्थिति में मिलता है, यथा- हिज़का ‘पिछले कल का’, फोॅरज़का ‘पिछले परसों का’, संझका ‘सायंकाल का’, दोतका ‘सवेरे का। आदि। सिरमौरी व महासुई बोली में यद्यपि रा-रे-री प्रत्यय ही चलते हैं, परन्तु विवेक में कभी का-के-की का प्रयोग किया जाता है, यथा- साधटुए पाणी का लोटा हाथो दा लिया। यहां ‘पाणी का लोटा’ में का’ के स्थान पर ‘रा’ का प्रयोग भी होता है।

पहाड़ी भाषा में सम्बंधकारक प्रत्ययों का प्रयोग हिन्दी, पंजाबी आदि । अनेक भारतीय आर्य भाषाओं से भिन्न है। इन भाषाओं में आकारान्त प्रातिपदिकों को । छोड़कर शेष सभी प्रकार के प्रातिपदिक सम्बंधकारक प्रत्यय लगने से पूर्व मूल रूप । में रहते हैं, यथा- घर का काम, हाथी के दान्त, आलू की सब्जी आदि में का, के, की के जुड़ने से पहले संज्ञा शब्द घर, हाथी और आलू अपने मूल रूप में रहे। उनमें कोई विकार नहीं आया। परन्तु पहाड़ी भाषा में रा, रे, री से पूर्व संज्ञा शब्दों में विकार आता है और यह विकार ‘आ’ के योग से आता है। पहाड़ी में उक्त वाक्यांश इस प्रकार होंगे- घरा रा काम, हाथीआ दे दंद, आलूआ री सब्जी आदि । श्रुति के कारण इ-ईकारान्त’ शब्दों का रूप बदल सकता है, यथा- चाचीआ » चाचिया या चाचाया, कुड़ीआ > कुड़ीया अथवा कुड़िया आदि। सिरमौरी, महासुई आदि बोलियों में निश्चय ही ‘ओं’ में बदलेगा। इसका पहले ही ध्वनि-तत्त्व के अन्तर्गत उल्लेख किया जा चुका है। जहां तक आकारान्त शब्दों का सम्बंध है, ये शब्द हिन्दी पहाड़ी में सम्बंधकारक प्रत्ययों से पूर्व समान रूप से एकारान्त हो जाते हैं

‘लड़का’ से ‘लड़के का (रा) नाम घोड़ा’ से ‘घोड़े की (री) सवारी’, ‘तारा’ से तारे की री लौ’ आदि। कुछ उदाहरण नीचे देखे जा सकते हैं-

जिमींदारा-रा डोखरा बांजर पोॅ ड़ेॅ  रोॅआ (महा०)           ‘ज़मींदार  का खेत बंजर पड़ा है’

भरमौरा-रे मंदर छैल हिन (चं०)                ‘भरमौर के मंदिर सुन्दर हैं’

घोड़े री ज़ीन टुटी गई (मं०)                       ‘घोड़े की जीन टूट गई’

मेरी चाचीया दे मुंडुए दो ब्याह ऐ (को०)     ‘मेरी चाची के बेटे का विवाह है’

राम दी बड्डी ‘ सेना थी (को०)                     ‘राम की बड़ी सेना थी’

एसे कोटो का रंग लाल ऑसों (सि०)          ‘इस कोट का रंग लाल है’

पीउली चिड़िया रा कोल्हा किनी               ‘पीली चिड़िया का घोंसला किसने

खराब कित्तीया (बघा०)                            उजाड़ा’

जबरे जिमीदारां दे खेतर खिल्ले पईगे (ह०)  ‘बूढ़े किसानों के खेत बंजर पड़ गए’

अधिकरण कारक

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के आधार का बोध हो, उसे अधिकरण कारक कहते हैं। पहाड़ी में अधिकरण के ‘में’ और ‘पर’ दो रूप हैं। अधिकरण के प्रत्यय ‘में’ के अर्थ में पहाड़ी भाषा का मुख्य प्रत्यय ‘मंझ’ है जो सामान्य ध्वनि परिवर्तन के साथ सभी बोलियों में प्रयुक्त होता है। चम्बयाली, गादी और चुराही में ‘अंदर’ और ‘बिच’ के साथ-साथ ‘मंझ’, मण्डियाली में मंझा’, महासुई और सिरमौरी में मांझा, कुलुई में मोंझे तथा बघाटी में ‘मांय’ रूप में इसका प्रयोग मिलता है। इसका प्रयोग विभक्ति रूप में भी पर्याप्त मिलता है। कुलुई में इसका विभक्ति रूप ‘न’ है यथा –

छ़ीड़ी काटिया चू़ल्हा-न भौर (कु०)                 ‘लकड़ी को काट कर चूल्हे में डालों |

मंझ और मांय के उदाहरण भी देखे जा सकते हैं

घराटा-मंझ आटा पिहींदा (चं०)                     ‘घराट में आटा पीसा जाता है।

मुल्खा-मंझा नकाल पेआ (मं०)                      ‘देश में अकाल पड़ा है

थोड़ी देरी-मांय खूब दीण लगी (बघा०)          ‘कुछ देर में खूब बर्फ गिरने लगी

सिरमौरी और महासुई में ‘मांझा’ के अतिरिक्त अन्य प्रत्यय ‘दा’ है, यथा तेसरे गांवा-दा काल पौड़ी गोआ (महा०) उसके गांव में अकाल पड़ गया है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि यह लिंग और वचन के आधार पर बदलता है। यह स्त्रीलिंग के लिए ‘दी’ तथा बहुवचन के लिए  ‘दे’ में बदलता है,

यथा –

लोटड़ी-दी चीश नी रोॅई (महा०)                ‘लोटी में पानी नहीं रहा’

बाटोॅ-बांदर ओॅसोॅ (सि०)                           ‘रास्ते में बंदर हैं’

बाहरी शाखा की बोलियों में पंजाबी का ‘बिच’ प्रत्यय या इसका  रूप ‘च’ का प्रयोग भी मिलता है, यथा-

कन्ना-च कण्हा पेआ (कह०)                       ‘कान में मकड़ी पड़ी

अधिकरण के दूसरे रूप ‘पर’ के अर्थ में इसके प्रत्यय इस प्रकार

गास-गाहे-गाशै, पर-पाएं-पांदे-पांधे-पांदी-पुठी। यथा-

सिरा–गास टोकरी लेई ने चलीरा था (कह०)            ‘सिर पर टोकरी लिए जा रहा था

हाथा-गाहे कताबा थी (महा०)                  ‘हाथों पर किताबें थीं’

जीवो-गाशै दया कॉरों (महा०)                 ‘जीवों पर दया करो’

कताब मेज्जा पर ई (मं०)                         ‘पुस्तक मेज़ पर है’

कुछ अन्य उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

एसा भूइयां-पांय तीज-तिहार मनाये जांदे ओ (बधा०)         इस भूमि पर तीज त्योहार मनाए जाते है

फौफू-पांधे कदाल कीबें पाऊ (कु०)                   ‘कन्धे पर कुदाल क्यों रखा है

छापरा-पांधे छौली शुकणे डाहिंदी (कु०)              छत पर मक्की सूखने रखी है

एसके मुंडो-पांदे टोपे ओॅसोॅ (सि०)                       ‘इसके सिर पर टोपी है’

से ओहा कुली-पुठी अंधा भुचीगो (चं०)                 ‘वह उस लड़की पर लट्ट हो गया

सम्बोधन

संज्ञा के जिस रूप से किसी को सम्बोधित किया या पुकारा जाए, उसे सम्बोधन कहते हैं। पहाड़ी में कुछ सम्बोधून प्रत्यय लिङ्ग के आधार पर बदलत हैं, जैसे कुलुई में ‘हे’ के लिए पुंल्लिंग में ‘एई’ और स्त्रीलिंग में एऊ’ रूप प्रचलित हैं।

एई शोहरुआ, लौड़िदा मत            ‘हे लड़के! लड़ मत

एई शोहरुओ, चुप बेशा                  ‘हे लड़को! चुप बैठो’

एऊ शोहरीए, पौढ़दी बेश               ‘हे लड़की! पढ़ने बैठ’

एऊ शोहरीओ, कोम निभू की नी    ‘हे लड़कियो! काम समाप्त हुआ या नहीं।

इसी प्रकार कुछ प्रत्यय लिङ्ग व वचन के आधार पर बदलते हैं, जैसे – में ‘अरे’ के लिए स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त ‘अड़िये’ प्रत्यय पुंल्लिंग में ‘अड़ेया’ तथा बहुवचन में क्रमशः ‘अड़ियो’ और ‘अड़ेयो’ रूप धारण करते हैं, यथा –

अड़िये चाचीए, तू मेरी गल सुणदी                        अरी चाची! तू मेरी बात सुनती

ई नी                                                                   ही नहीं’

अड़ेया छोकरुआ, इत्थू आ                                 अरे छोकरे ! इधर आ’

अड़ियो चाचिओ, तुसां मता गलांदियां  हो’              ‘अरी चाचियो ! तुम सब बहुत बोलती

अडे़यो छोकरुओ, मेरी गल्ल बी मन्नी लिया            ‘अरे छोकरो! मेरी बात भी मान लो’

उक्त प्रत्ययों के अतिरिक्त शेष प्रत्ययों में प्रायः कोई विकार दिखाई नहीं देता-

ए मठेया, सिरा पर ए क्या चकीरा (मं०)               ‘ए लड़के! सिर पर यह क्या उठाया

ए मठीए, क्या लगीरी करदी (मं०)                       ‘ए लड़की! क्या कर रही है।

ओरे छोह्टुआ, केरखे डिउणा (महा०)               ‘अरे लड़के! किधर जाना है।

ओरे छोह्टीए, आपणे टाले धो (महा०)               ‘अरी लड़की! अपने कपड़े धो

ओरे छोह्टुओ/छोह्टीओ, औरे  हाण्डोॅ (महा०)  ‘अरे लड़को/लड़कियो! इधर आओ’

ओ मुंडेओ, खड़ीह, जाओ (चं०)                         ‘हे लड़को! खड़े हो जाओ’

ओ कुड़िओ, खड़ीह जाओ (चं०)                        ‘हे लड़कियो! खड़ी हो जाओ’

ओ मया मास्टरा, स्कूले रा टैम  होई गिया (ह०)   ‘अरे मास्टर! स्कूल का समय हो गया

ओ मयो मास्टरो, स्कूले रा  टैम होई गिया (ह०)    ‘अरे मास्टरो! स्कूल का समय हो गया

हे भगवान्, सारेआं दी रच्छा कर (ह०)              ‘हे भगवान् ! सब की रक्षा कर

ऊ कमला, क्या लगीरी करदी (मं०)                  ‘ओ कमला! क्या कर रही है

उक्त उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि सम्बोधन में प्रत्ययों के अतिरिक्त मूल सज्ञा शब्दों में भी परिवर्तन आता है और यह परिवर्तन वचन के आधार पर भी होता है तथा लिंग के आधार पर भी। सभी प्रकार के पुंल्लिंग शब्द सम्बोधन के लिए आ जोड़ते है — छ़ोह्टु से ‘ए छोह्टुआ’, मुनु से ‘ए मुनुआ’, बंदर से ओ बंदरा मठा से ‘ए मठेआ’ (श्रुति के कारण ए मठेया), नेगी से ‘ए नेगीआ’ (या नेगीया) आदि। पुल्लिंग शब्द बहुवचन में ‘आ’ को ‘ओ’ द्वारा प्रतिस्थापित करते हैं, मुंडेआ’ बहुवचन के लिए ‘ओ मुंडेओ’ हो जाता है। इसी तरह ‘ओरे छोहर ‘ओ मयो मास्टरो’, ‘ओ सियाणेओ’ आदि। स्त्रीलिंग में मूल शब्द संबोधन के लिए ऍकारान्त हो जाता है- एउ भगदी मोंत (अरी भेड़, भाग मत), ओ मिये खपरीएँ तू मिंजो पर हर बेलें रँहदी (अरी बुढ़िया, तू मेरे पर हर समय जली रहती है), ओ सियाणीएँ इत्थी’ (हे बुढ़िया, यहां बैठ) आदि। इन उदाहरणों में भेड़, खपरी, सियाणी ” सम्बोधन में क्रमशः भेड़ें, खपरीएँ, सियाणीएँ में बदल गए। बहुवचन में स्त्री, शब्द भी पुंल्लिंग की तरह ओकारान्त हो जाते हैं।

कुछ संज्ञाओं का कारकीय रूपान्तरण नीचे दिया जा रहा है –

अकारान्त पुंल्लिंग

कांगड़ी                         बल़द

कारक                           एकवचन       बहुवचन

कर्ता (विभक्ति रहित)     बल़द             बल़द

(सविभक्ति)         बल़दे             बल़दां

कर्म                               बल़दा जो       बल़दां जो

करण                  बल़दा ते, ने, कन्ने       बल़दां ते, ने, कन्ने

सम्प्रदान              बल़दा जो, वास्ते,       बल़दां जो, वास्ते

खातर, तईं, ताईं   खातर, तईं, ताईं

अपादान               बल़दा ते                    बलदां ते

सम्बंध                 बल़दा दा, दे, दी                बल़दां दा, दे, दी

अधिकरण          बल़दा च, पर, बिच              बलूदां च, पर, बिच

सम्बोधन                                    ओ बल़दा!                          ओ बलदो!

अकारान्त स्त्रीलिंग

बघाटी                      कताब

कारक                      एकवचन       बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)   कताब       कताबा

(सविभक्ति)                 कताबे       कताबे

कर्म                        कताबा खे      कताबा खे

करण               कताबा दे, साई      कताबा दे, साई

सम्प्रदान       कताबा खे, री खातर    कताबा खे, री खातर,

                              वास्ते                   वास्ते

अपादान         कताबा दे, दू, ते            कताबा दे, दू, ते

सम्बंध           कताबा रा, रे, री            कताबा रा, रे, री

अधिकरण       कताबा पांय, मांय, बिचे       कताबा पांय, मांय, बिचे

सम्बोधन        हे कताबे!                  हे कताबे!

अकारान्त स्त्रीलिंग

मण्डियाली             सास

कारक                        एकवचन          बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)      सास            सासा

(सविभक्ति)                    सारो            सासां

कर्म                           सासा जो          सासां जो

करण                  सासा ने, कन्ने         सासां ने, कन्ने

सम्प्रदान              सासा जो, कठे        सासां जो, कठे

अपादान                सासा ते, थे, ले,      सासां ते, थे, ले,

सम्बंध                 सासा रा, रे, री,         सासां रा, रे, री

अधिकरण            सासा मंझा, पर        सासां मंझा, पर

सम्बोधन                ए सासे!              ए सासो!

:

अकारान्त स्त्रीलिंग

हमीरपुरी            जणास

कारक                          एकवचन            बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)     जणास             जणासां

(सविभक्ति)                   जणासे              जणासां

कर्म                           जणासा जो           जणासां जो

करण                  जणासा ते, ने कन्ने,      जणासां ते, ने, कन्ने

सम्प्रदान             जणासा ताईं, वास्ते      जणासां ताईं, वास्ते

अपादान              जणासा ते                    जणासां ते

सम्बंध               जणासा दा, दे दी,      जणासां दा, दे दी,

                               रा, रे, री              रा, रे, री

अधिकरण            जणासा च, पर          जणासां च पर  

सम्बोधन              ए जणासे!                 ए जणासो !

आकारान्त पुंल्लिंग

सिरमौरी                   घोड़ा

कारक                    एकवचन              बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)      घोड़ा     घोड़े

(सविभक्ति)                     घोड़े     घोड़े

कर्म                   घोड़े खेॅ, केॅ         घोड़े खेॅ, केॅ

करण                 घोड़े दा, लोई           घोड़े दा, लोई

सम्प्रदान           घोड़े खेॅ, री खातरी     घोड़े खेॅ, री खातरी

अपादान              घोड़े गेदा, दू, दो      घोड़े गेदा, दू, दो

सम्बंध                घोड़े रा, रे, री,              घोड़े रा रे, री

                            का, के, की                का, के, की

अधिकरण        घोड़े पांदे,दा,मेंझ,मांझा     घोड़े पांदे, दा, मेंझ,मांझा

सम्बोधन              हे घोड़ेया!                  हे घोड़ेयो!

ईकारान्त पुंल्लिंग

सिरमौरी                 हाथी 

कारक                 एकवचन          बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)     हाथी         हाथी

(सविभक्ति)                  हाथीए       हाथीए

कर्म     हाथी/हाथी खेॅ, केॅ      हाथी/हाथी खेॅ, केॅ

करण                हाथी लोई, लोए      हाथी लोई, लोए

सम्प्रदान         हाथी खेॅ                 हाथी खेॅ

अपादान       हाथी गेदा, दू, दो           हाथी गेदा, दू, दो

सम्बंध            हाथी रा, रे, री, रो           हाथी रा, रे, री, रो

अधिकरण       हाथी पांदे,दा,मेंझ,मांझा      हाथी पांदे, दा, मॅझ, मांझा

सम्बोधन                हे हाथियो!                हे हाथियो!

इंकारान्त स्त्रीलिंग

चम्बयाली                      हरणी

कारक                        एकवचन     बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)     हरणी           हरणी

(सविभक्ति)                  हरणीए          हरणियां

कर्म           हरणी/हरणीया जो         हरणियां जो

करण             हरणी का              हरणियां का

सम्प्रदान      हरणी जो, ताईं               हरणियां जो, ताईं

अपादान        हरणी का, थऊं                  हरणी का, थऊं

सम्बंध           हरणी रा, रे, री,                हरणियां रा, रे री,

                      दा, दे  दी                      दा, दे दी

अधिकरण      हरणी पुठी, पर, मंझ     हरणियां पुठी, पर, मंझ

सम्बोधन      ओ हरणीए!                        ओ हरणियो!

आकारान्त स्त्रीलिंग

चम्बयाली                     अम्मा 

कारक                       एकवचन          बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)    अम्मा          अम्मा

(सविभक्ति)      अम्मे            अम्मे

कर्म                  अम्मा जो      अम्मा जो

करण               अम्मा का, शा  अम्मा का, शा

सम्प्रदान         अम्मा जो              अम्मा जो

अपादान         अम्मा का, शा         अम्मा का, शा

सम्बंध          अम्मा रा, रे, री       अम्मा रा, रे, री

                      दा, दे, दी                    दा, दे, दी

अधिकरण     अम्मा पुठी, पर, मंझ    अम्मा पुठी, पर, मंझ

सम्बोधन           हे अम्मा!                 हे अम्मा!

सम्बोधन          हे अम्मा!                 हे अम्मा!

ऊकारान्त पुंल्लिंग

कुलुई                   शोहरू

कारक                        एकवचन       बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)  शोहरू          शोहरू

(सविभक्ति)              शोहरूऍ          शोहरूएँ

कर्म                         शोहरू बेॅ       शोहरू बेॅ

करण        शोहरूऍ, शोहरू सोंगेॅ    शोहरूऍ, शोहरू सोंगेॅ

सम्प्रदान   शोहरू बेॅ, री तांइये      शोहरू बेॅ, री तांइये

अपादान                     शोहरू न       शोहरू न

सम्बंध                शोहरू रा-रे-री      शोहरू रा-रे-री

अधिकरण        शोहरू न, पांधे, मोंझे       शोहरू न, पांधे, मोंझे

सम्बोधन          एई शोहरूआ !            एई शोहरूआ !

ऊकारान्त स्त्रीलिंग

महासुई                        शाशू

कारक                       एकवचन   बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)     शाशू       शाशू

(सविभक्ति)                 शाशूए       शाशूए

कर्म                  शाशू केॅ, खेॅ     शाशू केॅ, खेॅ

करण                शाशू दा, फा, कु   शाशू दा, फा, कु

सम्प्रदान          शाशू केॅ, खेॅ     शाशू केॅ, खेॅ

अपादान           शाशू दा, दू           शाशू दा, दू

सम्बंध             शाशू रा, रे, री       शाशू रा, रे, री

अधिकरण       शाशू दा, दे, दी, पांदे    शाशूओ दा, दे, दो, पांदे,

           पांदी, मांझा, गाहे, गाशै     पांदी, मांझा, गाहे, गाशै

सम्बोधन      औरे शाशूए !          औरै शाशूओ!

उकारान्त पुंल्लिंग

कहलूरी                मुन्नु

कारक                       एकवचन         बहुवचन

कर्ता (विभक्तिरहित)    मुन्नु           मुन्नु

(सविभक्ति)                 मुन्नुए         मुन्नुआं

कर्म                मुन्नुए जो        मुन्नुआं जो

करण             मुन्नुआं ते, कन्ने, ने,    मुन्नुआं ते, कन्ने, ने,

                      सौगी, के             सौगी, के

सम्प्रदान       मुन्नुआं वास्ते, खातर,  मुन्नुआं वास्ते, खातर

                     तईं, ताईं, गठे      तईं, ताईं, गठे

अपादान        मुन्नुए ते            मुन्नुआं ते

सम्बंध          मुन्नुए रा, रे, री   मुन्नुआं रा, रे, री

                     दा, दे दी           दा, दे, दी

अधिकरण     मुन्नुएं पर, मांझ,     मुन्नुआं पर, मांझ, .

                     गास, च            गास, च

सम्बोधन      ओ मुन्नुआं !         ओ मुन्नुओ !

 

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